जाम में जकड़ा शहर: बारिश में सड़कों पर रेंगता ट्रैफिक; हर साल बहते करोड़ों रुपए फिर भी पहली मूसलाधार बारिश में शहर की रीढ़ क्यों टूट जाती है
KHULASA FIRST
संवाददाता

नंबर वन का ‘वाटरमार्क’: कागजी दावों के ड्रेनेज में डूबता इंदौर, स्वच्छता में सिरमौर, लेकिन जलभराव में हम क्यों हैं बेबस, क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के दावों की भेंट चढ़ गई व्यवस्था
इंदौर बेहाल दावे फेल...बारिश से शहर बना तालाब, ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त
कमिश्नर क्षितिज सिंघल के मैदानी निरीक्षण के बाद भी हालात बेकाबू, प्रशासनिक अमला लाचार, जनता त्रस्त
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक मिसाल की है, लेकिन मानसून की एक ही जोरदार बारिश इस सुनहरे तमगे के पीछे छिपी एक कड़वी प्रशासनिक हकीकत को उजागर कर देती है। बुधवार की दोपहर बाद आसमान से राहत बनकर उतरी बारिश चंद घंटों में ही इंदौर के लिए आफत की इबारत लिख गई।
स्वच्छता में लगातार देश में नंबर वन का ताज पहनने वाले इस शहर की सड़कें शाम को किसी आधुनिक शहर का हिस्सा नहीं, बल्कि कांक्रीट का एक ऐसा तालाब नजर आ रही थीं, जहां गाड़ियां तैर रही थीं और ‘स्मार्ट सिटी’ का गुरूर पानी-पानी हो रहा था।
यह विरोधाभास सोचने पर मजबूर करता है कि जो शहर सतह की सफाई में चैंपियन है, वह अपनी भूमिगत धमनियों (ड्रेनेज लाइनों) को साफ रखने में इतना अक्षम क्यों है? नगर निगम का ‘प्री-मानसून मेंटेनेंस’ महज फाइलों की धूल झाड़ने तक सीमित रहा है, जिसने मुख्य मार्गों को दरिया और निचली बस्तियों को टापू में तब्दील कर दिया।
गाड़ी धक्का मारके ला रहे हैं, ये नंबर वन है क्या...बुधवार शाम विजय नगर से पलासिया जाने वाली सड़क पर कई जगह घुटनों तक मटमैला पानी भरा था। सड़क चौड़ीकरण के गड्ढों के बीच गाड़ियां फंसी हुई थीं और वाहन चालक आपस में गुत्थमगुत्था हो रहे थे।
पलासिया थाने से पहले अपनी स्कूटी को पानी से बाहर धकेल रहे छात्र का गुस्सा फूट पड़ा-हर साल हम स्वच्छता टैक्स देते हैं। झाड़ू लगाने में हमारा शहर नंबर वन है, तो क्या बारिश का पानी निकालने के लिए हमें खुद ड्रेनेज कमिश्नर बनना पड़ेगा? गाड़ी का प्लग भीग गया, अब धक्का मारके ले जा रहा हूं।
एलआईजी चौराहे से कुछ पहले रेंगते ट्रैफिक में फंसे कार चालक ने अपनी खिड़की का कांच नीचे करते हुए तीखा कटाक्ष किया- सड़कों की खुदाई ने पूरा ढलान बिगाड़ दिया है। सड़क का पानी नालियों में जाने के बजाय वापस ऊपर आ रहा है।
सारे जनप्रतिनिधि हमारे अपनी ही पार्टी (भाजपा) के हैं, लेकिन जब जनता सड़क पर परेशान हो रही है, तब कोई भी नेता या निगम का बड़ा अधिकारी ग्राउंड पर पानी साफ करवाता नजर नहीं आता।
अतीत की गवाही: जब मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग को देना पड़ा था दखल... इंदौर में जलभराव की यह समस्या कोई आकस्मिक आपदा नहीं, बल्कि एक नाकामी है। अगर हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो इसके दस्तावेजी प्रमाण मिलते हैं कि शहर ने पुराने जख्मों से कोई सबक नहीं लिया।
21-22 अगस्त 2020 की वह रात-इंदौर के इतिहास में इस तारीख को कोई नहीं भूल सकता, जब रिकॉर्ड 10 इंच (250 मिमी) मूसलाधार बारिश ने पूरे शहर को टापू बना दिया था।
