दतिया का 'अंतर्कलह' और सियासत का नया संदेश: जब संगठन के अनुशासित तंत्र पर भारी पड़ा अंदरूनी असंतोष
KHULASA FIRST
संवाददाता

इंदौर खुलासा फर्स्ट।
उपचुनाव अक्सर केवल उम्मीदवारों की हार-जीत तय नहीं करते, बल्कि वे सत्ताधारी दलों के भीतर सुलग रहे असंतोष और जनता के मिजाज की परतें खोलकर रख देते हैं। दतिया विधानसभा उपचुनाव का जनादेश भी कोई साधारण चुनावी नतीजा नहीं है।
यह जीत-हार से परे, भाजपा के उस अजेय माने जाने वाले गढ़ में सेंध की कहानी है जहां विपक्ष की ताकत से ज्यादा संगठन के अंदरूनी विरोधाभासों ने खेल बिगाड़ा। चुनाव संपन्न होते ही पराजित प्रत्याशी का अपनों को ही 'भीतरघाती' करार देना इस बात की खुली मुहर है कि सत्ता और संगठन का अनुशासन अब केवल मंचों तक सीमित रह गया है।
विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस ने लगातार दूसरी बार भाजपा को शिकस्त पर मजबूर किया। कांग्रेस के उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के प्रत्याशी आशुतोष तिवारी को 6056 वोटों से कभी न भूलने वाली शिकस्त दी।
पूर्व गृह मंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा के पोलिंग बूथ 121 पर भी भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा। उल्लेखनीय है कि दतिया सीट कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को सहकारी ग्रामीण विकास बैंक फ्रॉड मामले में 2 वर्ष की सजा मिलने के बाद खाली हुई थी।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भारती ने डॉ. नरोत्तम मिश्रा को 7742 वोटों से परास्त किया था।
अपनों का बिखराव
जब सबसे मजबूत किला ही दरक गया...राजनीति में सबसे बड़ा झटका तब लगता है जब नेतृत्व की नींव मानी जाने वाली जमीन ही खिसक जाए। पूर्व कद्दावर मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा के अपने ही पोलिंग बूथ पर पार्टी का पिछड़ जाना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर चेहरे बदलने और असंतोष को दबाने की रणनीति पूरी तरह नाकाम रही।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि टिकट वितरण के बाद जो नाराजगी सतह के नीचे दब गई थी, उसने मतदान के दिन खामोश बगावत का रूप ले लिया। सत्ता के शीर्ष नेतृत्व ने रैलियों और बैठकों का दौर तो चलाया, लेकिन बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं के ठंडे पड़ चुके उत्साह को भांपने में भारी चूक हुई
विपक्ष के लिए जीवनदान और नए नेतृत्व की परीक्षा
लगातार पराजयों के साये में जी रही मध्य प्रदेश कांग्रेस और उसके नए संगठन के लिए यह परिणाम किसी ऑक्सीजन से कम नहीं है। कानूनी बाधाओं के कारण खाली हुई इस सीट को बचाए रखना प्रदेश नेतृत्व की साख की लड़ाई बन चुका था।
जीतू पटवारी के नेतृत्व पर मुहर की तरह है यह जीत। जमीनी मुद्दों को केंद्र में रखकर लड़े गए इस चुनाव ने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में यह विश्वास भरा है कि यदि कैडर एकजुट रहे तो सत्ता की मशीनरी को भी चुनौती दी जा सकती है।
नतीजों के बाद राजधानी के गलियारों में दिखा उत्साह यह दर्शाता है कि एक छोटी सी जीत भी लंबे समय से पस्त पड़े कार्यकर्ताओं के मनोबल को रातों-रात बदल सकती है।
चेतावनी या सबक
जानकारों की राय है कि मुख्यमंत्री और नए प्रदेश अध्यक्ष के नेतृत्व में चुनावी मैदान में उतरी सत्ताधारी पार्टी के लिए यह जनादेश एक कड़ा सबक है। यदि अपनों के बीच उपजी कड़वाहट और गुटबाजी को समय रहते नहीं सुलझाया गया तो यह बीमारी आगामी आम चुनावों में और विकराल रूप ले सकती है।
सत्ता के रसूख और प्रचार के शोर से चुनाव नहीं जीते जा सकते। संगठन के पुराने और समर्पित कैडर को साधे रखना ही असली पूंजी है। दतिया का यह फैसला आने वाले समय के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।
यह बताता है कि जब सत्ता के भीतर असंतोष की आग सुलगती है, तो बाहर का किला चाहे कितना भी मजबूत दिखे, अंदर से उसकी नींव कमजोर हो ही जाती है।
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