फांसी रहेगी बरकरार: सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका; कहा- अभी इसे असंवैधानिक मानने का आधार नहीं
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, नई दिल्ली।
मौत की सजा देने के मौजूदा तरीके यानी फांसी को खत्म करने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने मंगलवार को फांसी की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है, जिसके आधार पर फांसी की प्रक्रिया को असंवैधानिक घोषित किया जा सके।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में वैज्ञानिक, मेडिकल या अन्य ठोस प्रमाण सामने आने पर इस मुद्दे की दोबारा समीक्षा की जा सकती है।
जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसे विकल्प मांगे गए थे
यह याचिका वरिष्ठ वकील ऋषि मल्होत्रा ने 2017 में दाखिल की थी। इसमें मौत की सजा देने के लिए फांसी के बजाय अन्य तरीकों जैसे जहरीले इंजेक्शन, गोली मारना सहित वैकल्पिक प्रक्रियाओं को अपनाने की मांग की गई थी।
याचिका में दलील दी गई थी कि फांसी की प्रक्रिया क्रूर, अमानवीय और पीड़ादायक हो सकती है। इसे संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के खिलाफ बताया गया था।
केंद्र चाहे तो बना सकता है विशेषज्ञ समिति
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौत की सजा देने के तरीके की व्यापक समीक्षा कर सकती है। समिति यह देख सकती है कि क्या कोई दूसरा तरीका कम पीड़ा देने वाला और दोषी की गरिमा बनाए रखने वाला हो सकता है।
केंद्र ने फांसी को बताया था आसान और तेज तरीका
केंद्र सरकार ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में मौजूदा फांसी व्यवस्था का बचाव किया था। सरकार का कहना था कि फांसी से मौत तेज और आसान होती है और इससे कैदी को अनावश्यक पीड़ा नहीं होती।
केंद्र ने जहरीले इंजेक्शन और गोली मारने जैसे तरीकों को फांसी से बेहतर विकल्प मानने से इनकार किया था।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा था मौत की प्रक्रिया पर डेटा
मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी से जुड़ी पीड़ा, मौत में लगने वाले समय और प्रक्रिया से संबंधित वैज्ञानिक आंकड़े केंद्र से मांगे थे। कोर्ट ने इस विषय पर विशेषज्ञ समिति बनाने की संभावना पर भी विचार किया था।
बाद में अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने मौत की सजा के बेहतर विकल्पों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति बनाने की सिफारिश की थी।
इन मामलों में भी हुई थी फांसी पर बहस
धनंजय चटर्जी केस (2004): रेप और हत्या के मामले में दोषी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। इसके बाद मौत की सजा
और फांसी के तरीके को लेकर बहस हुई थी।
अजमल कसाब केस (2012): 26/11 मुंबई हमले के दोषी अजमल कसाब को फांसी दी गई थी। आतंकवाद के मामलों में मौत की सजा पर चर्चा तेज हुई थी।
निर्भया केस (2020): दिल्ली गैंगरेप मामले के चार दोषियों को तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण मौत की सजा लागू करने के तरीके पर बहस हुई थी।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद देश में मौत की सजा देने के लिए फांसी की मौजूदा व्यवस्था जारी रहेगी।
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