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आखिर इंसानी जान की कीमत आवारा कुत्ते की जान से ज्यादा है

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संवाददाता

23 मई 2026, 5:27 pm
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आखिर इंसानी जान की कीमत आवारा कुत्ते की जान से ज्यादा है

अजय बोकिल स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ताजा फैसले में देश में आवारा और खतरनाक कुत्तों को लेकर किसी भी तरह की सहानुभूति और करूणा दिखाने की जगह इंसानी जिंदगी पर मंडराते खतरे को रोकने के लिए पागल और खतरनाक कुत्तों को मारने की इजाज़त दे दी।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सम्बन्धित अधिकारी, पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) नियमों और दूसरे लागू कानूनी प्रोटोकॉल के मुताबिक, कानूनी तौर पर मंजूर उपाय कर सकते हैं, जिनमें उन कुत्तों को मारना भी शामिल है, जो लाइलाज बीमार हैं, पागल या साफ तौर पर खतरनाक और आक्रामक हैं। ताकि इंसानी ज़िंदगी और सुरक्षा पर मंडराते खतरे को असरदार तरीके से खत्म किया जा सके।

यही नहीं सर्वोच्च अदालत ने सभी हाई कोर्ट्स को इस मामले की निगरानी के निर्देश दिए हैं, साथ ही लापरवाह अधिकारियों पर अवमानना कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त आदेश से जहां श्वान पीडि़तों में राहत है, वहीं श्वान प्रेमियों में गहरी निराशा है।

ये लोग कुत्तों को इस तरह मारे जाने को ‘घटती मानवीय गरिमा’ से जोड़कर इसकी आलोचना कर रहे हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि आवारा कुत्ते के काटे जाने से एक बेगुनाह इंसान के मर जाने की तुलना में खतरनाक कुत्ते को जान से मार देना मानवीय गरिमा को घटाना है। कुत्तों के पक्ष में खड़े ज्यादातर पशु प्रेमी वो हैं, जिनका साबका अपने किसी करीबी की रेबीज से मौत से शायद नहीं पड़ा है।

बेशक, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर भी बहस शुरू हो गई है। लेकिन यह मान लेना कि इंसानी जान की कीमत एक कुत्ते की जान की तुलना में कमतर है, खुद को धोखे में रखने जैसा है। जान चाहे इंसान की हो या फिर चींटी की, जान, जान है, लेकिन वह क्यों और कैसे ली जा रही है या गंवाई जा रही है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

देश में आवारा कुत्तों की संख्या करीब 6 से 7 करोड़ बताई जाती है यानी कि औसत हर 20 भारतीयों के पीछे एक आवारा कुत्ता है तथा इनमें से एक फीसदी भी खतरनाक या पागल होंगे तो इनकी तादाद 6-7 लाख से कम नहीं होगी।

इतने कुत्ते कितने लोगों की जान ले सकते हैं, यह सोचें तो भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे। इनमें पालतू कुत्तों की संख्या शामिल नहीं है, क्योंकि वो सुरक्षा कारणों से, रईसी का दिखावा करने की चाहत में अथवा शुद्ध श्वान प्रेम के कारण पाले जाते हैं।

चिंता की बात यह है कि हमारे देश में आवारा कुत्तों की आबादी बढ़ने, उनकी प्रजनन क्षमता पर अंकुश लगाने तथा किन्हीं कारणों से पागल और हिंसक हो चुके कुत्तों पर नियं‍त्रण की कोई कारगर व्यवस्था नहीं है।

कुछ स्थानों पर कुत्तों की नसबंदी वगैरह की जाती है, लेकिन वो बहुत कारगर नहीं है। कुछ आवारा कुत्तों को पकड़कर दूर कहीं जंगल में छोड़ दिया जाता है और उनमें से ज्यादातर वापस अपनी गलियों में लौटकर ‘शेर’ हो जाते हैं। यूं कुत्ता मनुष्य का दोस्त है, लेकिन हिंसक होने पर वह सारे रिश्ते भूल जाता है।

भारत में हर साल कुत्ता काटने से करीब 15 से 20 हजार लोगों की मौत होती है। कुत्ता काटने के बाद जो लोग समुचित इलाज के अभाव में रेबीज का शिकार हो जाते हैं, उनकी हालत कुत्तों से भी बदतर हो जाती है, लेकिन श्वान प्रेमी कुत्तों के इस नकारात्मक पहलू को करूणा की दरी के नीचे खिसकाना बेहतर समझते हैं।

