इस मामले में 24 साल बाद फैसला: दो पूर्व अधिकारी समेत चार दोषियों को इतने साल की सजा
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट,भोपाल।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में आतंकी के लिए फर्जी पासपोर्ट जारी करने के 24 वर्ष पुराने मामले में जिला अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है।
अदालत ने तत्कालीन दो पासपोर्ट अधिकारियों, एक क्लर्क और एक एजेंट को दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। मामले में एक अन्य आरोपी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया।
2002 में दर्ज हुआ था मामला
यह मामला आतंकवादी नवाब खान, उर्फ समीर और सलमान, से जुड़ा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, एक पुलिसकर्मी की हत्या के बाद वह फरार हो गया था और पहचान छिपाने के लिए शाजापुर में रहने लगा।
आरोप है कि उसने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भोपाल पासपोर्ट कार्यालय से पासपोर्ट बनवाया और बाद में देश छोड़कर भाग गया। इस मामले की जांच सीआईडी ने की थी और वर्ष 2002 में प्रकरण दर्ज किया गया था।
फर्जी दस्तावेजों से बनवाया गया पासपोर्ट
अभियोजन के अनुसार, शाजापुर निवासी एजेंट अबू बकर ने सुभाष व्यास की मदद से राशन कार्ड, अंकसूची और निवास संबंधी दस्तावेज कथित रूप से फर्जी तरीके से तैयार कराए।
इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर वर्ष 1997 में भोपाल पासपोर्ट कार्यालय में आवेदन किया गया और कुछ ही समय में पासपोर्ट जारी कर दिया गया।
पुलिस सत्यापन रिपोर्ट बदलने का आरोप
जांच में सामने आया कि शाजापुर पुलिस द्वारा भेजी गई सत्यापन रिपोर्ट नकारात्मक थी, जिसके आधार पर पासपोर्ट जारी नहीं होना चाहिए था।
आरोप है कि पासपोर्ट कार्यालय में इस रिपोर्ट को बदलकर दूसरी रिपोर्ट लगा दी गई और नियमों की अनदेखी करते हुए पासपोर्ट सीधे एजेंट के माध्यम से आवेदक तक पहुंचा दिया गया।
पाकिस्तान जाने और आतंकी गतिविधियों के आरोप
जांच एजेंसियों के अनुसार, फर्जी पासपोर्ट के आधार पर नवाब खान वर्ष 1998 में पाकिस्तान चला गया, जहां उसने कथित रूप से आईएसआई से प्रशिक्षण प्राप्त किया।
नेपाल के रास्ते भारत लौटा
बाद में वह नेपाल के रास्ते भारत लौटा और गुजरात में आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा। बाद में गुजरात पुलिस के साथ मुठभेड़ में उसकी मौत हो गई।
चार दोषी, एक बरी
भोपाल जिला न्यायालय की अपर सत्र न्यायाधीश राजेश्वरी श्रीवास्तव की अदालत ने मामले में तत्कालीन कार्यवाहक पासपोर्ट अधिकारी तुलसीदास शर्मा, तत्कालीन पासपोर्ट अधिकारी देवेंद्र जैन, कार्यालय क्लर्क सुनील कुमार राजक और एजेंट अबू बकर को दोषी ठहराया।
चारों को तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई है। वहीं, सह-आरोपी सुभाष व्यास के खिलाफ आरोप पर्याप्त साक्ष्यों से सिद्ध नहीं होने पर अदालत ने उन्हें बरी कर दिया।
करीब दो दशक से अधिक समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया
करीब दो दशक से अधिक समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद आए इस फैसले को सरकारी दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े और अधिकारियों की जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में एक अहम निर्णय माना जा रहा है।
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