हॉस्टल में लटक रहे मरे चमगादड़: 3 महीने से मेस बंद; इतने छात्रों से लाखों की फीस, सुविधाएं नदारद
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के हॉस्टलों की व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। विश्वविद्यालय के जगदीश चंद्र बसु और रवींद्रनाथ टैगोर बॉयज हॉस्टल में रहने वाले 346 छात्रों से सालाना करीब 85 लाख रुपए फीस लेने के बावजूद छात्र बुनियादी सुविधाओं के लिए परेशान हैं।
छात्रों का आरोप है कि हॉस्टल की दीवारों पर मरे हुए चमगादड़ लटके हैं, बाथरूम के दरवाजे टूटे पड़े हैं, वायरिंग खुली हुई है और नियमित सफाई भी नहीं होती।
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि दोनों हॉस्टलों की मेस करीब तीन महीने से बंद है। इसके चलते छात्रों को बाहर खाना खाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
छात्रों का कहना है कि हर बार मेस शुरू होने के लिए करीब 10 दिन का समय बताया जाता है, लेकिन तीन महीने बीतने के बावजूद स्थिति जस की तस है।
346 छात्र, सालाना करीब 85 लाख की फीस
रवींद्रनाथ टैगोर बॉयज हॉस्टल डीएवीवी का सबसे बड़ा हॉस्टल है। इसकी क्षमता करीब 262 छात्रों की है। वहीं जगदीश चंद्र बसु हॉस्टल में भी बड़ी संख्या में छात्र रहते हैं।
छात्रों के मुताबिक दोनों हॉस्टलों में मिलाकर करीब 346 छात्र रह रहे हैं। उनसे हॉस्टल फीस के तौर पर सालाना करीब 85 लाख रुपए लिए जाते हैं।
छात्रों का कहना है कि इस साल फीस में करीब 3 हजार रुपए की बढ़ोतरी भी की गई, लेकिन सुविधाओं में उसके अनुरूप सुधार नहीं हुआ।
बाथरूम के दरवाजों पर पेपर
हॉस्टल की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ जगहों पर मरे हुए चमगादड़ लटके हुए हैं। बाथरूम के टूटे दरवाजों को ठीक कराने के बजाय कई जगह पेपर लगाकर काम चलाया जा रहा है।
छात्रों का कहना है कि हॉस्टल में नियमित सफाई नहीं होने के कारण बाथरूम और आसपास के हिस्सों में बदबू रहती है। शिकायत करने पर वार्डन की ओर से जल्द व्यवस्था सुधारने का आश्वासन दिया जाता है, लेकिन समस्या लंबे समय से बनी हुई है।
‘परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं कि बाहर कमरा ले सकें’
छात्रों का कहना है कि मेस बंद होने से उन्हें रोजाना बाहर खाना पड़ रहा है। इससे अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। कई छात्रों का कहना है कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे हॉस्टल छोड़कर बाहर किराए का कमरा लेकर रह सकें। इसलिए मजबूरी में इन्हीं परिस्थितियों में रहना पड़ रहा है।
छात्रों के मुताबिक, हर महीने करीब 10 से 12 छात्र बीमार पड़ रहे हैं। हालांकि, बीमारी के इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
हर बार मिल रहा ‘10 दिन’ का आश्वासन
छात्रों के मुताबिक मेस करीब तीन महीने से बंद है। इस दौरान उन्हें कई बार बताया गया कि अगले 10 दिन में मेस शुरू हो जाएगी, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ।
मेस बंद होने से छात्रों को भोजन के लिए हॉस्टल से बाहर जाना पड़ रहा है। छात्रों का कहना है कि हॉस्टल फीस में भोजन की सुविधा की उम्मीद के बावजूद उन्हें अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है।
छात्रों की शिकायतों पर अब सवाल
हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की मुख्य शिकायतें साफ-सफाई, टूटे बाथरूम, खुली वायरिंग और मेस बंद होने से जुड़ी हैं। दूसरी ओर विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि मेस के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है और हॉस्टल में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
अब सवाल यह है कि तीन महीने से बंद मेस, साफ-सफाई और मरम्मत जैसी समस्याओं का समाधान कब तक होगा और फीस में बढ़ोतरी के बाद छात्रों को बेहतर सुविधाएं कब मिलेंगी?
रजिस्ट्रार प्रज्जवल खरे से सीधी बात
सवाल: आज 2 हजार रुपए में बिजली-पानी के साथ कमरा मिल सकता है?
रजिस्ट्रार : आज की तारीख में 2 हजार रुपए में बिजली-पानी सहित कमरा कौन देगा?
सवाल: यूनिवर्सिटी सरकारी है, फिर सुविधाओं के लिए फंड क्यों नहीं?
रजिस्ट्रार: यूनिवर्सिटी को राज्य या केंद्र से इस तरह का अलग फंड नहीं मिलता। करीब 7 करोड़ रुपए सालाना मिलते हैं, जो लगभग एक महीने के खर्च के बराबर हैं। लाइट, पंखे, वाई-फाई और सुरक्षा गार्ड जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
सवाल: तीन महीने से मेस बंद क्यों है?
रजिस्ट्रार: मेस के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है। 100 प्रस्ताव आए हैं। इनमें से चयन की प्रक्रिया की जा रही है।
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