मालवा’ में कांग्रेस: बरसों से जो शहर भाजपा का गढ़; वहीं कांग्रेस ने रचा इतिहास
KHULASA FIRST
संवाददाता

भाजपा को भौचक करते हुए कांग्रेस ने राहुल के जरिये पकड़ा ‘सत्ता का रास्ता’
राहुल के शो से निकले संकेत को वक्त रहते समझना होगा भाजपा आलाकमान को, युवा नाराज हैं?
भाजपा के अभेद्य किले में कांग्रेस के झंडे के नीचे हजारों का जुटना दे रहा कई संकेत
तमाम अड़ंगे के बाद भी कार्यक्रम की सफलता बता रही है प्रदेश की राजनीतिक बयार
नितिन मोहन शर्मा 94250-56033, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इंदौर जैसे भाजपाई गढ़ में कांग्रेस ने अपने नेता के नाम और हजार-ओ-हजार ‘रजिस्टर्ड भीड़’ जुटाकर भाजपा को बगलें झांकने पर मजबूर कर दिया है। पार्टी व उसके बड़बोले नेता भले ही राहुल के कार्यक्रम को झूठ की गूंज करार दें, लेकिन वे इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते कि ट्रिपल इंजिन सरकार के दौर में इंदौर में ये क्या और कैसे घट गया?
जिस नेता को ‘सनातन विरोधी’ मुकर्रर कर रखा है, उसे सुनने ‘सनातनियों के गढ़’ में स्वस्फूर्त युवाओं का जुट जाना सामान्य घटना नहीं है। वह भी उस शहर में, जहां कांग्रेस का कोई नामलेवा नहीं। न सांसद, न विधायक, न पार्षदों का हुजूम।
न संगठन की चाक-चौबंद व्यवस्था। न कोई करिश्माई नेता या नेतृत्व। बावजूद इसके कांग्रेस के बुलावे पर युवाओं का इतनी बड़ी संख्या में जुट जाना ‘सत्ता वाली भाजपा’ को कई संकेत कर रहा है।
फिर भी अगर सत्तारूढ़ दल व उसके बड़े नेता ‘शुतुरमुर्ग’ के अंदाज में अपनी गर्दन रेत में धंसी रखे रहें तो ये ‘पार्टी विथ ए डिफरेंस’ के लिए हैरतभरा है। भाजपा को समझना होगा कि कांग्रेस ने अपने नेता के लिए उस मालवा क्षेत्र को चुना है, जहां से प्रदेश की सत्ता का रास्ता जाता है।
शहर भी इंदौर जैसा पसंद किया, जो 1989 से भाजपाई गढ़ है। कांग्रेस ने वाकई ‘कलेजे’ का काम तो कर दिखाया। बस, भाजपा ही इसे बड़े कलेजे के साथ स्वीकार करने से गुरेज कर रही है। कमलदल इस सच्चाई को स्वीकारने में जितनी देर करेगा, अंधेर होगी।
मध्य प्रदेश की सत्ता की राजनीति में एक कहावत आम है- प्रदेश में सरकार बनाने का रास्ता मालवा-निमाड़ से होकर ही गुजरता है। जिस दल ने इस अंचल पर अपना कब्ज़ा कर लिया, भोपाल में उसकी सरकार बनना तय है।
ये महज एक राजनीतिक जुमला या कहावत नहीं, बल्कि हकीकत है। 1990 से आज तक इसी समीकरण ने सूबे में राजनीतिक दलों को सत्ता दी है। कांग्रेस राज्य के इस हिस्से में न के बराबर ही है। मालवा अरसे से भाजपा का अभेद्य गढ़ रहा है।
उसमें इंदौर तो भाजपाई राजनीति के लिहाज से सिरमौर है। इसी मालवा व उसके सिरमौर शहर इंदौर में कांग्रेस ने तंबू गाड़ दिया। निमित्त बना राहुल गांधी का यूथ शो। इस शो से निकले संकेत वक्त रहते भाजपा आलाकमान को समझना होंगे, अन्यथा ये तय है कि इस बार कांग्रेस ने सही वक्त पर ‘सत्ता का रास्ता’ पकड़ लिया है।
प्रदेश में चुनाव में अभी करीब 2 बरस का वक्त है, लेकिन कांग्रेस ने ‘छात्रों की गूंज’ के जरिये अपनी राजनीतिक तैयारी को गुंजायमान कर दिया है।
राहुल गांधी का कार्यक्रम उस शहर में सबसे सफल हो गया, जहां बरसों से कांग्रेस की कोई राजनीतिक ताकत नहीं। न सांसद है 35 बरस से पार्टी का यहां पर और न 25 बरस से नगर निगम में कोई सत्ता।
