कफन-दफन के नाम पर अनियमितता और कार्यालय में शराबखोरी के दावे: महाकाल संस्था पर गंभीर आरोप
KHULASA FIRST
संवाददाता
एमवाय अस्पताल परिसर में संचालित संस्था को लेकर शिकायतें मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंचने का दावा, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग के भी लगाए गए आरोप
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
एमवाय अस्पताल परिसर में निराश्रितों की सेवा और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का कार्य करने वाली महाकाल संस्था एक बार फिर विवादों में है।
संस्था पर कफन-दफन के नाम पर कथित आर्थिक अनियमितता, कार्यालय में शराबखोरी और सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि पूरे मामले की शिकायत मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुकी है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है।
जानकारी के अनुसार, 9 जुलाई 2025 को पंजीकृत हुई संस्था को एमवाय अस्पताल परिसर में लगभग 200 वर्गफीट स्थान और एक सरकारी एंबुलेंस उपलब्ध कराई गई थी।
इसका उद्देश्य लावारिस शवों के अंतिम संस्कार और जरूरतमंद मरीजों की सहायता जैसे सामाजिक कार्यों को सुचारु रूप से संचालित करना बताया गया था।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि संस्था के कार्यालय का उपयोग सामाजिक कार्यों के बजाय अन्य गतिविधियों के लिए किया जा रहा है।
आरोपों में कार्यालय में शराब सेवन, अनधिकृत वसूली और सरकारी संसाधनों के निजी उपयोग जैसी बातें भी शामिल हैं। इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के नाम पर लेते हैं रुपए
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि लावारिस शवों के अंतिम संस्कार के नाम पर समाजसेवियों, व्यापारियों और अन्य लोगों से आर्थिक सहयोग लिया जाता है, लेकिन उसका पूरा उपयोग अंतिम संस्कार में नहीं किया जाता।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि प्राप्त राशि का बड़ा हिस्सा अन्य कार्यों में खर्च किया जाता है। इन आरोपों की भी अभी किसी सक्षम जांच एजेंसी ने पुष्टि नहीं की है।
संस्था के पदाधिकारियों सुरेश मोरे और जयदीप उर्फ जयू जोशी के राजनीतिक संबंधों को लेकर भी शिकायत में सवाल उठाए गए हैं। साथ ही सुरेश मोरे के खिलाफ वर्ष 2021 में दर्ज एक पुराने आपराधिक प्रकरण का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि किसी पुराने प्रकरण का वर्तमान आरोपों से सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ है।
फिलहाल इन सभी आरोपों पर संबंधित संस्था या पदाधिकारियों का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। यदि शासन या संबंधित विभाग द्वारा जांच कराई जाती है, तो उसके निष्कर्षों के आधार पर ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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