मानवाधिकार आयोग का चाबुक... इस आपदा के बाद मानवाधिकार आयोग ने जिम्मेदारों को फटकार लगाकर नोटिस दिया था। आयोग ने जल निकासी की खराब व्यवस्था और आपदा प्रबंधन में कमी को लेकर विस्तृत रिपोर्ट मांगी थी, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात।
पिछले कुछ सालों की मानसून रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए। तब गीता भवन, भंवरकुआं, विजय नगर, कनाड़िया रोड और राजबाड़ा की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई थीं। जिम्मेदार हर बार ‘जांच और सुधारीकरण’ का आश्वासन देते हैं, जो अगले मानसून तक ठंडे बस्ते में चला जाता है और प्री-मानसून मेंटेनेंस का बजट पहली ही मूसलधार बारिश में धुल जाता है।
बदहाली और दुर्दशा में सबसे बड़ा कारण... विशेषज्ञों की राय है कि बदहाली और दुर्दशा में सबसे बड़ा कारण बीआरटीएस कॉरिडोर को हटाने की प्रक्रिया और मेट्रो प्रोजेक्ट के पिलर्स के कारण सड़कों के चौड़ीकरण की प्रक्रिया है। एबी रोड पर चल रहे कामों के कारण सड़कों का मूल ढलान बाधित हो चुका है। बीआरटीएस की आधी-अधूरी खुदाई ने बहाव का रास्ता ही बदल दिया। बीआरटीएस की रेलिंग और कांक्रीट मिक्सिंग हटाने के दौरान निकले मलबे को ठीक से डंप नहीं किया गया।
यह मलबा बारिश के पानी के साथ बहकर सड़कों के दोनों ओर बने स्टॉर्म वाटर आउटलेट्स में समा गया। नतीजा यह हुआ कि जो पानी सड़कों से नालों में जाना चाहिए था, उसका गला घोंट दिया गया और वह सड़कों पर ही जमा होकर अचानक आई बाढ़ का रूप ले लेता है।
‘विपक्ष विहीन’ व्यवस्था और जवाबदेही का शून्य... शहर का राजनीतिक परिदृश्य इस समय एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रहा है। निगम में भाजपा की परिषद है, महापौर, शहर के सभी आठ विधायक और सांसद सत्ताधारी दल के हैं, पर विभागों के बीच तालमेल न होना प्रशासनिक नाकामी की पराकाष्ठा है। जब लोकतंत्र में विपक्ष पूरी तरह नदारद या बेहद कमजोर हो जाता है, तो प्रशासनिक मशीनरी की जवाबदेही खत्म होने लगती है। जब कोई तीखा सवाल पूछने वाला राजनीतिक विरोधी न हो, तो केवल फाइलों पर गाद निकालने और नाला सफाई का काम पूरा दिखा दिया जाता है। सत्ता में बैठे लोगों को विपक्ष का डर ही नहीं बचा है, इसलिए सब बेलगाम हो गए हैं।
दावे बनाम हकीकत... हर साल बारिश से पहले निगम दावा करता है कि नालों की सफाई हो चुकी है। क्रेनें खड़ी करके फोटो खिंचवाए जाते हैं, पर बुधवार की बारिश ने दिखा दिया कि यह केवल मुख्य सड़कों की कतरन हटाने तक सीमित थी, उनके भीतर जमा गाद वैसी की वैसी ही थी।
निचली बस्तियों में सीधे तबाही... पॉश कॉलोनियों व मुख्य मार्गों पर लोग चमचमाती गाड़ियों मेंे पानी को कोसते हैं, मुख्य सड़कों की चकाचौंध से दूर नदियों के किनारे बसी निचली बस्तियों में यह मानसून तबाही लेकर आता है। चंद्रभागा, भागीरथपुरा, रावजी बाजार व कनाड़िया के निचले हिस्से इस आपदा में सर्वाधिक परेशानी भुगतते हैं। जब मुख्य नालों में क्षमता से अधिक पानी आता है, तो नदियों में मिलने के बजाय वह पानी बस्तियों की ड्रेनेज लाइनों से उलटा मारने लगता है।
शहर के एक संकरे मोड़ पर मोहल्ले के युवाओं की टोली खुद ही एक चोक हुए ड्रेनेज के चेंबर को बांस-डंडे से खोलने की कोशिश कर रही थी। वहां मौजूद लोग कहते हैं कागजों पर करोड़ों रुपये बह जाते हैं, लेकिन हमारी बस्तियों की किस्मत में हर साल यही नाले का पानी लिखा है।
ये निगम का कमाल है साहब...
