कोरोना के बाद अब खाड़ी युद्ध से अस्थिर हुई अर्थव्यवस्था से देश को बचा रही खेती-किसानी: ग्रीन के बाद एवरग्रीन रिवॉल्यूशन की जरूरत
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ईरान अमेरिका इजरायल युद्ध से दुनिया की अर्थव्यवस्था खतरे में आ चुकी है। जीवन रक्षक और जीवन उपयोगी जरूरतो का अकाल पड़ने लगा है लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था खाद्य सुरक्षा और कृषि आधारित होने के कारण मजबूत बनी हुई है। पहला अवसर नहीं है जब देश को भयावह संकट से खेती-किसानी ने बचाया है।
कोरोना में कृषि उत्पादन ने बचाया। देश की लगभग 80 करोड़ आबादी को मुक्त में अनाज मिला यह देश की खेती किसानी के कारण ही संभव हो पाया। जब भी राष्ट्र पर खतरा आता है, यह सुरक्षा कवच का काम करती है। इतना सब होने के बावजूद देश की खेती-किसानी संकट में है। खूब उत्पादन हो रहा है लेकिन वह पौष्टिक या गुणकारी नहीं रहा।
यह विचार भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री दिनेश कुलकर्णी ने एक कार्यक्रम व्यक्त कर कहा हमने भोजन को जहरीला कर दिया। कृषि उत्पादन और जमीन लगातार कम हो रही है। 80% किसानों के पास सीमित कृषि भूमि है।
देश की 50% भूमि पर ही सिंचाई सुविधा है। विकास के नाम पर कृषि भूमि का तेजी से अधिग्रहण कर खेती तेजी से कम की जा रही है। सरकार को नीतियों में आमूल-चूल बदलाव करना होगा। देश और उसकी खेती-किसानी अतीत में पूरी तरह आत्मनिर्भर थी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खांटी वरिष्ठ प्रचारक दिनेश कुलकर्णी जब भारत के अतीत वर्तमान और भविष्य के कृषि परिदृश्य पर वैज्ञानिक तथ्यों के साथ मंच से धाराप्रवाह संबोधन दे रहे थे थे तो पूरा सभागृह पिनड्रॉप साइलेंस होकर मंत्रमुग्ध भाव से सुन रहा था।
उन्होंने करीब चार सौ वर्ष पूर्व की अतीत की सुनहरी राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के पन्ने पलटते हुए बताया भारत कृषि प्रधान नहीं वरन कृषि आधारित वाणिज्य और ग्राम आधारित उद्योग व्यापार-व्यवसाय के कारण दुनिया का सबसे समृद्ध राष्ट्र था।
उस समय खेती का ट्रेडिशनल नॉलेज पूरी तरह विज्ञान आधारित रहा। इसका उल्लेख अंग्रेजों ने अपने ब्रिटिश गजेटियर में भी किया है। वर्धा के गांधी आश्रम के प्रमुख धर्मपाल सिंह ने ब्रिटेन जाकर इन गजेटियर का अध्ययन किया था।
अतीत में भारत की टेक्नोलॉजी दुनिया में हो रहे आविष्कारों से कहीं आगे थी और यह ग्रामीणों के पारंपरिक वैदिक ज्ञान पर आधारित। आजादी के बाद 1960 के दशक में आए अकाल निर्मित हुई खाद्यान्न संकट की स्थिति से निपटने के लिए हरित क्रांति लाई गई।
इससे उत्पादन तो बड़ा लेकिन समस्याएं कहीं ज्यादा खड़ी हो गई। आधुनिक कृषि से देसी बीज से लेकर दुधारू पशुओं और बैल आदि की नस्ल हाइब्रिड प्रजातियों में बदल गई। रासायनिक उर्वरक और जहरीले कीटनाशक से खाद्यान्न जहरीला हो गया और मिट्टी मृतप्राय।
अब ग्रीन रिवॉल्यूशन के साथ एवरग्रीन रिवॉल्यूशन की सख्त जरूरत है। यानी पर्यावरण प्रकृति आधारित खेती से ही देश की कृषि सुरक्षित रह पाएगी।
