इस उम्र की महिला को मिली अनुमति: कोर्ट ने कहा; सिर्फ उम्र मातृत्व के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, जबलपुर।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मातृत्व के अधिकार को लेकर एक महत्वपूर्ण और मानवीय फैसला सुनाते हुए 52 वर्षीय महिला को इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) के जरिए संतान प्राप्ति की अनुमति दे दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि महिला चिकित्सकीय रूप से गर्भधारण के लिए फिट है, तो केवल कानून में निर्धारित आयु सीमा के आधार पर उसे मातृत्व के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून की तकनीकी व्याख्या के बजाय मानवीय संवेदनाओं और व्यक्तिगत परिस्थितियों को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
इकलौते बेटे की मौत के बाद लिया IVF का सहारा
मामला एक ऐसे दंपति का है, जिनके 21 वर्षीय इकलौते बेटे की पीलिया से मौत हो गई थी। बेटे के निधन के बाद दंपती अकेले रह गए। बढ़ती उम्र के कारण स्वाभाविक रूप से माता-पिता बनना संभव नहीं था, इसलिए उन्होंने IVF तकनीक का सहारा लेने का निर्णय लिया।
मेडिकल जांच में महिला को गर्भधारण के लिए पूरी तरह मेडिकली फिट पाया गया। हालांकि संबंधित अस्पताल ने यह कहते हुए प्रक्रिया से इनकार कर दिया कि IVF के लिए महिला की अधिकतम आयु सीमा 50 वर्ष निर्धारित है।
हाईकोर्ट पहुंचे दंपति
अस्पताल के फैसले के खिलाफ दंपति ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने केरल और कलकत्ता हाईकोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया, जिनमें विशेष परिस्थितियों में आयु सीमा में राहत दी गई थी।
दंपति ने शपथपत्र देकर यह भी कहा कि IVF प्रक्रिया से जुड़े सभी संभावित जोखिमों और परिणामों की जिम्मेदारी वे स्वयं उठाएंगे तथा चिकित्सकों को किसी भी कानूनी दायित्व से मुक्त रखा जाएगा।
कोर्ट ने क्या कहा?
सभी मेडिकल रिपोर्ट, कानूनी प्रावधानों और पूर्व न्यायिक निर्णयों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने दंपती की याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने उन्हें किसी भी मान्यता प्राप्त IVF केंद्र में उपचार कराने की अनुमति देते हुए कहा कि अंतिम निर्णय महिला की चिकित्सकीय स्थिति के आधार पर संबंधित संस्थान करेगा, लेकिन केवल 52 वर्ष की आयु को आधार बनाकर आवेदन अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
मातृत्व के अधिकार पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि महिला चिकित्सकीय रूप से सक्षम है, तो केवल आयु सीमा के आधार पर उसे मातृत्व के अधिकार से वंचित करना उचित नहीं होगा। अदालत ने इस मामले में कानून की तकनीकी बाधाओं से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
यह फैसला उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो विशेष परिस्थितियों में अधिक आयु में भी चिकित्सकीय रूप से मातृत्व प्राप्त करने की इच्छुक हैं।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामले में अंतिम निर्णय संबंधित चिकित्सा संस्थान महिला की स्वास्थ्य स्थिति और मेडिकल मानकों के आधार पर ही करेगा।
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