भागीरथपुरा त्रासदी: न्यायिक रिपोर्ट में 24 मौतों का ठीकरा अफसरों पर
KHULASA FIRST
संवाददाता

600 पन्नों में खुलासा- कागजी खेल में अटकी पाइप लाइन, एमआईसी को क्लीन चिट
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बहुचर्चित भागीरथपुरा दूषित पेयजल कांड की पड़ताल कर उच्च न्यायालय की एक सदस्यीय न्यायिक जांच समिति ने विस्तृत रिपोर्ट पेश कर दी है। सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीलकुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग द्वारा तैयार 600 पन्नों का यह दस्तावेज फिलहाल हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार कार्यालय में सुरक्षित रखा गया है।
भले ही अदालत की ओर से सार्वजनिक किया जाना बाकी है, फिर भी इसके मुख्य निष्कर्षों से प्रशासनिक अमले की गंभीर लापरवाही सामने आ गई है। जांच के नतीजों ने साफ़ कर दिया है 36 में से 24 नागरिकों की जान जाने का सीधा और प्राथमिक कारण पाइपलाइन से मिला दूषित पानी ही था। बाकी 12 मौत की वजह स्पष्ट नहीं हो सकी है।
आयोग का निष्कर्ष है नगर निगम ने वक्त रहते कदम उठाए होते तो दर्जनों लोगों की जान नहीं जाती। भागीरथपुरा क्षेत्र में सप्लाई के लिए बिछाई गई पाइपलाइन कई स्थानों से पूरी तरह गल चुकी थी। इस खराब लाइन को बदलने की शुरुआती प्रक्रिया 2019-20 में ही शुरू कर दी गई थी।
इसके बावजूद अधिकारी जमीनी स्तर पर काम के बजाय केवल कागजी पत्राचार, फाइलें सरकाने और टेंडर की औपचारिकताओं में समय गंवाते रहे। टेंडर प्रक्रिया तथा प्रशासनिक मंजूरियों में ढिलाई की वजह से सालों तक नई लाइन नहीं डाली जा सकी, जिसका खमियाजा अंततः निर्दोष रहवासियों को भुगतना पड़ा।
आयोग ने नगर निगम के जलकार्य विभाग और जन स्वास्थ्य यांत्रिकी (पीएचई) से जुड़े मध्य व निचले स्तर के प्रशासनिक तथा तकनीकी अधिकारियों की लापरवाही का विश्लेषण किया है। जांच के दायरे में तत्कालीन निगम आयुक्त आशीष सिंह, तत्कालीन अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया, संदीप सोनी तथा पीएचई विभाग के कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव का कामकाज रहा। इनमें से कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव की भूमिका को सबसे अधिक गैर-जिम्मेदाराना माना गया है।
उल्लेखनीय है इस घटनाक्रम के बाद पैदा हुए गुस्से को देखते हुए तत्कालीन निगम आयुक्त दिलीप यादव और अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया का तबादला कर दिया गया था, जबकि बाद में सिसोनिया और श्रीवास्तव दोनों को निलंबित भी किया गया।
दूसरी तरफ, न्यायिक जांच समिति की इस रिपोर्ट से राजनीतिक और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों को राहत मिली है। आयोग ने स्थानीय जनप्रतिनिधियों, मेयर इन काउंसिल (एमआईसी) और सर्वोच्च नीति-निर्धारक संस्था की किसी भी सीधी जवाबदेही से इनकार किया है। एमआईसी को पूरे मामले में क्लीन चिट दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार यह दुखद घटनाक्रम नीतिगत निर्णय की असफलता नहीं, बल्कि निचले और मध्यम स्तर के तकनीकी अमले की नाकामी का परिणाम था।
प्रत्येक मृतक के परिजन को 20 लाख रुपए मदद की सिफारिश
नुकसान की भरपाई के लिए जांच आयोग ने सिफारिश की है कि इस पानी के सेवन से जान गंवाने वाले प्रत्येक मृतक के परिजन को 20 लाख रुपये की सहायता राशि दी जाए। साथ ही, गंभीर रूप से बीमार हुए और अस्पताल में भर्ती रहे पीड़ितों को 5 लाख रुपये प्रति व्यक्ति मुआवजा देने का सुझाव दिया गया है।
न्यायालयीन प्रक्रिया के तहत याचिकाकर्ता प्रमोद द्विवेदी की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता मनीष यादव और अभिभाषक रितेश इनानी ने हाई कोर्ट के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर जांच रिपोर्ट को तुरंत सार्वजनिक करने और सभी पक्षों को इसकी अधिकृत प्रति उपलब्ध कराने की मांग की है।
वकीलों का कहना है मामला केवल भागीरथपुरा तक सीमित नहीं हो। उद्देश्य इंदौर की पूरी जलापूर्ति व्यवस्था में सुधार और भविष्य में किसी भी अन्य मोहल्ले में ऐसी दुखद स्थिति को रोकना होना चाहिए। आगामी सुनवाई में हाई कोर्ट रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर अंतिम फैसला सुनाएगा।
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