जोरदार बारिश ने एक बार फिर नगर निगम की तैयारियों की पोल खोल दी। निपानिया मुख्य मार्ग पर मात्र 100 मीटर की दूरी में दो कारें जलभराव और कीचड़ में फंस गईं। गाड़ियों में बैठे परिवार बारिश के बीच घंटों मदद का इंतजार करते रहे, लेकिन मौके पर न नगर निगम की टीम पहुंची, न पुलिस और न ही प्रशासन का कोई अधिकारी दिखाई दिया।
दुर्भाग्य की बात यह है कि यह स्थिति केवल निपानिया तक सीमित नहीं है। शहर के लगभग हर किलोमीटर पर कहीं जलभराव, कहीं धंसी हुई सड़क, कहीं खुले गड्ढे और कहीं निर्माण कार्य की अव्यवस्था के कारण नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जब जनता को सबसे अधिक आवश्यकता थी, तब जिम्मेदार अमला नदारद रहा।
यदि बरसात के समय भी अधिकारी और फील्ड स्टाफ मैदान में मौजूद नहीं रहेंगे, तो नागरिकों की सुरक्षा और सुविधा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? हर वर्ष मानसून आता है, हर वर्ष यही हालात बनते हैं और हर वर्ष वही दावे दोहराए जाते हैं।
आखिर जवाबदेही तय कब होगी? जनता का सवाल है—क्या जिम्मेदार विभाग केवल कार्यालयों तक सीमित रहेंगे, या फिर संकट की घड़ी में सड़कों पर उतरकर नागरिकों के साथ भी खड़े होंगे?
अपनी विधानसभा के दौरे पर निकलीं विधायक गौड़...
विधानसभा चार की विधायक मालिनी लक्ष्मणसिंह गौड़ भारी बारिश के चलते अपनी विधानसभा के सुदामा नगर, द्वारकापुरी, प्रजापत नगर सहित अन्य कॉलोनियों में भी पहुंचीं व जल निकासी के लिए निगम अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए । इस दौरान एम आई सी सदस्य राकेश जैन भी मौजूद थे। जहां नाले में वाहन गिरा विधायक गौड़ वहां भी पहुंचीं।
केवल झाड़ू लगाकर सतह को चमका देना भर... विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इंदौर को केवल झाड़ू लगाकर सतह को चमका देने भर से एक आदर्श ‘स्मार्ट सिटी’ नहीं माना जा सकता। शहर की सबसे बड़ी तकनीकी खामी यह है कि यहां ‘कांक्रीटीकरण’ इस कदर बढ़ गया है कि जमीन के पास पानी सोखने की क्षमता बची ही नहीं है।
विकास की होड़ में हम यह भूल गए कि पानी को बहने के लिए रास्ता और सोखने के लिए खुली जमीन चाहिए। शहरी नियोजन विशेषज्ञों का मानना है कि इंदौर का मौजूदा ड्रेनेज सिस्टम वर्तमान समय में हो रही अत्यधिक तीव्र वर्षा की घटनाओं के अनुरूप पर्याप्त नहीं रह गया है।
जब तक नगर निगम ऐतहासिक अथवा पुरानी ड्रेनेज लाइनों के पुराने नक्शे को पूरी तरह बदलकर, नए सिरे से ‘स्पंज सिटी’ (जो पानी को सोखे और प्राकृतिक रूप से ड्रेन करे) के सिद्धांत पर काम नहीं करेगा और अपनी स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज क्षमता को अपग्रेड नहीं करेगा, तब तक देश का सबसे स्वच्छ शहर हर साल इसी तरह मानसून के पानी में अपनी साख का ‘वाटरमार्क’ धुंधला होते हुए देखता रहेगा।
शहर में हुई मूसलाधार वर्षा ने फिर नगर निगम के मानसून पूर्व किए गए तमाम दावों और तैयारियों का पूरी तरह खुलासा कर दिया है। देश के सबसे स्वच्छ शहर का ड्रेनेज सिस्टम इस बारिश के सामने पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है।
पूरा शहर इस समय जलजमाव की चपेट में है। वीआईपी इलाकों से लेकर निचली बस्तियों और मुख्य व्यापारिक मार्गों से लेकर रिहायशी कॉलोनियों तक, हर तरफ सिर्फ पानी ही पानी नजर आ रहा है।
