फैसला सुनाना ही नहीं, न्याय को लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी: कॉन्फ्रेंस में बच्चों, आदिवासियों और बंदियों के अधिकारों पर मंथन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
अदालत का फैसला तभी सार्थक है, जब उसकी जानकारी और कानूनी मदद उस व्यक्ति तक भी पहुंचे, जो कानून की भाषा नहीं समझता। इसी सोच के साथ इंदौर में दो दिन चली वेस्ट जोन रीजनल कॉन्फ्रेंस में न्याय व्यवस्था को ज्यादा सुलभ, संवेदनशील और जन-केंद्रित बनाने पर मंथन हुआ। रविवार को समापन के दिन बच्चों, आदिवासियों, दिव्यांगों और बंदियों समेत समाज के कमजोर वर्गों तक न्याय की आसान पहुंच सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया।
मध्यप्रदेश राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (एमपी सालसा) ने नालसा के तत्वावधान में 8 और 9 अगस्त को यह सम्मेलन आयोजित किया। इसमें सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों, न्यायिक अधिकारियों, विधिक सेवा संस्थाओं, सरकार और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।
न्याय सिर्फ फैसला नहीं, उसके बाद की मदद भी
कॉन्फ्रेंस में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि न्याय का मतलब केवल अदालत में फैसला हो जाना नहीं है। कानूनी जानकारी व्यक्ति की अपनी भाषा में मिले, जरूरतमंद को समय पर सहायता मिले और कमजोर व्यक्ति न्याय की प्रक्रिया में अकेला न पड़े, तभी न्याय व्यवस्था वास्तव में जन-केंद्रित मानी जाएगी।
इसी उद्देश्य से हिंदी, भारतीय सांकेतिक भाषा और ब्रेल में कानूनी जानकारी उपलब्ध कराने की पहल शुरू की गई। नालसा की शिक्षा के अधिकार संबंधी योजना, योजनाओं का हिंदी संस्करण, ‘नालसा-स्पृहा योजना की योजनाओं हेतु ब्रेल गाइड’ और नालसा थीम सॉन्ग का भारतीय सांकेतिक भाषा संस्करण प्रमुख पहल रहीं।
बच्चों के लिए संवेदनशील हो न्याय व्यवस्था
कॉन्फ्रेंस में बाल-अनुकूल न्याय व्यवस्था पर भी विस्तार से चर्चा हुई। नालसा चाइल्ड फ्रेंडली लीगल सर्विस फार चिल्ड्रन स्कीम-2024 के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया गया।
पाॅस्को मामलों में बच्चों को दोबारा मानसिक आघात से बचाने, प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व, मुआवजा और मनोसामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने की जरूरत बताई गई। बच्चों के संरक्षण, कानूनी सहायता और पुनर्वास से जुड़ी संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल के लिए लीगल सर्विस यूनिट्स फार चिल्ड्रन को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया।
आदिवासियों और वंचितों तक पहुंचे कानूनी मदद
कॉन्फ्रेंस में आदिवासी एवं वन समुदायों समेत उन वर्गों तक विधिक सेवाएं पहुंचाने पर जोर दिया गया, जिन्हें भाषा, दूरी, आर्थिक स्थिति या जागरूकता की कमी के कारण न्याय हासिल करने में कठिनाई होती है।
मध्यस्थता और सामुदायिक विवाद समाधान को बढ़ावा देने की जरूरत भी बताई गई, ताकि छोटे विवादों का समाधान अदालत तक मामला पहुंचने से पहले ही प्रभावी ढंग से किया जा सके।
बंदियों को कानूनी सहायता के साथ पुनर्वास भी
बंदियों और उनके परिवारों के पुनर्वास को भी न्याय व्यवस्था का अहम हिस्सा बताया गया। नालसा-स्पृहा योजना, 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन, जेल लोक अदालतों और कारागारों में कानूनी सेवाओं को मजबूत करने पर चर्चा हुई।
वक्ताओं ने कहा कि बंदियों के लिए न्याय केवल लंबित मुकदमों में वकील उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए। रिहाई के बाद परिवार से जुड़ाव, रोजगार, शिक्षा, कौशल विकास और समाज में सम्मानजनक पुनर्वास भी उतना ही जरूरी है।
‘कोई पीछे न छूटे’, यही साझा संकल्प
दो दिवसीय सम्मेलन के समापन पर न्याय तक पहुंच को केवल अदालतों तक सीमित न रखने का संकल्प लिया गया। न्यायपालिका, नालसा-सालसा, सरकारी विभागों, शैक्षणिक संस्थानों, सिविल सोसायटी और पैरा-लीगल वालंटियर्स के बीच लगातार समन्वय पर जोर दिया गया।
कॉन्फ्रेंस का मूल संदेश रहा कि न्याय केवल उपलब्ध नहीं, बल्कि सुलभ, समावेशी, गरिमापूर्ण और जन-केंद्रित होना चाहिए ताकि गरीबी, दिव्यांगता, सामाजिक असुरक्षा, भौगोलिक दूरी या जागरूकता की कमी के कारण कोई भी व्यक्ति न्याय से पीछे न छूटे।
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