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देवतुल्य केंद्रीय नेतृत्व: मोटाभाई का मास्टर स्ट्रोक; जो थे दावेदार, वे हो गए बाहर

KHULASA FIRST

संवाददाता

05 जून 2026, 2:03 pm
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देवतुल्य केंद्रीय नेतृत्व

रजनीश को ‘दिल्ली दरबार’ का मिला आशीष पंजाब पर नजर के लिए चुग का चयन

रजनीश अग्रवाल के चयन ने पुरानी भाजपा की रीति, नीति व कार्यशैली की दिलाई याद

नाम तो कई नामचीन नेताओ के चल-दौड़ रहेे थे, बाजी लगी घर बैठे नेता के हाथ

अग्रवाल अपने चयन पर भावविभोर हुए, देवतुल्य कार्यकर्ताओं के दल के नेतृत्व को भी देवतुल्य दिया करार

सामान्य वर्ग के कोटे से ही होना था राज्यसभा के नेता का चयन, पार्टी ने नहीं बदली नीति

कमलनाथ, दिग्विजय को परे रख मीनाक्षी नटराजन के चयन के बाद कांग्रेस में बढ़ा भितरघात का खतरा

नितिन मोहन शर्मा 94250-56033 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जिस दौर में जमीनी कार्यकर्ता को ‘जमींदोज’ करने का भाजपा में चलन है, उस दौर में ‘कमलदल’ ने राज्यसभा सांसद के लिए प्रदेश से नेता का चयन कर सबको चौंका दिया।

रजनीश अग्रवाल के नाम के चयन ने पुरानी वाली भाजपा की रीति-नीति व कार्यशैली की याद दिला दी। उस युग में दल का खांटी व जमीनी नेता-कार्यकर्ता पद मांगने के लिए पार्टी के बड़े नेताओं की परिक्रमा नहीं करता था।

वह पार्टीहित में जमीन पर दिखाए पुरुषार्थ के दम पर आश्वस्त रहता था कि जब भी पार्टी को कुछ ‘देने’ की बारी आएगी, तो पार्टी नेता मेरा चयन करेंगे ही। तब की लीडरशीप पर एक कार्यकर्ता का भरोसा ऐसा ही दृढ़ था कि वह न भेदभाव करेंगे, न भाई भतीजावाद, न ‘किचन कैबिनेट’ में से किसी का चयन करेंगे।

उस दौर में योग्यता, ‘घर बैठे’ ही पुरस्कार पाती थी। ऐसे ही ‘घर बैठे’ रजनीश अग्रवाल का भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए चयन कर बीते दिनों वाली भूली-बिसरी भाजपा की याद दिला दी।

शायद इसलिए ही रजनीश अग्रवाल के मुंह से भावुक होकर ये शब्द निकले- भाजपा का कार्यकर्ता ही नहीं, पार्टी का नेतृत्व भी देवतुल्य होता है। जी हां, उसी केंद्रीय नेतृत्व का एकमेव चयन हैं रजनीश।

रजनीश के नाम से मध्य प्रदेश के किसी नेता का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं। जो अब श्रेय-पेय लेने की जबरिया कोशिश कर रहे हैं, वे भी जानते हैं कि ‘मोटाभाई’ के पिटारे से ये नाम वैसे ही निकला, जैसे नितिन नवीन।

रजनीश अग्रवाल एक तरह से घर बैठ ही गए थे। सक्रिय व सत्ता वाली राजनीति से वे स्वतः ही अपने को दूर मान चुके थे। मध्य प्रदेश भाजपा का चाल-चलन साफ बता रहा था कि ‘जावली’ में कार्यरत रहने वाले किरदार की पुनः ‘प्राण प्रतिष्ठा’ अब भाजपा में बीते दिनों की बात हो गई है।

तभी तो मध्य प्रदेश से राज्यसभा में जाने के लिए नामचीन नेताओं के नाम चल रहे थे। ऐसे नेताओं के नाम भी दौड़ा दिए गए, जो अभी भी चुनावी राजनीति में चुनकर आने का दमखम रखते हैं।

