आसमान में ‘हॉक-आई’ और जेब में क्यूआर कोड: हाईटेक हुई बाबा बर्फानी की डगर
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘त्रिनेत्र’ जैसी चौकसी, अमरनाथ के दुर्गम रास्तों पर तैनात हुई डिजिटल फौज
थर्मल कैमरे और एफआरएस तकनीक का पहरा, चप्पे-चप्पे पर है हाईटेक सुरक्षा तंत्र।
अब न ठगी का डर, न मोलभाव की टेंशन, एक स्कैन में सामने आ जाएगी बाबा के सेवादारों की कुंडली
पिट्ठू और खच्चर वालों के लिए ‘पहचान’ सिस्टम हुआ अनिवार्य, श्रद्धालुओं के लिए आसान हुई पहाड़ों की चढ़ाई
13 हजार फीट की ऊंचाई पर तकनीक का ऐसा सुरक्षा चक्र, जिसने यात्रा को बनाया और भी सुगम
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
हा थ में लकड़ी की लाठी, जुबां पर ‘बम-बम भोले’ का जयघोष और सामने 13 हजार फीट ऊंचे दुर्गम पहाड़। अमरनाथ यात्रा की यह तस्वीर बरसों से हमारे देश की अगाध आस्था का प्रतीक रही है, लेकिन इस बार इस पारंपरिक और आध्यात्मिक सफर का नजारा थोड़ा बदल गया है।
इस साल जब श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए कश्मीर के चंदनवाड़ी या बालटाल मार्ग से आगे बढ़ेंगे तो उनके स्वागत के लिए सिर्फ प्रकृति की ठंडी हवाएं नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान की ‘अदृश्य आंखें’ भी मुस्तैद रहेंगी। आस्था की इस सबसे कठिन डगर को इस बार तकनीक के ऐसे अभेद्य सुरक्षा कवच से घेरा गया है, जिसने पहाड़ों के बीच सुरक्षा और सुविधा की एक नई परिभाषा लिख दी है। विज्ञान और विश्वास का यह अनूठा संगम इस यात्रा को बेहद हाईटेक बना रहा है।
आसमान से ‘हॉक-आई’ की पैनी नजर... इस साल यात्रा की सुरक्षा का जिम्मा केवल जमीन पर तैनात जवानों के कंधों पर ही नहीं है, बल्कि आसमान में ‘प्रोजेक्ट हॉक आई’ की पूरी ड्रोन आर्मी तैनात है। कश्मीर के उन संकरे और बेहद संवेदनशील रास्तों पर, जहां इंसानी पहुंच मुश्किल होती है, वहां ये हाई-रेजोल्यूशन ड्रोन चौबीसों घंटे मंडरा रहे हैं।
ये साधारण ड्रोन नहीं हैं; ये थर्मल इमेजिंग और नाइट-विजन से लैस हैं। यानी, घने कोहरे, भारी बर्फबारी या रात के अंधेरे में भी पहाड़ों की हर हरकत का लाइव डेटा सीधे बेस कैंप के कंट्रोल रूम तक पहुंच रहा है। किसी भी भूस्खलन या आपातकालीन स्थिति का अंदाजा इन ड्रोनों के जरिए संकट आने से पहले ही लगा लिया जाता है।
तीसरी आंख का पहरा: फेशियल रिकग्निशन कैमरे... बालटाल और पहलगाम के रास्तों से लेकर मुख्य गुफा तक, इस बार 34 अत्याधुनिक फेशियल रिकग्निशन सिस्टम (FRS) कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे भीड़ के बीच भी हर चेहरे को पहचान सकते हैं। सुरक्षा के लिहाज से यह तकनीक एक गेम-चेंजर साबित हो रही है, क्योंकि कोई भी संदिग्ध व्यक्ति इस ‘डिजिटल घेरे’ को पार नहीं कर सकता। लेकिन इसका एक और मानवीय पहलू भी है भीड़ में खो जाने वाले बुजुर्गों या बच्चों को उनके परिजनों से मिलाने में यह तकनीक पलक झपकते ही मदद कर रही है।
जेब में क्यू आर कोड: खत्म हुई ठगी की गुंजाइश... अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की होती थी कि दुर्गम चढ़ाई के लिए मिलने वाले खच्चर, पालकी या पिट्ठू वाले सही हैं या नहीं, या कहीं वे बीच रास्ते में मनमाना किराया तो नहीं वसूलेंगे? इस बार प्रशासन ने इसका ऐसा तोड़ निकाला है जो कमाल का है। यात्रा मार्ग पर सक्रिय हर स्थानीय सेवादार, पिट्ठू और खच्चर वाले के लिए ‘पहचान’ सिस्टम अनिवार्य कर दिया गया है। हर सेवादार के पास एक विशेष बारकोड और क्यू आर कोड आधारित डिजिटल आईडी कार्ड है।
श्रद्धालु अपनी जेब से मोबाइल निकालकर जैसे ही उस कोड को स्कैन करते हैं, उनके फोन पर उस सेवादार का नाम, फोटो, मोबाइल नंबर और प्रशासन द्वारा तय किया गया सरकारी किराया तुरंत आ जाता है। इससे न सिर्फ बिचौलियों और ठगी का खेल हमेशा के लिए खत्म हो गया है, बल्कि यात्रियों का भरोसा भी दोगुना हो गया है।
विश्वास और विज्ञान का यह मेल अनोखा है... अमरनाथ की यह यात्रा सिर्फ भौगोलिक दूरी तय करने के बारे में नहीं है, यह मन की शांति का सफर है। तकनीक के इस दखल ने श्रद्धालुओं की इस शांति को और पुख्ता किया है। जब एक आम शिवभक्त को पता होता है कि उसकी सुरक्षा के लिए आसमान में ड्रोन मुस्तैद हैं, मेडिकल इमरजेंसी के लिए हर कैंप डिजिटल नेटवर्क से जुड़ा है और उसकी जेब में ठगी से बचाने वाला क्यू आर कोड है, तो उसका सफर और अधिक आनंदमय हो जाता है। यह नए भारत की वो हाईटेक यात्रा है, जहां आस्था के प्राचीन पथ पर डिजिटल इंडिया की तकनीक पूरी मुस्तैदी से कदमताल कर रही है।
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