हांका लगाकर ‘शेर’ का शिकार करने की कोशिश: लड़ाई निर्णायक नहीं; नैरेटिव बना रही कांग्रेस
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ढाई वर्ष में मजबूत जननेता, जनहितैषी लेकिन उतने ही कठोर शासक के रूप में स्थापित हुए हैं। विपक्ष लगातार उन्हें बड़े घोटाले मे फंसाने की कोशिश करता रहा है लेकिन कभी सफल नहीं हो पाया।
इस समय आक्रामक हल्लाबोल वाली संघ भाजपा की शैली की तरह शेर का शिकार करने की कोशिश की है। जमीन की लड़ाई लड़ने के लिए पसीना पसीना विपक्ष में जमीन को हथियार बनाया है और इसके लिए बाकायदा एक मचान तैयार कर शेर यानी मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत आक्रमण करने की सिलसिलेवार रणनीति बनाई है।
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कांग्रेस की रणनीति रूपक के तौर पर ‘मचान बनाकर शिकार’ या ‘हांका लगाकर घेराबंदी’ जैसी रणनीति पर काम करने की है लेकिन सीधे मुख्यमंत्री को किसी एक बड़े घोटाले में फंसाना आसान नहीं है।
उसकी रणनीति है लगातार आरोप, दस्तावेज, प्रेस कॉन्फ्रेंस, मीडिया रिपोर्ट और जनसभाओं के माध्यम से दबाव बनाया जाए, ताकि मुख्यमंत्री को लगातार सफाई देने की स्थिति में रखा जा सके। इस तरह धीरे-धीरे उनकी राजनीतिक छवि को कमजोर किया जाए।
भारतीय राजनीति में विपक्ष अक्सर यही रणनीति अपनाता है। किसी नेता को तत्काल हटाना उद्देश्य नहीं होता, बल्कि उसकी ‘राजनीतिक अभेद्यता’ को तोड़ना लक्ष्य होता है। जहां तक डॉ. मोहन यादव का सवाल है उनकी सरकार और उनका दायित्व चुनौतीविहीन है।
जानकारों का मानना है राजनीतिक दृष्टि से यह लड़ाई अभी किसी निर्णायक निष्कर्ष की नहीं, बल्कि ‘नैरेटिव निर्माण’ की है। कांग्रेस मुद्दे को लंबे समय तक जीवित रखना चाहती है, जबकि भाजपा इसे तथ्यात्मक स्पष्टीकरण देकर समाप्त करने की कोशिश कर रही है।
आने वाले समय में नए दस्तावेज, जांच या राजनीतिक घटनाक्रम ही तय करेंगे कि यह विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप बनकर रह जाता है या मध्य प्रदेश की राजनीति का बड़ा मुद्दा बनता है।
दम नहीं कांग्रेस के आरोपों में... प्रतीत हो रहा है कांग्रेस के आरोप किसी भी तरह से मजबूत नहीं है इसलिए कांग्रेस की रणनीति ‘एक ही वार में शिकार’ की नहीं बल्कि ‘लंबी घेराबंदी’ की प्रतीत होती है।
जहां उद्देश्य मुख्यमंत्री को लगातार रक्षात्मक स्थिति में रखना और उनकी सार्वजनिक छवि को चुनौती देना है लेकिन यह रणनीति तभी सफल मानी जाएगी जब आरोपों को नए तथ्य, व्यापक जनसमर्थन या संस्थागत जांच का सहारा मिले। अन्यथा यह मुद्दा कुछ समय बाद सामान्य राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो सकता है।
अखिलेश यादव का समर्थन... कांग्रेस के लिए यह विषय राजनीतिक रूप से केवल भूमि खरीद का नहीं, बल्कि विश्वसनीयता, पारदर्शिता और नैतिक जवाबदेही का प्रश्न बनाने की कोशिश है। इसलिए सत्ता पक्ष के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता अधिकतम पारदर्शिता के प्रति खुलापन दिखाना होगा।