राज्यसभा में भेजने के लिए आमतौर पर ऐसे ही नेता का चयन होता है, जो चुनावी मैदान मारने में कमजोर या अनफिट हो। ये जानते हुए भी प्रदेश में जो दावेदार लिखे, छापे, जंचाए जा रहे थे, सबके सब क्षत्रप अब भी चुनावी गणित में ‘फिटफाट’ हैं।

कहीं से भी लड़कर चुनाव वे जीत सकते हैं। ऐसे में केंद्रीय नेतृत्व ऐसे नेताओं का चयन क्यों करेगा? तभी तो रजनीश अग्रवाल जैसे नेता सामने आए।

अग्रवाल की नामजदगी को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से नजदीकी से लेकर प्रदेश के कुछ नेताओं से भी जोड़ा जा रहा है, जबकि सूत्र बताते हैं कि अग्रवाल का चयन केंद्रीय नेतृत्व की उस नीति का परिणाम है, जिसमें योग्य नेता को बिना लॉबिंग के भी पद-प्रतिष्ठा देना शामिल है।

नितिन नवीन स्वयं इसका उदाहरण हैं कि तमाम दिग्गज नेताओं व दक्षिण भारत की प्रबल दावेदारी के बावजूद उनका चयन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गृहमंत्री अमित शाह ने इसी नीति के तहत किया। तभी तो रजनीश अग्रवाल ने सजल नेत्रों से केंद्रीय लीडरशीप को ‘देवतुल्य नेतृत्व’ की संज्ञा दी।

अग्रवाल मध्य प्रदेश में सही मायनों में किसी नेता के नजदीक थे तो वे थे स्व. अनिल माधव दवे। दवे की ही संगत व रंगत का असर उन पर था और जिस तरह से दवे ने उस समय प्रदेश के तमाम दिग्गजों को चौंकाते हुए राज्य से राज्यसभा का सफर तय किया था, उनके खास रजनीश ने भी ये ही काम कर दिखाया।

नटराजन का नाम, कांग्रेस में मंडराया भितरघात का खतरा- दिग्विजय सिंह, जॉर्ज कुरियन व सुमरे सिंह के कार्यकाल की समाप्ति के बाद मध्य प्रदेश से रिक्त हुई 3 राज्यसभा सीट के लिए नाम की घोषणा के बाद भाजपा में तो सब कुछ दुरुस्त है, लेकिन कांग्रेस में भितरघात का खतरा मंडरा गया है।

कारण, मीनाक्षी नटराजन का चयन। मीनाक्षी हर तरह से इस पद के लिए योग्य हैं, लेकिन कांग्रेस में भी कहां योग्यता समय रहते पुजाती है? पार्टी की तरफ से कमलनाथ, दिग्विजय जैसे ‘वयोवृद्ध’ व ‘खानदानी’ नेता भी इस दौड़ में थे।

कमलनाथ का नाम मानकर ही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने प्रदेश में तीसरी सीट नहीं लड़ने का पक्का मन बनाया था और इसकी घोषणा भी कर दी थी। दौड़ में तो मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष भी थे, लेकिन नाम आया गांधीवादी नेता मीनाक्षी का।

राहुल गांधी के नजदीक होने के बाद भी कोई गारंटी नहीं कि उनका चयन निर्विरोध हो जाए। वह कांग्रेस व कांग्रेसी ही क्या, जो अपने ही दल से दो-दो हाथ न करे’! लिहाजा अब भाजपा में भी तीसरी सीट को ‘खींच’ लेने की अटकलें तेज हो गई हैं।

अगर अटकलों ने अमलीजामा पहना तो इस काम में ‘माहिर’ नेता को पार्टी तीसरी सीट के लिए नामजद कर सकती है। राज्यसभा जाने को आतुर जिस भाजपा नेता के कांग्रेस से रिश्ते मजबूत होंगे, उसकी लॉटरी लग सकती है।

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