देवभूमि का एक अनसुना कोना: केदारनाथ मार्ग पर ‘मुंडकटा गणेश’ : जहां शिव ने काटा था विनायक का शीश
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संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
जहां ‘विनायक’ बने ‘गजानन’: केदारनाथ मार्ग के घने जंगलों में छिपा है प्रथम पूज्य का सबसे पहला आदि-तीर्थ
गवाह है गौरीकुंड की यह रहस्यमयी शिला! महादेव के त्रिशूल से जहां कटा था बालक का मूल मानवीय शीश
माता की आज्ञा के लिए जब काल से भी लड़ गया बालक: जानिए केदारघाटी के ‘मुंडकटा गणेश’ की विस्मयकारी गाथा
केदारनाथ के मुख्य मार्ग से हटकर एक अनसुना कोना: आधुनिक चकाचौंध से दूर, क्यों खास है ‘मुंडकटा गणेश’ का यह मंदिर
रुद्रप्रयाग जिले में स्थित बाबा केदारनाथ का धाम कोटि-कोटि श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।
हर साल लाखों यात्री केदारनाथ की कठिन पैदल यात्रा पर निकलते हैं, लेकिन इस मुख्य मार्ग के आस-पास कई ऐसे विस्मयकारी और प्राचीन स्थल छिपे हैं, जिनका पौराणिक महत्व संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। ऐसा ही एक परम पावन और अमूमन अनसुना कोना केदारनाथ पैदल मार्ग के शुरुआती पड़ाव ‘गौरीकुंड’ के समीप स्थित है, जिसे स्थानीय लोग और पुराण ‘मुंडकटा गणेश’ मंदिर के नाम से जानते हैं। यह देवभूमि का वह अत्यंत प्राचीन स्थल है, जो भगवान श्रीगणेश के गजानन (हाथी के सिर वाले देवता) बनने की युगांतरकारी घटना का साक्षात साक्षी है। मान्यता है कि यही वह स्थान है जहां स्वयं भगवान शिव ने अज्ञानवश बालक विनायक का शीश धड़ से अलग किया था। आज भी यह मंदिर आस्थावानों के लिए एक महान संदेश और शिव-पार्वती के अलौकिक मिलन के प्रतीक के रूप में अडिग खड़ा है।
माता की आज्ञा और बालक विनायक का कड़ा पहरा
इस मंदिर की स्थापना के पीछे की कथा का वर्णन शिव महापुराण के रुद्रसंहिता खंड में मिलता है। माता पार्वती जब केदारखंड के इस सुरम्य अंचल गौरीकुंड में स्नान करने जा रही थीं, तब वहां कोई रक्षक नहीं था। माता ने स्नान गृह की सुरक्षा के लिए अपने शरीर के मैल और हिमालय की विशेष मटियाल (औषधीय मिट्टी) एकत्र कर एक अत्यंत सुंदर बालक की आकृति बनाई और उसमें अपने तपोबल से प्राण फूंक दिए। माता ने उस बालक का नाम विनायक रखा और उसे निर्देश दिया कि जब तक वे स्नान कर बाहर न आएं, किसी भी पुरुष या देवता को भीतर प्रवेश करने की अनुमति न दी जाए। माता की आज्ञा को सर्वोपरि मानकर बालक विनायक हाथ में दंड लेकर गुफा के द्वार पर पूरी निष्ठा से पहरा देने लगे।
विनायक का हठ और ब्रह्मांडीय युद्ध का क्षण
उसी समय कैलाशपति भगवान शिव माता पार्वती से मिलने वहां पहुंचे। जैसे ही उन्होंने भीतर जाने का प्रयास किया, द्वार पर मुस्तैद बालक विनायक ने शिव जी को रोक दिया। महादेव इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि यह बालक स्वयं पार्वती की ही चेतना का अंश है। शिव जी ने बालक को समझाने का प्रयास किया कि वे पार्वती के स्वामी हैं, परंतु अपनी माता की आज्ञा के प्रति पूर्ण समर्पित विनायक टस से मस नहीं हुए और उन्होंने महादेव का मार्ग रोके रखा। इस हठ को देखकर महादेव के गणों और देवताओं का बालक से भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन माता के वरदान से सुरक्षित विनायक ने सबको परास्त कर दिया।
पार्वती का रौद्र रूप, गजानन का जन्म और मंदिर की वर्तमान महत्ता
जब माता पार्वती बाहर आईं और अपने प्रिय पुत्र को शीशविहीन देखा, तो वे अत्यंत व्याकुल और क्रोधित हो उठीं। उनके आदि-शक्ति रूप के जाग्रत होते ही हाहाकार मच गया। शिव के आदेश पर देवता उत्तर दिशा से हथिनी के नवजात का सिर लेकर आए। महादेव ने शीश को बालक के धड़ से जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित किया।
आधुनिक चकाचौंध से दूर: इतिहास और आस्था का सजीव संगम
आज के समय में जो श्रद्धालु केदारनाथ यात्रा के दौरान थोड़ा समय निकालकर इस गुप्त तीर्थ तक पहुंचते हैं, वे यहाँ की असीम शांति और प्राचीनता को देखकर दंग रह जाते हैं। मुख्य मार्ग से थोड़ा हटकर घने पेड़ों के बीच स्थित यह छोटा सा मंदिर आधुनिक चकाचौंध से दूर त्रेता और द्वापर के संगम काल की याद दिलाता है।
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