जिले की 9 विधानसभा सीट में से एक भी कांग्रेस के पास नहीं है। 2023 के चुनाव में तो कांग्रेस का इंदौर जिले से सूपड़ा ही साफ हो गया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सूबे की तमाम 29 सीटें भाजपा के पास पहुंच गईं।
पार्षद भी मुट्ठीभर ही हैं। बावजूद इसके राहुल गांधी के कार्यक्रम के लिए प्रदेश कांग्रेस ने मालवा अंचल का चयन किया और वह भी इंदौर जैसा वह शहर, जो 1989 से भाजपा का अभेद्य किला बना हुआ है।
जिस शहर का चप्पा-चप्पा भाजपाई है, उस इंदौर के एक हिस्से में हजारों की भीड़ का जुट जाना क्या कोई सहज बात है? वह भी तब, जब न सरकार से कोई सहयोग मिला और न स्थानीय प्रशासन से कोई मुरव्वत। उलटे एक के बाद एक नियम-कायदे, कानून, शर्तें और अड़ंगे परोसे गए। बावजूद इसके कार्यक्रम सफल हो गया।
कार्यक्रम की सफलता एक नहीं अनेक संकेत दे गई। वक्त रहते इस इशारे को भाजपा आलाकमान को समझना होगा, अन्यथा इस बार न सिर्फ इंदौर, बल्कि मालवा अंचल में भी कांग्रेस ‘रीजनल पार्क’ जैसा चमत्कार करने की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है।
वैसे ये भी सुनिश्चित है कि भाजपा व उसके बड़े नेता राहुल गांधी के कार्यक्रम को झूठ की गूंज व मिमिक्री सर्कस से जोड़कर बस मन ही हलका कर रहे हैं। हकीकत से वे भी वाकिफ हैं कि ‘अस्त-व्यस्त’ व ‘लस्त-पस्त’ कांग्रेस इंदौर में वो कर गुजरी, जिसका भाजपा तो दूर, स्वयं कांग्रेसियों को भी उम्मीद नहीं थी।
निःसन्देह इसके लिए प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी व उनकी टीम बधाई की पात्र है, जिसने बेहद संयम से अपनी रणनीति व गतिविधियों को अंजाम दिया। सरकार, सत्तारूढ़ दल के नेता व प्रशासन से उलझने में उसने वक्त न गंवाया।
पूरा फोकस ‘रीजनल पार्क’ पर किए रखा। बरसों बाद पूरी कांग्रेस भी गुटीय मतभेद को भुलाकर राहुल गांधी के लिए एकजुट होकर मैदान में उतरी। नतीजा सबके सामने है।
इंदौर की गूंज भोपाल तक, व्हाया मालवा-इंदौर के जरिये...अब भाजपा इस कार्यक्रम को कॉमेडी शो व मां के अपमान के नाम पर कितना ही जोड़ने का प्रयास करे, लेकिन जनसामान्य की नजरों में इंदौर का राहुल गांधी का कार्यक्रम जबरदस्त सफलता के नाम दर्ज हो गया है।
वह भी उस मालवा अंचल व इंदौर में, जहां भाजपा की 3 दशक से ज्यादा समय से तूती बोलती है। उसी क्षेत्र में कांग्रेस ने पंजीकरण कर युवाओं की बड़ी भीड़ जुटाकर साबित कर दिया कि भाजपाई कुनबा अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर कितना ही आत्ममुग्ध रहे, लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट है।
मजे की बात तो ये भी है कि राहुल गांधी के कार्यक्रम की सफलता से भाजपा का खांटी तबका भी प्रसन्न हुआ है कि कम से कम आलाकमान को सूबे की जमीनी राजनीतिक हकीकत तो पता चलेगी।
ये सच्चाई भी है। भाजपा इन दिनों मध्य प्रदेश में कांग्रेस बनी हुई है। बड़े नेताओं के परस्पर मतभेदों ने पार्टी के हाल कांग्रेस की गुटीय राजनीति जैसे कर रखे हैं। यहां तक कि इंदौर में कांग्रेस की सफलता का जिम्मेदार भाजपा को बताने के पीछे कांग्रेसियों से ज्यादा भाजपाई ही हैं।
वे भाजपाई, जो तख्तनशीन नेताओं के गुट से नहीं हैं और फिलहाल हाशिये पर हैं। अगर ये हालात 2027 के नगर निगम, 2028 के विधानसभा चुनाव व 2029 के लोकसभा चुनाव तक जस के तस बने रहे तो ये तय है कि ‘रीजनल पार्क की गूंज’ ताल नगरी भोपाल में गुंजायमान हो जाएगी। वह भी कांग्रेस के बैनर तले, व्हाया मालवा अंचल...!
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