जीत में जीतू
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दतिया की आध्यात्मिक पहचान पीतांबरा शक्ति पीठ से है। अवतरित महापुरुषों की पार्टी कहलवाने वाली पार्टी में एक बार फिर दैवीय शक्ति का संचार नहीं हुआ। कमजोर विपक्ष कांग्रेस के पास ही यह शक्ति कायम रही।
एक ओर महाकाल तो दूसरी ओर पीतांबरा देवी से चमत्कार की उम्मीद नाउम्मीद में बदल गई। कांग्रेस, जिसके लिए उम्मीदें कम और नाउम्मीद ज्यादा थी, वह दतिया राजनीतिक उपचुनाव संग्राम इस उम्मीद के साथ जीत में बदल गया कि अब आगे जीत ही जीत है।
इस जीत में जीतू पटवारी रहे। 12 साल लगे, लेकिन जीतू ने भाजपा का चक्रव्यूह भेदना सीख लिया है। प्रदेश में कांग्रेस हाईकमान के हाथ में प्रदेश की पूरी कमान है। चुनावी चौसर, चुनावी असलाह और चुनावी रथ की सारथी पार्टी हाईकमान ने शुरू से जीतू को ताकत दी।
एक साथ केकड़ों को तौलने जैसा ही कठिन काम कांग्रेस के भांति-भांति के गुटों के नेताओं को एक साथ लाना और काम से लगाना और इस पर भाजपा की सत्ता के प्रलोभनों के दलदल से बाहर रखकर चुनाव जीत लेना माउंट एवरेस्ट पर विजय पाने जैसा है।
कारण यह कि कांग्रेस के नेताओं के चार चरित्र चेहरे में सत्ता से दूर लंबे वनवास के बावजूद कोई बदलाव नहीं आया। उलटा ऐसा हृदय परिवर्तन हुआ कि भाजपा में चले गए। जो हैं, उनमें से भी कई का आधा मन भाजपा की सत्ता में रमा रहता है।
पक्ष हो या विपक्ष, नेताओं के चरित्र में कोई खास बदलाव नहीं है। इसका उदाहरण दतिया का उपचुनाव रहा। सरकार, संगठन आदि ने यहां जो ताकत लगाई उसके कारण यह चुनाव हाई-प्रोफाइल हो गया था। कांग्रेस के उम्मीदवार का भी अपना प्रभाव काम आया।
इस हाई-प्रोफाइल चुनावी महासंग्राम में कांग्रेस की जीत में दो नाम खासतौर से लिए जा रहे हैं। एक सर्वज्ञात नाम जीतू पटवारी का है। इनकी मेहनत, भाजपा को भाजपा की शैली में जवाब देने की रणनीतिक कुशलता और कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह का आत्मविश्वास व्यवहार व तमाम दबाव-प्रभाव और सरकार की ताकत के बावजूद धैर्य और साहस के साथ चुनाव में डटे रहे।
कई उतार-चढ़ाव आए, उम्मीद बनी रही कि जीत मुश्किल नहीं है। फिर कभी लगता था कि सरकार संगठन के साम-दाम-दंड भेद से चुनाव की बाजी हाथ से कहीं निकल न जाए। इस तरह की चिंता भी आती-जाती रही, लेकिन जीतू की जिद ने जुझारूपन से चुनाव की बाजी को पलट दिया। यह चुनाव कांग्रेस को संजीवनी के साथ मजबूती भी दे गया है।
जीतू पटवारी के लिए यह उपचुनाव नेतृत्व की परीक्षा भी था। विंध्य और ग्वालियर-चंबल सुबह की कठोर व कठिन सियासी जमीन पर राजनीतिक समीकरण बैठना चुनौतीपूर्ण काम है। ऐसे समय में, जब कांग्रेसी बगावत कर भाजपा में बैठे हों, तो सरकार के सामने चुनाव लड़ना बेहद कठिन है।
चुनाव की बागडोर संभालते हुए उन्होंने कलह और भितरघात से निपटने का काम किया। पार्टी कार्यकर्ताओं में इस जीत ने शक्ति मंत्र फूंक दिया है। इस चुनाव में पटवारी की राजनीतिक परिपक्वता भी पूरी तरह से नजर आई। पूरे चुनाव में उन्हें लेकर पार्टी में कहीं कोई नाराजगी नजर नहीं आई।
दतिया चुनाव पटवारी को मजबूती दे गया है। उन्होंने सिर्फ आम मतदाताओं को ही नहीं साधा, बल्कि पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा और भाजपा जिला के नेताओं को भी अपने पक्ष में किया। जैसा मीडिया रिपोर्ट बताती है।
दतिया के किले में कैसे चली पीसीसी चीफ की सियासी चाल?
