एक चिट्ठी जो निगल गई बेचारे ’विकास’ को: मुख्यमंत्री के डेवलपमेंट डॉक्यूमेंट पर फिर ब्रेक क्यों
KHULASA FIRST
संवाददाता

चिट्ठी लिखी? चली और पते पर पहुंची? फिर वहां से जहां पहुंचनी था, वहां पहुंच गई या पहुंचा दी गई?
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
जिसने लिखी वह इससे अनजान है? फिर क्या था बासी कढ़ी में उबाल ला दिया गया....चिट्ठी यानी कढ़ी में गुजराती तड़का (मोटा भाई तक इसे पहुंचाना) लगाया। चिट्ठी जून की और उबाल लाया
गया जुलाई में...।
बात एक ऐसी रहस्य भरी चिट्ठी की है, जिसे लिखने वाले को पता नहीं कि उसने ऐसा कुछ लिखा है। चिट्ठी कोई कबूतर लेकर गया था या कोई डाकिया,पता नहीं! तो फिर क्या चिट्ठी आसमान में या पाताल में समा गई या कुटिल राजनीति का दानव निकल गया? जब ऐसे किसी पत्र के अस्तित्व ढूंढे नहीं मिल रहा है तो फिर बवाल क्यों?
पहले भी कुछ नहीं था और अब भी कुछ नहीं... बवाल और उबाल ऐसा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार द्वारा इंदौर के विकास को लेकर बनी ठोस योजनाओं को एक सामान्य चिट्ठी निगल गई। बेचारा इंदौर का अनसस्टेनेबल "विकास’ करें तो क्या करें...जाए तो कहां जाए...भाजपा की जादूगरी वाली राजनीति के लिए निरीह "विकास’ यूज ईट...थ्रो ईट एंड फॉरगेट ईट (वापरो...फेंक दो...भूल जाओ) से ज्यादा पहले भी कुछ नहीं था और अब भी कुछ नहीं है। इसकी बड़ी वजह यह है कि एक तो इंदौर के राजनेताओं के और योजनाकारों के पास विजन की कमी है और जब कोई विजनरी डॉक्यूमेंट बनता है तो राजनीति की जादूगरी उसकी वाट लगा देती है।
यह चिट्ठी सामान्य पत्र व्यवहार की तरह... इंदौर के विकास को लेकर एक सामान्य पुराने पत्र को सामने लाकर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। यह चिट्ठी सामान्य पत्र व्यवहार की तरह है, लेकिन इसे इतनी दूर ले जाया गया कि चिट्ठी का हवाला देकर भाजपा विधायकों को संगठन और सरकार के खिलाफ बगावत करने का आह्वान तक कर दिया और यह सलाह वह कांग्रेस दे रही है, जिसके संगठन में बगावती संस्कार है।
अपने पराक्रम की बजाय कांग्रेस भाजपा के मंत्रियों को हर छोटे से विषय पर मुख्यमंत्री के खिलाफ प्राचारित करने में कसर नहीं छोड़ते।
विपक्ष कहीं नहीं टिकता... जिनके खत को लेकर बवाल मचाया जा रहा है, वह भाजपा के संगठन के इतने ऊंचे कद के नेता हैं कि उनके राजनीतिक चातुर्य कौशल, प्रबंधन और रणनीति के आगे विपक्ष कहीं नहीं टिकता। वह चिट्ठी लिखें या बयान दें या नाराजगी जताएं, वह कभी भी खिलाफत में नहीं होती। संगठन और सरकार में वह संकट मोचक हैं।
संगठन और सरकार में उन्हें भूमिका की मालूमात... मुख्यमंत्री और उनके बीच दूरियां कभी नहीं रहीं। संगठन और सरकार में उन्हें अपनी भूमिका की मालूमात अच्छे से है। ऐसे में यह कहना और प्रचारित करना कि यह सबकुछ अपनी सरकार के खिलाफ बगावती तेवर है पूरी तरह से मिथ्या बताए जाते हैं।
उनके पास उनकी पसंद का भारी-भरकम महकमा है। जैसा चाहते हैं होता है और करते भी हैं। ऐसे मजबूत दूरदर्शी मंत्री को जिसने पूरी दुनिया देखी है, अपने मित्र और मुख्यमंत्री को चार लाइन की चिट्ठी लिख अपनी व्यथा दर्द बताना पड़े, ऐसी स्थिति कभी हो ही नहीं सकती। और यदि ऐसा है तो जवाबदेही भोपाल से दिल्ली तक दुनिया के सबसे बड़े सत्ताधारी भाजपा संगठन की है।
मुख्यमंत्री नहीं, संगठन को जिम्मेदार बताया जा रहा...
