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चमोली का द्रोणागिरि गांव जहां आज भी वर्जित है हनुमानजी की पूजा

KHULASA FIRST

संवाददाता

28 जून 2026, 6:42 pm
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चमोली का द्रोणागिरि गांव जहां आज भी वर्जित है हनुमानजी की पूजा

लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए ‘आराध्य पर्वत’ का हिस्सा उखाड़ ले गए थे पवनपुत्र, त्रेतायुग की उस मर्मस्पर्शी पीड़ा को आज भी सीने से लगाए बैठा है यह भोटिया कबीला

हेमंत उपाध्याय 99930-99008खुलासा फर्स्ट।
पहाड़ को ‘अंग-भंग’ करने की त्रेतायुगीन टीस: क्यों 11 हजार फीट की ऊंचाई पर आज भी रूठे हैं द्रोणागिरि के लोग, एक भूल की सदियों पुरानी सजा: द्रोणागिरि में हनुमानजी की पूजा भी वर्जित और महिलाओं के लिए नियम भी कड़े, देवभूमि का अनसुना विरोधाभास: जहां गूंजती है रामकथा, पर हनुमान चालीसा के पाठ पर है सदियों से सख्त पाबंदी, डिजिटल युग में भी अडिग भोटिया कबीला: सेना में सेवा, शहरों में पढ़ाई; पर गांव की सीमा में न झंडा न सिंदूर, लक्ष्मण के लिए जो ‘संकटमोचन’ थे, इस कबीले के लिए बने ‘संकट’: जानिए द्रोणागिरि पर्वत के खंडित होने की पूरी दास्तान।

स नातन संस्कृति और रामायण महाकाव्य में भगवान राम के परम भक्त हनुमान जी को संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। देश के कोने-कोने में उनके लाखों मंदिर हैं और शायद ही कोई ऐसा हिंदू बहुल क्षेत्र होगा जहां हनुमान चालीसा का पाठ न होता हो।

लेकिन इस सर्वव्यापी आस्था के ठीक विपरीत, देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले में एक ऐसा अनोखा और विस्मयकारी कोना भी है, जहां संकटमोचन हनुमान जी की पूजा करना सख्त वर्जित है।

नीति घाटी में लगभग 11 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित ‘द्रोणागिरि गांव’ के लोग न तो हनुमान जी की आराधना करते हैं और न ही अपने क्षेत्र में उनका कोई मंदिर या ध्वज बर्दाश्त करते हैं।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अनन्य भक्त से स्थानीय समाज की यह नाराजगी किसी दुर्भावना के कारण नहीं, बल्कि त्रेतायुग से जुड़ी एक ऐसी अनूठी लोक-आस्था और परंपरा के कारण है जो आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी।

यह आलेख त्रेतायुग के उस प्रसंग को उजागर करता है जहां एक तरफ लक्ष्मण के प्राण बचाने का गौरव था, तो दूसरी तरफ एक पूरे कबीले के आराध्य के खंडित होने की मर्मस्पर्शी पीड़ा।

लक्ष्मण मूर्च्छा, संजीवनी की खोज और द्रोणागिरि का आगमन... इस अनोखे विरोध और लोक-परंपरा की जड़ें रामायण काल के लंका युद्ध से जुड़ी हैं। मेघनाद के अमोघ शक्ति बाण से जब लक्ष्मण जी रणभूमि में मूर्छित हो गए और उनके प्राण पखेरू उड़ने को थे, तब लंका के वैद्य सुषेण ने हिमालय के द्रोणागिरि पर्वत पर मिलने वाली ‘संजीवनी बूटी’ को उनके प्राण बचाने का एकमात्र उपाय बताया था।

पवनपुत्र हनुमान अत्यंत तीव्र वेग से आकाश मार्ग से उत्तराखंड के इन ऊंचे पर्वतीय अंचलों में पहुंचे।

द्रोणागिरि गांव के बुजुर्गों और भोटिया कबीले की लोकगाथाओं के अनुसार, जब हनुमान जी इस चमकीले और औषधीय पर्वत पर पहुंचे, तो वे वहां उगने वाली तमाम दिव्य जड़ी-बूटियों के बीच चमकीली संजीवनी बूटी को ठीक से पहचान नहीं पाए।

