समाज के लिए मिलावटखोरी बेहद खतरनाक
KHULASA FIRST
संवाददाता

जब भोजन और जीवनरक्षक दवाइयां भी लाभ कमाने की अंधी दौड़ का माध्यम बन जाएं, तब यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के अस्तित्व पर सुनियोजित हमला है
राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
राज्य की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की जान की रक्षा करना है, लेकिन जब नागरिक प्राणरक्षक भोजन और दवा से मरने लगें, तब यह प्रश्न केवल कानून का नहीं, बल्कि मानवता के चारित्रिक पतन का बन जाता है।
इतिहास में युद्धों ने करोड़ों लोगों की जान ली है। आतंकवाद ने समाज में भय पैदा किया है। महामारी ने देशों की चूलें हिला दी हैं, लेकिन एक ऐसा अदृश्य युद्ध लगातार चल रहा है, जिसमें न गोलियां चलती हैं, न बम गिरते हैं और न ही दुश्मन सीमा पार से आता है।
यह युद्ध हमारी रसोई में, हमारी थाली में, हमारे बच्चों के दूध में और अस्पतालों की दवाइयों के माध्यम से मानवता के विरुद्ध चल रहा है। इसका सबसे भयावह पक्ष यह है कि अधिकांश लोग इस युद्ध के सैनिक नहीं, बल्कि अनजाने शिकार हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन और खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार हर वर्ष लगभग 60 करोड़ लोग दूषित भोजन के कारण बीमार पड़ते हैं और 4.2 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। इनमें पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 1.25 लाख बच्चे शामिल हैं।
दूसरी ओर द लैंसेट सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों का अनुमान है कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हर वर्ष लगभग 2.5 लाख लोगों की मृत्यु नकली या घटिया दवाइयों के कारण होती है। इन आंकड़ों का अर्थ केवल इतना नहीं कि लाखों लोग मर रहे हैं; इसका अर्थ यह भी है कि हम एक ऐसे अपराध को सामान्य मान चुके हैं, जो प्रतिदिन हजारों परिवारों को तबाह कर रहा है।
विडंबना यह है कि हत्या करने वाला अपराधी अपना शिकार चुनता है, लेकिन मिलावटखोर नहीं। उसे यह नहीं पता कि उसके मिलाए गए घातक रसायन किस नवजात शिशु, किस गर्भवती महिला, किस कैंसर रोगी या किस वृद्ध व्यक्ति तक पहुंचेंगे। फिर भी वह लाभ के लिए विष बनाता है और बेचता है। नैतिक दृष्टि से यह अपराध कहीं अधिक व्यापक है, क्योंकि इसमें पीड़ितों की संख्या असीमित होती है।
आज दूध में यूरिया और डिटर्जेंट, मसालों में औद्योगिक रंग, फलों में रासायनिक पकाने वाले पदार्थ, तेल में सस्ते रसायन और दवाइयों में निम्न गुणवत्ता के सक्रिय तत्व मिलाए जाने की घटनाएं लगातार सामने आती हैं। इनका प्रभाव केवल तत्काल बीमारी तक सीमित नहीं रहता।
कैंसर, गुर्दे और यकृत की विफलता, हार्मोनल असंतुलन, बच्चों की शारीरिक बनावट और मानसिक वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव तथा आनुवंशिक विकृतियां इसके दीर्घकालिक परिणाम हैं। यह धीमा जहर है, जो वर्षों बाद तक अपना वास्तविक चेहरा दिखाता है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हमारी न्याय व्यवस्था इस अपराध की गंभीरता को सही रूप में पहचान पाई है? अधिकांश मामलों में मिलावट आर्थिक अपराध के रूप में दर्ज होती है, जबकि उसके परिणाम प्रत्यक्ष रूप से मृत्यु और स्थायी विकलांगता के रूप में सामने आते हैं।
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर एक व्यक्ति की हत्या करता है, तो उसे कठोर दंड मिलता है, लेकिन यदि कोई व्यापारी लाभ कमाने के लिए हजारों लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करता है, तो अक्सर वह जुर्माना देकर या लंबी कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाकर बच निकलता है। यह असंतुलन न्याय के मूल सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
समस्या का दूसरा पक्ष सामाजिक है। समाज धन को सम्मान का आधार बना बैठा है, उसके स्रोत को नहीं। यदि किसी की संपत्ति जनस्वास्थ्य से खिलवाड़ करके अर्जित हुई है, तो उसे प्रतिष्ठा नहीं मिलनी चाहिए। जिस दिन समाज ऐसे लोगों को सार्वजनिक सम्मान देना बंद कर देगा, उसी दिन इस अपराध की सामाजिक लागत बढ़ जाएगी। कानून का भय आवश्यक है, लेकिन सामाजिक अस्वीकृति उससे भी अधिक प्रभावी होती है।
सिर्फ दंड बढ़ा देने से समाधान नहीं निकलेगा। आधुनिक तकनीक को इस लड़ाई का सबसे मजबूत हथियार बनाना होगा। खेत से थाली और प्रयोगशाला से मरीज तक हर उत्पाद की डिजिटल ट्रेसबिलिटी, ब्लॉकचेन आधारित आपूर्ति शृंखला, क्यूआर कोड सत्यापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित गुणवत्ता निगरानी और स्थानीय स्तर पर रैपिड टेस्टिंग किट, ये अब विलासिता नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की अनिवार्यता हैं।
भारत जैसे विशाल देश में उपभोक्ता भी इस संघर्ष का केंद्रीय पात्र है। हर खरीद केवल लेन-देन नहीं, बल्कि विश्वास का आधार है। यदि नागरिक प्रमाणित उत्पादों को प्राथमिकता दें, संदिग्ध वस्तुओं की शिकायत करें और गुणवत्ता को कीमत से ऊपर रखें, तो बाजार स्वयं बदलने लगेगा। जागरूक उपभोक्ता किसी भी निरीक्षक से अधिक प्रभावी प्रहरी सिद्ध हो सकता है।
अब समय आ गया है कि हम खाद्य शुद्धता को केवल स्वास्थ्य का विषय न मानें, बल्कि इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और मानवाधिकारों के प्रश्न के रूप में देखें। जिस राष्ट्र की थाली सुरक्षित नहीं, उसका भविष्य भी सुरक्षित नहीं हो सकता।
हमें एक नए राष्ट्रीय संकल्प की आवश्यकता है, ‘शुद्ध के लिए युद्ध’। यह युद्ध किसी उद्योग के विरुद्ध नहीं, बल्कि लालच के विरुद्ध है; किसी व्यापारी के विरुद्ध नहीं, बल्कि बेईमानी के विरुद्ध है और किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस मानसिकता के विरुद्ध है, जो मुनाफे के लिए मानव जीवन का मूल्य घटा देती है।
किसी भी सभ्यता की पहचान उसकी ऊंची इमारतों, तेज अर्थव्यवस्था या आधुनिक तकनीक से नहीं होती। उसकी वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर नागरिक, एक बच्चे, एक रोगी और एक वृद्ध की थाली और दवा को कितना सुरक्षित बना पाती है। यदि हम यह सुनिश्चित कर सके, तभी हम सचमुच विकसित और मानवीय समाज कहलाने के अधिकारी होंगे।
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