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13 हजार फीट पर सांसों की अग्निपरीक्षा: माउंटेन सिकनेस को मात देकर कैसे पूरी होती है बाबा की चढ़ाई

KHULASA FIRST

संवाददाता

04 जुलाई 2026, 4:55 pm
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13 हजार फीट पर सांसों की अग्निपरीक्षा

ऑक्सीजन 40% कम, धड़कनें डेढ़ गुना तेज: महागुनस टॉप पर इंसानी फेफड़ों की सबसे बड़ी परीक्षा

भक्ति से पहले ‘कार्डियो ट्रेनिंग’: अमरनाथ की खड़ी चढ़ाई के लिए श्रद्धालुओं का एथलीट अवतार

पहाड़ों पर सेना का ‘गोल्डन ऑवर’: ऊंचाई पर थमती सांसों को कैसे मिलता है जीवनदान

श्रद्धा, स्टेमिना और सेना: वो चढ़ाई जहां आस्था और विज्ञान मिलकर रचते हैं इतिहास

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
कल्पना कीजिए, आप एक ऐसी जगह खड़े हैं जहां हवा अदृश्य दुश्मन बन जाती है। सीने में फेफड़े हवा से ऑक्सीजन खींचने के लिए पागलों की तरह छटपटा रहे हैं, दिल की धड़कनें किसी ड्रम की थाप की तरह डेढ़ गुना तेज भाग रही हैं और हर एक अगला कदम ऐसा लगता है मानो पैरों में कई टन का वजन बांध दिया गया हो।

यह किसी अंतरराष्ट्रीय साहसिक खेल का सीन नहीं, बल्कि अमरनाथ यात्रा के सबसे खूंखार और दुर्गम ट्रैक ‘महागुनस टॉप’ की जमीनी हकीकत है। समुद्र तल से 13,000 फीट की इस बर्फीली ऊंचाई पर जब आस्था और विज्ञान का आमना-सामना होता है, तो इंसानी जज्बा एक नया इतिहास लिखता है। विशेषज्ञ नजरिए से देखें तो यह पवित्र सफर पहाड़ों पर शारीरिक क्षमता की सबसे बड़ी परीक्षा की आखिरी सीमा है।

अमरनाथ की यह चढ़ाई महज एक ट्रेकिंग रूट नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत दस्तावेज है कि जब इंसान की अटूट आस्था को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और सेना की बेजोड़ तत्परता का कवच मिल जाता है, तो कुदरत की सबसे क्रूर चुनौतियां भी घुटने टेक देती हैं।

महागुनस टॉप को फतह कर जब कोई यात्री आगे बढ़ता है, तो वह केवल एक धार्मिक यात्रा पूरी नहीं करता, बल्कि वह मानव शरीर की असीमित अनुकूलन क्षमता और भारतीय सेना के डॉक्टरों की जांबाजी का एक अदृश्य मेडल अपने सीने पर टांगकर लौटता है।

हवा में 40 फीसदी कम ऑक्सीजन: जब फेफड़े देने लगते हैं जवाब
जैसे ही कोई श्रद्धालु चंदनवाड़ी की संकरी वादियों को पीछे छोड़ते हुए शेषनाग और फिर 12,756 फीट ऊंचे महागुनस टॉप की खड़ी चढ़ाई पर कदम रखता है, भूगोल के साथ-साथ शरीर का पूरा ‘बायो-मैकेनिज्म’ बदल जाता है। यहां वायुमंडलीय दबाव इतनी तेजी से गिरता है कि मैदानी इलाकों के मुकाबले हवा में ऑक्सीजन की मात्रा सीधे 40 फीसदी तक कम हो जाती है।

चिकित्सा विज्ञान की भाषा में कहें तो शरीर अचानक ‘हाइपोक्सिया’ यानी ऑक्सीजन की भारी कमी के क्रिटिकल जोन में प्रवेश कर जाता है। दिमाग को जाने वाली ऑक्सीजन की सप्लाई कम होते ही सिर फटने लगता है, चक्कर आने लगते हैं और उल्टियां शुरू हो जाती हैं।

