जयवर्धन अपने पिता के दस वर्ष के शासन का आईना देखें
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष वाधवानी सांसद प्रतिनिधि, भाजपा, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जयवर्धन सिंह जिस प्रकार भाजपा पर बयानबाजी कर रहे हैं, उससे ऐसा लगता है कि उन्हें अपने पिता दिग्विजय सिंह के 1993 से 2003 तक के मुख्यमंत्री कार्यकाल का इतिहास या तो याद नहीं है या वे जनता को याद नहीं दिलाना चाहते। 1993 से 2003 का वह दशक मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में आज भी अनेक गंभीर प्रशासनिक और आर्थिक प्रश्नों के लिए जाना जाता है।
यदि आज भाजपा सरकार के कामकाज पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, तो जयवर्धन सिंह को एक बार पीछे मुड़कर यह भी देखना चाहिए कि उनके पिता के दस वर्ष के शासन में प्रदेश की आर्थिक संस्थाओं, सार्वजनिक परिवहन, प्रशासनिक व्यवस्था और आधारभूत ढांचे की स्थिति क्या थी।
मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम इसका एक बड़ा उदाहरण है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायिक रिकॉर्ड में दर्ज है कि 31 मार्च 2004 तक एमपीएसआरटीसी का कुल घाटा 735 करोड़ रुपए और उसकी देनदारियां 1,033.68 करोड़ रुपए हो चुकी थीं। निगम लगभग 5 करोड़ रुपए प्रतिमाह के लगातार घाटे में चल रहा था और कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति संबंधी भुगतान तक समय पर नहीं हो पा रहे थे।
बाद में केंद्र सरकार की अनुमति के पश्चात 2005 में निगम को बंद करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में भी यह दर्ज है कि निगम लगातार घाटे में चल रहा था और राज्य सरकार ने उसके विडिंग अप के लिए केंद्र सरकार से अनुमति प्राप्त की थी, इसलिए सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को आपके पिता के शासनकाल के अंत तक आर्थिक रूप से इतना कमजोर छोड़ दिया गया था, उस पर आज आप किस मुंह से राजनीतिक उपदेश दे रहे हैं?
मध्य प्रदेश की सड़कों पर देशभर में होता था व्यंग्य
डॉ. वाधवानी ने कहा है कि उस समय मध्य प्रदेश की सड़कों की हालत भी जनता के बीच चर्चा का विषय थी। दूसरे राज्यों से मध्य प्रदेश आने वाले लोग मजाक में कहते थे कि बस में बैठे-बैठे सड़कों के गड्ढों और झटकों से ही पता चल जाता है कि मध्य प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर चुके हैं।
यह केवल राजनीतिक व्यंग्य नहीं था, बल्कि उस समय प्रदेश की सड़कों और आधारभूत ढांचे को लेकर जनता की धारणा का प्रतीक था। यदि शासनकाल की प्रशासनिक कार्यप्रणाली की बात करें तो 1993-2003 के दौरान विधानसभा सचिवालय में नियुक्तियों को लेकर बाद में गंभीर अनियमितताओं के आरोपों पर एफआईआर और जांच भी हुई।
इसी अवधि से संबंधित एमपीएसआईडीसी के 714 करोड़ रुपए के इंटर कॉर्पोरेट डिपॉजिट्स को लेकर भी बाद में जांच और विवाद सामने आया, इसलिए जयवर्धन सिंह को भाजपा पर टिप्पणी करने से पहले अपने परिवार के राजनीतिक अतीत का रिपोर्ट कार्ड भी जनता के सामने रखना चाहिए।
आज मध्य प्रदेश की जनता भाजपा को बार-बार अपना समर्थन क्यों देती है, इसका जवाब भी इसी राजनीतिक इतिहास में छिपा है। जनता ने वह दौर देखा है और आज का दौर भी देख रही है। राजनीति केवल सोशल मीडिया पोस्ट और बयानों से नहीं चलती। राजनीति काम के रिपोर्ट कार्ड से चलती है।
पहले 1993 से 2003 का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखिए
जयवर्धन सिंह से मेरा सीधा सवाल है कि यदि आपको भाजपा के शासन पर सवाल उठाने का अधिकार है, तो क्या मध्य प्रदेश की जनता को आपके पिता के दस वर्ष के शासन का हिसाब पूछने का अधिकार नहीं है?
पहले 1993 से 2003 का रिपोर्ट कार्ड जनता के सामने रखिए, फिर भाजपा से रिपोर्ट कार्ड मांगिए। मध्य प्रदेश की जनता सब देखती है, सब याद रखती है और समय आने पर उसका जवाब भी देती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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