वैसे यह मामला पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट में आया था। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने आवारा कुत्तों के खतरे को लेकर स्वत: संज्ञान लिए गए मामले में यह निर्देश दिया था कि अस्पतालों, बस अड्डों, स्कूलों, रेलवे स्टेशनों जैसी सार्वजनिक जगहों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को टीकाकरण या नसबंदी के बाद उसी जगह पर वापस नहीं छोड़ा जाएगा।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि अधिकारियों को ऐसे परिसरों से मौजूद आवारा कुत्तों को हटाकर उनकी नसबंदी करानी होगी। इसके बाद उन्हें डॉग शेल्टर में भेजना होगा। हालांकि तब इस फैसले की व्यावहारिकता पर सवाल उठे थे और कुत्तों के साथ इस तरह के व्यवहार को अमानवीय (या अश्वाननीय?) कहा गया था।

इसके खिलाफ एनिमल वेलफ़ेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (एसओपी) को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं कोर्ट में दायर हुई थीं, उन्हें भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

यानी कोर्ट ने अपने पुराने फैसलो को वापस लेने से इंकार कर ‍िदया। कुत्तों के प्रति लाख सहानुभूति के बाद भी कड़वी सच्चाई यही है कि आज आवारा कुत्ते बच्चों और बुजुर्गो के लिए मौत का परवाना बन गए हैं।

यद्यपि कोर्ट के इस आदेश पर सख्तीक से पालन पर अभी भी प्रश्न चिन्ह है। बावजूद इसके कि कोर्ट ने माना कि आवारा कुत्तों के काटने से लोगों की जान जाने की समस्या बेहद गंभीर रूप ले चुकी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुरक्षित व्यवस्थाै बनाने में नाकाम अफसरों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई भी की जा सकती है।

इसमें दो राय नहीं कि कुत्तों को भी जीने का और पूरी गरिमा के साथ जीने का हक है। मूक प्राणियों के प्रति संवेदना मानवीय गुण है। लेकिन असल सवाल यह है कि कुत्ता अगर ‘श्वान’ न रहकर सचमुच ‘कुत्ता’ हो जाए तो मनुष्य को क्या करना चाहिए?

क्या वह अपनी जान गंवाने का जोखिम उठाता रहे और कुत्तों की जान बख्शता रहे? जो लोग इस फैसले का विरोध कर रहे हैं, वो कुत्तों के मानवाधिकार को मानवीय गरिमा की रक्षा के साथ जोड़कर देख रहे हैं।

जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस जाले को यह कहकर साफ किया है कि "गरिमा के साथ जीने के अधिकार में यह अधिकार भी शामिल है कि व्यक्ति कुत्तों के हमलों के डर के बिना स्वतंत्र रूप से जीवन जी सके। लिहाजा राज्य मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकता।

अदालत भी उन कठोर ज़मीनी हक़ीक़तों से आंखें नहीं मूंद सकती, जहां बच्चे, विदेशी यात्री और बुज़ुर्ग कुत्तों के काटने की घटनाओं का शिकार हुए हैं। संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता, जहाँ बच्चों और बुज़ुर्गों का जीवन केवल शारीरिक ताक़त या क़िस्मत के भरोसे हो।

" जाहिर है कि यह फैसला पशु संवेदना के खिलाफ नहीं है। केवल आवारा, हिंसक और पागल हो चुके कुत्तों को लेकर है। आवारा कुत्तों का हर संभव इलाज किया जाए, उन्हें खाना खिलाया जाए, उन्हें आवारा बनने और इंसान पर हमला करने से रोका जाए इत्यादि बातें सैद्धांतिक तौर पर रंजक और आदर्शवादी लगती हैं।

लेकिन जरा उन परिवारों के दुख पर भी निगाह डालिए, जिन्होंने आवारा कुत्त के काटे जाने के बाद अपने किसी परिजन को खोया है। कई ऐसे फूल हैं, जो खिलने के पहले ही मुरझा गए और कई ऐसे हैं, जिन्होंने ऐन जवानी या बुढ़ापे में असमय प्राण गवां दिए हैं।

यह कोई पशुप्रेम की राह में दी गई शहादत नहीं है, बल्कि आवारा कुत्तों को दी गई विवशताजनित अबाध छूट अथवा कुत्तों को मानव से भी ज्यादा जरूरी प्राणी मान लेने के दुराग्रह का नतीजा है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)
सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त आदेश से जहां श्वान पीडि़तों में राहत है, वहीं श्वान प्रेमियों में गहरी निराशा है। ये लोग कुत्तों को इस तरह मारे जाने को ‘घटती मानवीय गरिमा’ से जोड़कर इसकी आलोचना कर रहे हैं।

इसका सीधा अर्थ यही है कि आवारा कुत्ते के काटे जाने से एक बेगुनाह इंसान के मर जाने की तुलना में खतरनाक कुत्ते को जान से मार देना मानवीय गरिमा को घटाना है।

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