इसे ही ‘एक्यूट माउंटेन सिकनेस’ कहते हैं। अगर इस मोड़ पर शरीर का स्टेमिना और मेडिकल सपोर्ट साथ न दे, तो यह फेफड़ों में पानी भरने जैसी जानलेवा स्थिति में बदल सकता है। यहां सिर्फ इच्छाशक्ति काम नहीं आती, भक्ति के साथ शारीरिक सक्षमता असली ढाल बनती है।

आस्था के साथ ‘एथलीट मोड’: महीनों पहले शुरू होती है ‘कठिन ट्रेनिंग’
हैरानी की बात यह है कि पहाड़ों के इस खूनी खेल को भांपकर अब अमरनाथ जाने वाले आम श्रद्धालु भी किसी प्रोफेशनल मैराथन रनर या एथलीट की तरह बर्ताव करने लगे हैं। बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने से दो-तीन महीने पहले ही घरों में एक साइलेंट ‘स्पोर्ट्स कैंप’ शुरू हो जाता है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की सख्त सलाह पर, 50-60 साल के बुजुर्ग से लेकर युवा श्रद्धालु तक अपनी दिनचर्या को कार्डियो-वैस्कुलर ट्रेनिंग यानी हृदय-क्षमता बढ़ाने का अभ्यास में झोंक देते हैं। सुबह-शाम 5 किलोमीटर की तेज वॉक, ट्रेडमिल पर चढ़ाई का अभ्यास, फेफड़ों के गुब्बारों को मजबूती देने वाला प्राणायाम और पैरों की पिंडलियों को ताकत देने वाली स्ट्रेंथ ट्रेनिंग।

यह महीनों की तपस्या तब रंग लाती है जब महागुनस टॉप की पथरीली चढ़ाई पर कम ऑक्सीजन के बावजूद इन ‘श्रद्धालु-एथलीट्स’ के फेफड़े और मांसपेशियां बिना थके, बिना थमे तालमेल बिठा लेती हैं।

आर्मी का ‘गोल्डन ऑवर’ नेटवर्क: मौत के मुंह से खींच लाती है सेना
कहानी का जो सबसे जांबाज और अदृश्य हिस्सा है, वो है बर्फीली चोटियों पर तैनात जवानों का मेडिकल नेटवर्क। महागुनस टॉप और यात्रा मार्ग के सबसे संवेदनशील मोर्चों पर सेना, अर्धसैनिक बलों और जम्मू-कश्मीर स्वास्थ्य विभाग ने एक ऐसा राहत-बचाव तंत्र तैयार किया है, जो दुनिया के किसी भी बड़े खेल चोट प्रबंधन प्रणाली को मात दे दे।

पर्वतीय चिकित्सा विज्ञान में ‘गोल्डन ऑवर’ (तबीयत बिगड़ने के बाद का पहला घंटा) ही जिंदगी और मौत के बीच का फासला तय करता है। सेना के डॉक्टरों ने हर कुछ किलोमीटर पर ‘हाई-एल्टीट्यूड मेडिकल सेंटर्स’ और अत्याधुनिक ऑक्सीजन बूथ्स का जाल बिछा रखा है।

किसी यात्री का ऑक्सीजन सैचुरेशन लेवल जैसे ही नीचे गिरता है, जवान पल्स ऑक्सीमीटर से उसे डिटेक्ट करते हैं। मरीज को पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर या ‘हाइपरबेरिक चैंबर’ (कृत्रिम दबाव वाला टेंट) में डाल दिया जाता है, जिससे थमती सांसें फिर से बहाल हो उठती हैं।

बेहद गंभीर मामलों में, पहाड़ों की दुर्गम कंदराओं से स्ट्रेचर और सेना के चॉपर्स या हेलीकॉप्टर के जरिए मरीजों को सीधे एयरलिफ्ट कर बेस कैंप के वेंटिलेटर युक्त अस्पतालों में पहुंचा दिया जाता है।

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