निरीक्षण के लिए डमी मरीजों कोे रखा: डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम यूनिवर्सिटी में फर्जीवाड़ा; स्वास्थ्य विभाग को गुमराह करने के लिए प्रति मरीज 600 रुपए का सौदा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम यूनिवर्सिटी से जुड़े चिकित्सा संस्थान में स्वास्थ्य विभाग की टीम को गुमराह करने का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। संस्थान पर आरोप है रूटीन इन्स्पेक्शन के दौरान बिस्तरों की संख्या और मरीजों की मौजूदगी दर्शाने के लिए प्रबंधन ने बाहरी लोगों को पैसे देकर मरीज के रूप में भर्ती दिखाया।
सूत्रों के अनुसार, निरीक्षण के दौरान स्वास्थ्य विभाग की टीम को यह दिखाने की कोशिश की गई कि अस्पताल में पर्याप्त मरीज उपचाराधीन हैं, जबकि हकीकत में ऐसा नहीं था।
इस पूरे फर्जीवाड़े के लिए एक सुनियोजित रणनीति अपनाई गई थी। विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, प्रबंधन द्वारा प्रत्येक डमी मरीज को 24 घंटे अस्पताल में भर्ती रहने के एवज में 300 से 600 रुपए तक का भुगतान किया गया।
इस अवैध खेल का उद्देश्य निरीक्षण दल के सामने संस्थान के आंकड़ों को दुरुस्त दिखाना था ताकि मानकों की अनदेखी पर कार्रवाई से बचा जा सके। यह गंभीर अनियमितता न केवल चिकित्सा नैतिकता के विरुद्ध है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया को भी सीधे तौर पर चुनौती देती है।
संस्थान प्रबंधन द्वारा मरीजों की संख्या में की गई कृत्रिम वृद्धि स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार के एक नए निचले स्तर को उजागर करती है। निरीक्षण के लिए टीम 22 जून को पहुंची थी। निरीक्षण के दौरान जांच देर रात तक चली।
बड़े घोटाले का संकेत
नीट फर्जीवाडे और पूर्व में व्यापमं और नर्सिंग घोटाले के खुलासे ने पहले ही स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग की कार्यशैली को पर सवालिया निशान लगा रखे हैं। इसी तरह इंदौर के एक अन्य डेंटल कॉलेज में भर्ती घोटाला हुआ था, जिसमें संचालक पर 46 छात्रों के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगा था।
ये सारे घोटाले केंद्र व राज्य सरकार की मरीजों के लिए चलाई जा रही योजनाओं का बेजा लाभ उठाने के लिए होते हैं। इनमें आयुष्मान योजना प्रमुख है। इसमें प्रति मरीज पांच लाख रुपए तक मुफ्त इलाज केंद्र सरकार कराती है, जिसका भुगतान संबंधित अस्पतालों को किया जाता है।
सीएमएचओ को जानकारी नहीं
इस पूरे घटनाक्रम पर जब सीएमएचओ डॉ. माधवप्रसाद हसानी से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा विभाग के निर्देश पर रूटीन जांच के लिए दल का गठन किया जाता है। इसके लिए लगभग तीन महीने पहले टीमों का गठन किया जाता है।
उक्त टीमों को निरीक्षण के लिए हॉस्पिटलों की सूची उपलब्ध कराई जाती है। किस टीम ने उक्त संस्थान का निरीक्षण किया है, इसकी जानकारी लेने पर ही कुछ कहा जा सकता है। स्वीकार किया उनके संज्ञान में यह मामला आपके माध्यम से ही आया है।
डॉ. हसानी ने कहा मामले की विस्तृत जानकारी जुटा रहे हैं, जिसके बाद ही कोई आधिकारिक टिप्पणी या आगामी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। फिलहाल, इस खुलासे के बाद से ही विश्वविद्यालय प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं और अब प्रशासनिक जांच पर सबकी निगाहें टिकी हैं।
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