मुख्यमंत्री को लेकर जिस तरह का वातावरण बनाया जा रहा है उसके लिए मुख्यमंत्री नहीं, संगठन को जिम्मेदार बताया जा रहा है।
मुख्यमंत्री की छवि को प्रभावित करने की कोशिश... दूसरी ओर भाजपा के अंदरूनी राजनीति को समझने वाले बताते हैं कि प्रेम पत्र लेखन बताता है कि निगाह कहीं ओर है निशाने कहीं ओर हैं। पत्रनुमा सुझाव के बहाने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की छवि को प्रभावित करने और उनके विकास कार्यों पर सवाल खड़े करने की कोशिश की जा रही है।
जानकारों का कहना है कि इंदौर के लिए जिन परियोजनाओं और विकास योजनाओं की चर्चा आज हो रही है, उन पर मुख्यमंत्री मोहन यादव पहले से ही काम कर रहे थे। इंदौर के विकास को लेकर आयोजित प्रस्तावित कार्यक्रम भी पहले से तय प्रक्रिया का हिस्सा था। ऐसे में पुराने पत्र को अचानक सार्वजनिक कर राजनीतिक मुद्दा बनाना कई सवाल खड़े करता है खासकर भाजपा संगठन के लिए।
सरकार और संगठन दोनों को राजनीतिक नुकसान की आशंका... यदि यह विवाद केवल एक-दो बयानों तक सीमित रहता है, तो इसका प्रभाव सीमित हो सकता है। लेकिन यदि पत्र, बयानबाजी और सार्वजनिक आरोपों का सिलसिला लगातार चलता है तो सरकार और संगठन दोनों को राजनीतिक नुकसान की आशंका बढ़ सकती है। वहीं, यदि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व समय रहते स्थिति स्पष्ट कर देता है और मुख्यमंत्री के पक्ष में स्पष्ट संदेश देता है, तो ऐसे विवादों का असर काफी हद तक कम हो सकता है।
यह कौन जादूगर है, जिसके चेहरे पर नकाब है... कहते हैं यह शहर जादूगरों का है और हर चेहरे पर नकाब है… कुछ इसी तरह से बीते एक पखवाड़े से भाजपा में अपने ही लोगों के लिए अपने ही लोगों द्वारा अपनी ही सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ हो रहे अदृश्य ड्रोन हमलों का विश्लेषण किया जा रहा है। मुख्यमंत्री के खिलाफ भूमिकांड भी अदृश्य शक्तियों ने खड़ा किया। इससे निपटते ही उड़नतश्तरी की तरह एक चिट्ठी मीडिया प्लेटफॉर्म पर उतारी गई और फिर अदृश्य करवा दी गई अब उसके जो निशान रह गए उन पर
न ही सूत है न कपास है....और जुलाहों में लट्ठम लट्ठ मची है। इसीलिए शहर और यहां के राजनीतिक जादूगरी वाली है। चिट्ठी को नकारा गया फिर किसी सलाहकार ने कानों में फूंका कि चिट्ठी तो श्यामला हिल्स से बाहर आई, ताकि दिल्ली में भाई को घेरा जा सके।
तथ्यहीन वार्ता तेजी से वायरल करवा दी... ऐसी तथ्यहीन वार्ता तेजी से वायरल करवा दी गई। सलाहकारों ने ही लीला रची और कहानी बना डाली बाद में भक्त मंडली काम से लग गई। तथ्य बताते हैं कि यदि ऐसी कोई चिट्ठी थी तो वह उसे समय रची गई, जब मुख्यमंत्री भूमि कांड के क्राइसिस मैनेजमेंट में लगे हुए थे। उससे पहले उनकी अति व्यस्तता बनी हुई थी। मुख्यमंत्री के साथ पत्र व्यवहार सामान्य तरीके से जैसे होते हैं, वैसा हुआ होगा।
मुख्यमंत्री योजनाओं की नियमित समीक्षा कर रहे... दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के समर्थकों का तर्क है कि सरकार जिन योजनाओं पर काम कर रही है, वे प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत काफी पहले से आगे बढ़ रही है, मुख्यमंत्री योजनाओं की नियमित समीक्षा कर रहे हैं।