सड़कों ने नदियों का रूप लिया...सड़कों ने नदियों का रूप ले लिया है, जिससे पूरा जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर गया है। इस गंभीर संकट और चारों तरफ मचे हाहाकार के बीच निगम की तथाकथित ‘ऑरेंज टीम’ और आपदा प्रबंधन का पूरा तंत्र मैदान पर असहाय और लाचार नजर आ रहा है।
स्थिति इस कदर बेकाबू हो चुकी है कि खुद नगर निगम कमिश्नर क्षितिज सिंघल को भारी बारिश के बीच जलभराव से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों का जायजा लेने के लिए मजबूरन जमीन पर उतरना पड़ा।
जल निकासी के कार्यों का बारीकी से अवलोकन... कमिश्नर सिंघल ने शहर के विभिन्न जलमग्न इलाकों का दौरा किया और वहां चल रहे जल निकासी के कार्यों का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने मौके पर मौजूद अधिकारियों को काम में तेजी लाने और युद्धस्तर पर पानी निकालने के कड़े निर्देश दिए।
लेकिन जमीनी हकीकत इन कागजी और मौखिक निर्देशों से कोसों दूर है। हकीकत यह है कि शहर के अधिकांश हिस्सों में ड्रेनेज और सीवरेज लाइनें पूरी तरह चोक हो चुकी हैं, जिससे बारिश का पानी निकलने के बजाय उल्टे घरों और दुकानों में घुस मार रहा है। नगर निगम द्वारा मानसून से पहले नालों की सफाई के नाम पर जो करोड़ों रुपए बहाए गए थे, उसका सच अब जनता के सामने आ चुका है।
गाड़ियां पानी में तैरती नजर आईं... निकासी के काम में बरती गई घोर लापरवाही और लेटलतीफी के कारण राहगीरों, वाहन चालकों और स्थानीय निवासियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
शहर के कई प्रमुख चौराहों पर कई-कई फीट पानी जमा होने के कारण गाड़ियां पानी में तैरती नजर आईं, जिससे मीलों लंबा ट्रैफिक जाम लग गया और लोग घंटों फंसे रहे।
अधिकारियों की आपात बैठक... इस भारी प्रशासनिक विफलता और जनता के बढ़ते आक्रोश के बीच कमिश्नर सिंघल ने सभी अपर आयुक्तों और जोनल अधिकारियों की आपात बैठक लेते हुए उन्हें अपने-अपने आवंटित जोन क्षेत्रों में लगातार सक्रिय रहने के निर्देश जारी किए हैं।
उन्होंने अधिकारियों को फील्ड पर रहकर जलभराव की स्थिति पर चौबीसों घंटे निगरानी रखने और यातायात प्रबंधन के लिए पुलिस के साथ मिलकर त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है।
नागरिकों की सुरक्षा और सुगम आवागमन प्राथमिकता हो... कमिश्नर ने सख्त लहजे में कहा कि नागरिकों की सुरक्षा और सुगम आवागमन प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए और किसी भी अप्रिय घटना या आपात स्थिति में तत्काल कदम उठाए जाएं।
हालांकि, धरातल पर अधिकारियों को दिए गए ये निर्देश केवल एक कागजी औपचारिकता और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने का जरिया बनते दिख रहे हैं। हकीकत में कंट्रोल रूम के फोन घनघना रहे हैं, लेकिन प्रभावित इलाकों में समय पर न तो मशीनरी पहुंच पा रही है और न ही पर्याप्त अमला।
आपात स्थिति से निपटने के दावों और हकीकत के इसी फासले के बीच इंदौर की बेबस जनता इस समय भारी जलजमाव, आर्थिक नुकसान और प्रशासनिक बदइंतजामी के आंसू रोने को मजबूर है।
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