‘कृषि: आज, कल और कल’ विषयक इस महत्वपूर्ण व्याख्यान में दिनेश कुलकर्णी मुख्य वक्ता थे। कुलकर्णी ने कहा वर्तमान वैश्विक टैरिफ वॉर और युद्ध के कारण विश्व अर्थव्यवस्था अस्थिर है। ऐसे समय भारतीय कृषि न केवल देश की खाद्य सुरक्षा, बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था को स्थिर और मजबूत बनाए रखने की क्षमता रखती है। उन्होंने बताया कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ है देश के जीडीपी में कृषि का योगदान लगभग एक चौथाई यानी 25% से अधिक है। देश में 50% से अधिक रोजगार कृषि क्षेत्र में है।
लगभग 50 % आबादी की आजीविका कृषि पर निर्भर है। कृषि निर्यात ₹4.4 लाख करोड़ (≈ 52 बिलियन डॉलर) तक पहुंच चुका है। वैश्विक संकट के समय कृषि क्षेत्र भारत के लिए सुरक्षा कवच (Economic Shock Absorber) की भूमिका निभाता है। जब उद्योग और सेवा क्षेत्र प्रभावित होते हैं, तब कृषि उत्पादन, ग्रामीण मांग और खाद्यान्न उपलब्धता देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखते हैं।
साथ ही, कृषि निर्यात विदेशी मुद्रा अर्जन कर आर्थिक संतुलन को मजबूती देता है। कुलकर्णी ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य में टैरिफ वॉर एवं भौतिक युद्धों के चलते भारत पर पड़ने वाले संभावित दुष्प्रभावों पर प्रकाश डाला। कहा वर्तमान परिस्थिति में भारत को नवयुगीन कृषि के लिए अपने वैदिक ज्ञान की ओर पुनः अग्रसर होना चाहिए। प्राचीन भारत में कृषि वाणिज्य का अभिन्न हिस्सा थी और उस समय “गौ कृपा वाणिज्यम” जैसी समन्वित प्रणाली प्रचलित थी।
पोषण सुरक्षा पर देना होगा ध्यान: उन्होंने वर्तमान कृषि व्यवस्था की चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला, जिनमें नवयुवकों का खेती से विमुख होना, भूमि की उर्वरता में गिरावट, ऑर्गेनिक कार्बन की कमी तथा खाद्यान्नों के पोषण स्तर में गिरावट शामिल हैं। उन्होंने ग्रीन रिवोल्यूशन से आगे बढ़कर एवरग्रीन रिवोल्यूशन की दिशा में कार्य करने का आह्वान किया।
‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण को साझा कर कृषि को इसकी आधारशिला बताया और कहा आने वाले समय में केवल खाद्यान्न उत्पादन ही नहीं, पोषण सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान देना होगा। उन्होंने कृषि मित्र कृषक एवं ‘गो कृपा वाणिज्यम’ को पुनः स्थापित करने पर बल दिया।
द्वितीय वक्ता प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जयंतीलाल भंडारी ने भारत की कृषि यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि 1960 के दशक में जहां भारत को अकाल के कारण खाद्यान्न आयात करना पड़ता था, वहीं आज भारत एक प्रमुख निर्यातक देश बन चुका है। उन्होंने बताया कि 1947 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन लगभग 82 मिलियन टन था, जो वर्ष 2025-26 में बढ़कर लगभग 357.7 मिलियन टन हो गया है।
भाकिसं के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष पालीवाल, क्षेत्रीय संगठन मंत्री महेश चौधरी, प्रांत संगठन मंत्री अतुल माहेश्वरी, सह संगठन मंत्री दिनेश शर्मा, प्रांत अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण पटेल तथा जिलाध्यक्ष राजेंद्र पाटीदार सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे।
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