लक्ष्मण के पास लौटने का समय बेहद कम था और सूर्योदय से पहले बूटी पहुंचाना अनिवार्य था। ऐसे में समय के अभाव और व्याकुलता के कारण हनुमान जी ने पूरे पर्वत का एक विशाल दाहिना हिस्सा (दाहिना कंधा) ही अपने हाथों पर उखाड़ लिया और लंका की ओर उड़ गए।

कबीले की आस्था पर आघात और सदियों पुरानी नाराजगी का कारण... हनुमान जी का यह कृत्य लंका में लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए एक महान और वंदनीय कार्य साबित हुआ, लेकिन द्रोणागिरि के स्थानीय आदिवासियों और भोटिया कबीले के लिए यह उनकी आस्था पर एक बहुत बड़ा वज्रपात था।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, द्रोणागिरि गांव के लोग इस पर्वत को केवल एक प्राकृतिक ढांचा नहीं मानते थे, बल्कि वे सदियों से इसे साक्षात ‘पर्वत देवता’ के रूप में पूजते आ रहे थे। द्रोणागिरि पर्वत वहां के कबीले का सर्वोच्च आराध्य, रक्षक और कुलदेवता था। कबीले के लोग मानते हैं कि हनुमान जी ने उनके जागृत देवता के एक हिस्से को बिना उनकी अनुमति के उखाड़कर उनके भगवान को खंडित (अंग-भंग) कर दिया था।

एक भूल की सजा: महिलाओं के लिए आज भी नियम कड़े... कहा जाता है कि जब हनुमान जी बूटी नहीं पहचान पा रहे थे, तब उन्होंने गांव की एक वृद्ध महिला से पर्वत देवता और संजीवनी बूटी का पता पूछा था। उस बुजुर्ग महिला ने अनजाने में हनुमान जी को पर्वत का वह हिस्सा दिखा दिया। जब हनुमान जी पूरा पहाड़ उखाड़ ले गए, तो कबीले के लोग पर्वत देवता को लहूलुहान और खंडित देखकर बेहद क्रोधित और दुखी हुए।

इस घटना के बाद से कबीले ने न केवल हनुमान जी की पूजा पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया, बल्कि उस वृद्ध महिला के परिवार और पूरे समुदाय का भी सामाजिक बहिष्कार कर दिया था। आज भी द्रोणागिरि गांव की ‘नंदा अष्टमी’ के त्योहार पर जब पर्वत देवता की विशेष पूजा की जाती है, तो महिलाओं को उस पूजा में शामिल होने की अनुमति नहीं होती, क्योंकि कबीला आज भी उस त्रेतायुगीन भूल का उत्तरदायित्व एक महिला पर ही मानता है।

आधुनिकता के दौर में भी अडिग है परंपरा
आज का द्रोणागिरि गांव आधुनिक दुनिया से जुड़ा हुआ है, यहां के युवा शहरों में पढ़ रहे हैं और सेना में सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन जब बात कबीले की इस परंपरा की आती है, तो नियम आज भी उतने ही कड़े हैं। पूरे गांव में आपको हनुमान जी की कोई तस्वीर, मूर्ति या लाल रंग का कोई धार्मिक झंडा देखने को नहीं मिलेगा।

यहां तक कि रामलीला के मंचन के दौरान भी हनुमान जी के प्रसंग को या तो बहुत सूक्ष्म रखा जाता है या स्थानीय लोग उससे दूरी बना लेते हैं।

वैज्ञानिक और तार्किक नजरिए से यह बात भले ही अजीब लगे कि लंका विजय के महानायक से कोई गांव इस कदर नाराज रह सकता है, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड की यही खूबी है। यहां इतिहास और पौराणिक कथाएं किताबों में बंद नहीं हैं, वे लोगों के जीने के तौर-तरीकों, उनकी आस्थाओं और उनके पर्यावरण के प्रति अगाध प्रेम में सांस लेती हैं।

द्रोणागिरि गांव का यह अनूठा प्रसंग पाठकों को यह सिखाता है कि पहाड़ों में प्रकृति और पर्वतों को देवता की तरह पूजने की परंपरा कितनी गहरी और अपरिवर्तनीय है।

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