इधर अपने समाज और संबंधों के दायित्व का निर्वहन कर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने जहां मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का सीधे-सीधे बचाव किया है वहीं भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधते हुए गहरा कटाक्ष किया है।
अखिलेश के बयान से कांग्रेस को जरूर निराशा हुई है लेकिन भाजपा की राजनीति भीतरी भीतर गरमा गई है। भाजपा के अंदरूनी षड्यंत्र की बात कह कर अखिलेश ने एक तरह से मुख्यमंत्री की उनकी ही पार्टी भाजपा से उत्पन्न खतरे से सुरक्षित करने का संदेश हाईकमान को दिया है
उल्लेखनीय है कांग्रेस के आरोपों के बीच समाजवादी पार्टी प्रमुख के बयान ने इस विवाद को नई धार दे दी है। अखिलेश यादव ने दावा किया भाजपा के भीतर ही कुछ ताकतें डॉ. मोहन यादव को कमजोर करने का प्रयास कर रही हैं और भूमि सौदों का मामला उसी राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा हो सकता है। इस बयान से यह भी स्पष्ट है कांग्रेस के आरोप निराधार हैं। विपक्ष में रहते हुए भी अखिलेश ने कांग्रेस के आरोपो का समर्थन नहीं किया है।
कांग्रेस का आरोप है मुख्यमंत्री के परिवार और उनसे जुड़ी संस्थाओं ने उज्जैन क्षेत्र में बड़ी मात्रा में जमीन खरीदकर "लैंड बैंक" तैयार किया है, जिससे भविष्य की विकास परियोजनाओं का लाभ मिल सके।
कांग्रेस इस मामले को हितों के टकराव और सत्ता के दुरुपयोग से जोड़कर लगातार राजनीतिक हमला कर रही है। दूसरी ओर भाजपा और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है।
पार्टी संगठन का कहना है उनकी व्यक्तिगत भूमि में कोई वृद्धि नहीं हुई है तथा परिवार की अधिकांश जमीनें उनके मुख्यमंत्री बनने से पहले खरीदी गई थीं। भाजपा का दावा है विपक्ष तथ्यों के बजाय भ्रम फैला रहा है।
सरकार पर संकट नहीं
डॉ. मोहन यादव के संदर्भ में कांग्रेस के सामने चुनौती यह है भाजपा के पास विधानसभा में भारी बहुमत है। मुख्यमंत्री को पार्टी नेतृत्व का समर्थन प्राप्त है। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार सीधे हाईकमान के नियंत्रण में है इसलिए उन्हें कमजोर करने की राजनीति किसी भी तरह सफल नहीं हो सकती।
इस समय ऐसे भी कोई हालात नहीं सरकार पर कोई राजनीतिक संकट है। ऐसी स्थिति में विपक्ष का लक्ष्य सरकार की बजाए मुख्यमंत्री की छवि पर प्रश्नचिह्न लगाना, भाजपा के भीतर निराशा और अविश्वास और असहजता पैदा करना, मीडिया विमर्श को अपने पक्ष में मोड़ना और भविष्य के चुनावों के लिए मुद्दा तैयार करना है।
इस दृष्टि से भूमि विवाद को कांग्रेस ‘एकल आरोप’ के रूप में नहीं बल्कि ‘नैरेटिव सेटिंग’ के रूप में इस्तेमाल कर रही है तो ऐसी स्थिति में सवाल उठ रहे हैं क्या इससे मुख्यमंत्री अस्थिर हो सकते हैं? केवल आरोपों से सामान्यतः कोई मुख्यमंत्री अस्थिर नहीं होता।
जवाब में राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि अस्थिरता तब पैदा होती है जब आरोपों को साबित किया जा सके और जांच हो, अदालतें हस्तक्षेप करें, या सत्तारूढ़ दल के भीतर असंतोष पैदा हो। फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि मोहन यादव की सरकार या पद तत्काल खतरे में है।
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