वरिष्ठ पत्रकार रंजन श्रीवास्तव बताते हैं कि मध्य प्रदेश की सियासत में दतिया उपचुनाव के नतीजे एक बड़ा राजनीतिक टर्निंग पॉइंट बनकर उभरे हैं। सत्ताधारी भाजपा के लिए यह हार जहां बड़ा झटका है, वहीं कांग्रेस के लिए यह किसी संजीवनी से कम नहीं। इस पूरे चुनावी ड्रामे के केंद्र में यदि किसी एक राजनेता की रणनीति और मैदानी मेहनत की सबसे ज्यादा चर्चा है, तो वह हैं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी।
पटवारी ने कांग्रेस नेताओं के साथ, सीधे "ग्राउंड जीरो’ पर डेरा डाला। गांव-गांव में लोगों से संवाद किया। आमतौर पर प्रदेश स्तर के बड़े नेता चुनाव में रैलियां करके लौट आते हैं, लेकिन जीतू पटवारी ने दतिया में एक नया ट्रेंड सेट किया। वे सिर्फ भोपाल से निर्देश देने वाले कप्तान नहीं बने, बल्कि उन्होंने खुद जमीन पर उतरकर दतिया में लंबा डेरा डाला।
गांव-गांव जाना, कार्यकर्ताओं के साथ सीधे संवाद करना और प्रत्येक बूथ के मैनेजमेंट पर खुद नजर रखना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के वर्षों में किसी प्रदेश अध्यक्ष ने उपचुनाव में इतनी मैदानी सक्रियता नहीं दिखाई थी।
भाजपा की अंदरूनी कलह और ‘भितरघात' को भांपना
दतिया में भाजपा ने जब पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा, तो पार्टी के भीतर असंतोष सुलग उठा था। पत्रकार रंजन कहते हैं कि इस मौके की नजाकत को जीतू पटवारी और कांग्रेस हाईकमान ने बहुत ही बारीकी से भांपा। पटवारी ने स्थानीय स्तर के समीकरणों को साधते हुए और नाराज गुटों के बीच सही तालमेल बैठाते हुए कांग्रेस की जीत की जमीन तैयार की। कूटनीति पूरी तरह सफल रही।
‘25 मंत्री, 50 करोड़ और दिग्गजों का डेरा’ बनाम जीतू और उनके नेताओं का आत्मविश्वास चुनाव के केंद्र में थे। चुनाव परिणाम के बाद जीतू पटवारी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जिस आक्रामक अंदाज में बयान दिया, उसने सियासी पारे को और बढ़ा दिया। उन्होंने तंज कसते हुए कहा था कि सरकार ने चुनाव जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, मंत्रियों की फौज और बड़े दिग्गजों का डेरा था, लेकिन जनता ने अहंकार को नकार दिया।
शुरुआती चरणों में जब रुझान कांग्रेस के खिलाफ दिख रहे थे, तब भी जीतू पटवारी और पार्टी का मैदानी अमला डटा रहा और अंततः कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने शानदार वापसी करते हुए बाजी पलट दी।
दतिया उपचुनाव की यह जीत केवल एक सीट बचाने भर की नहीं है, बल्कि यह संगठन में जीतू पटवारी के नेतृत्व की मुहर बन गई है। लगातार सियासी दबाव के बीच जिस तरह उन्होंने हारी हुई बाजी को अपने पक्ष में मोड़ा है, उसने प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंक दिया।
यह परिणाम साबित करता है कि जीतू पटवारी की ग्राउंड-लेवल स्ट्रैटेजी और सटीक राजनीतिक गोटियां बिछाने की कला अब मध्य प्रदेश कांग्रेस की दिशा तय करने में सबसे बड़ा हथियार बन चुकी है।
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