सरकारी जमीन पर कब्जा: दो मंजिला भवन बना; शिकायत के बावजूद निगम प्रशासन ने दिया अतिक्रमण को संरक्षण
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सुदामा नगर सेक्टर-ए में सरकारी उद्यान की जमीन पर कथित रूप से अवैध दो मंजिला इमारत तैयार होने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। स्थानीय रहवासियों का आरोप है कि कई बार शिकायतें करने के बावजूद नगर
निगम प्रशासन ने समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जिससे निर्माण पूरा हो गया। इस मामले में नगर निगम की कार्यप्रणाली और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।
रहवासियों के अनुसार कॉलोनी के स्वीकृत लेआउट प्लान में करीब 8000 वर्गफीट भूमि सार्वजनिक उद्यान के लिए आरक्षित है। आरोप है कि पहले यहां बने एक धार्मिक स्थल की आड़ में धीरे-धीरे कब्जे की कोशिश शुरू हुई और बाद में दो मंजिला भवन का निर्माण कर लिया गया।
स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण के शुरुआती चरण में ही उन्होंने निगम अधिकारियों को मौके पर बुलाकर कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन केवल आश्वासन दिए गए और कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
नागरिकों का दावा है कि यदि निर्माण प्रारंभ होते ही उसे रोक दिया जाता तो सरकारी भूमि को अतिक्रमण से बचाया जा सकता था।
उनका कहना है कि प्रशासन की निष्क्रियता के कारण अब पूरी इमारत तैयार हो चुकी है और सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित भूमि का स्वरूप बदल गया है।
मामले को लेकर रहवासियों ने विभिन्न स्तरों पर शिकायतें भी दर्ज कराईं। जानकारी के अनुसार 6 जनवरी 2025 को सीएम हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई गई थी। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि बिना संतोषजनक निराकरण के शिकायत बंद कर दी गई।
इसके बाद मामला राष्ट्रपति सचिवालय और भोपाल मंत्रालय तक पहुंचा, जहां से नगर निगम से रिपोर्ट मांगी गई।
निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल
रहवासियों का कहना है कि नगर निगम की भवन अनुज्ञा शाखा द्वारा जारी एक पत्र में यह स्वीकार किया गया कि संबंधित भूमि सरकारी उद्यान के लिए आरक्षित है तथा वहां किया जा रहा निर्माण नियमानुसार नहीं है।
इसके बावजूद निर्माण पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई। इसी बिंदु को लेकर नागरिक निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि निर्माण अवैध था तो उसे प्रारंभिक स्तर पर ही रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी थी।
फाइलों और औपचारिक प्रक्रियाओं में उलझा मामला
स्थानीय लोगों का आरोप है कि फाइलों और औपचारिक प्रक्रियाओं में समय बीतता रहा, जबकि मौके पर निर्माण कार्य लगातार चलता रहा।
उनका कहना है कि इससे यह संदेश गया कि प्रभावशाली लोगों के मामलों में नियमों का पालन सख्ती से नहीं कराया जाता, जबकि सामान्य नागरिकों के छोटे-छोटे निर्माणों पर तुरंत कार्रवाई की जाती है।
रहवासियों ने यह भी कहा कि सरकारी उद्यान केवल खाली जमीन नहीं होता, बल्कि वह बच्चों के खेलने, बुजुर्गों के टहलने और क्षेत्र के पर्यावरणीय संतुलन के लिए महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्ति है।
ऐसे में यदि आरक्षित भूमि पर स्थायी निर्माण हो जाता है तो पूरे क्षेत्र के नागरिकों के अधिकार प्रभावित होते हैं।
भूमिका की निष्पक्ष जांच हो
अब स्थानीय नागरिक इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी सरकारी भूमि की सुरक्षा और अतिक्रमण रोकने की थी, उनकी भूमिका की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
साथ ही यदि निर्माण नियमों के विरुद्ध पाया जाता है तो संबंधित कानूनों के अनुसार कार्रवाई कर सरकारी भूमि को मूल स्वरूप में बहाल किया जाए।
जन आंदोलन की चेतावनी
रहवासियों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो वे मामले को उच्च न्यायालय सहित अन्य सक्षम मंचों तक ले जाएंगे और जन आंदोलन भी करेंगे।
उनका कहना है कि यह केवल एक भूखंड का मामला नहीं, बल्कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
अब सभी की नजर नगर निगम और जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई है।
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