अपने विकास मंत्री की योजनाओं और सुझावों को मुख्यमंत्री हमेशा गंभीरता से लेते हैं। फिलहाल यह केवल राजनीतिक विश्लेषण और चर्चा का विषय है। ऐसे विषय का कोई महत्व नहीं है, उनके लिए जो संवेदनशील हैं जनता के प्रति जवाबदेह हैं।
प्रदेश के लिए कुछ बेहतर करना चाहते हैं सरकार और संगठन के प्रति समर्पित हैं तो उनके लिए यह ऐसे विवाद महत्वहीन है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि पत्र के सार्वजनिक होने के समय ने इस विवाद को राजनीतिक महत्व दे दिया और इससे इंदौर के विकास की चर्चा के साथ-साथ भाजपा की आंतरिक राजनीति भी बहस का विषय बन गई है।
चिट्ठी आत्मघाती बन गई
अब यह कहना कि चिट्ठी श्यामला हिल्स से लीक हुई पूरी तरह मूर्खतापूर्ण है जैसा मुख्यमंत्री के पक्ष में दलील देने वाले कहते हैं कि ऐसा करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। ऐसा करके मुख्यमंत्री भला क्यों अपने लिए एक और नया संकट खड़ा करेंगे और ऐसा करने की उन्हें जरूरत ही क्या है।
मुख्यमंत्री की स्थिति ऐसी नहीं है कि किसी के कमजोर करने से वह कमजोर हो जाए या षड्यंत्र के शिकार हो जाए। तो यही कहा जा रहा है कि चिट्ठी गाइडेड मिसाइल की तरह दागी गई। निशाना सटीक था, लेकिन वह निशाने पर मार करने की बजाय पलट कर अपने हीं घर में जा गिरी। इस तरह चिट्ठी आत्मघाती बन गई।
यह पुराना पत्र किसने या किस उद्देश्य से अभी सार्वजनिक किया। इसे लेकर भी तर्क दिए जा रहे हैं कि मुख्यमंत्री ने भूमि कांड जैसे बड़े चक्रवात को ठंडा कर दिया, उसकी निराशा में असंतुष्टों ने एक चिट्ठी जो नहीं है, उसकी कहानी बना दी। इसके पीछे किसी व्यक्ति या समूह की मंशा के बारे में निश्चित दावा नहीं किया जा सकता।
हालांकि, राजनीतिक हलकों में कुछ तरह की अटकलें और विश्लेषण जरूर सामने आ रहे हैं जिससे लगता है कि यह पत्र ऐसे समय सामने आया या लाया गया है, जब सरकार कथित भूमिकांड के चक्रव्यूह को भेद कर सुरक्षित बाहर आई और जैसे ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और उनकी सरकार गतिमान हुई एक ऐसी चिट्ठी जिसका कोई आगा-पीछा नहीं बाहर ला दी गई। अपनी सरकार के कामकाज और विकास योजनाओं को लेकर सक्रिय हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के झंडे और योजनाओं को विवेक की ताकत के साथ क्रियान्वित करने में लगे हैं, इसलिए कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे मुख्यमंत्री पर व्यक्तिगत प्रभुत्व और स्वार्थ के लिए रची गई लीला की तरह देखते हैं।
अपनी ही सरकार और संगठन पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश उल्टी पड़ती नजर आ रही है ऐसा करने वाले अपनी छवि लोकप्रियता और संगठन के पति ने समर्पण को कमजोर कर रहे हैं।
इंदौर के विकास को लेकर श्रेय की राजनीति... एक मत यह भी है कि इंदौर के विकास को लेकर श्रेय की राजनीति होने के बीच पुराने पत्र को सामने लाया गया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा की आंतरिक राजनीति में यह घटनाक्रम चर्चा का विषय है चिंता का नहीं, इसलिए मुख्यमंत्री इससे जरा भी हैरान परेशान नहीं है। वह पूरी गति से सरकार को दौड़ा रहे है।
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