क्या बच जाएंगे मास्टर माइंड: कार्रवाई सिर्फ निचले अमले तक सीमित
KHULASA FIRST
संवाददाता

नामांतरण घोटाला: महापौर की सीधी चेतावनी के बाद भी सुस्त पड़ा निगम प्रशासन
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम का चर्चित नामांतरण घोटाला अब केवल एक प्रशासनिक फर्जीवाड़ा भर नहीं रहा, बल्कि इंदौर के जन-विश्वास, सुशासन और प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता की सबसे बड़ी परीक्षा का केंद्र बन चुका है।
करोड़ों रुपए की हेराफेरी, नामांतरण पत्रों में अवैध बदलाव और सरकारी जमीनों व संपत्तियों के रिकॉर्ड में कूटरचना कर तैयार की गई फर्जी फाइलों का यह खेल जैसे-जैसे गहरा रहा है, वैसे-वैसे जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अमले के बीच की कार्यशैली का अंतर भी खुलकर सड़कों पर दिखाई देने लगा है।
इस पूरे मामले में महापौर पुष्पमित्र भार्गव ने पहले दिन से ही बेहद कड़ा और समझौताहीन रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि घोटालेबाजों का कद, रसूख या पद चाहे जो भी हो, फर्जीवाड़े की नींव रखने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा।
महापौर ने सार्वजनिक मंचों से लेकर समीक्षा बैठकों तक नगर निगम की प्रशासनिक मशीनरी को कड़े शब्दों में हिदायत दी है कि इस पूरे मामले में आपराधिक मामले दर्ज किए जाएं और कानून का शिकंजा बिना किसी पक्षपात के कसना चाहिए, लेकिन जनप्रतिनिधि की इस मंशा के ठीक विपरीत निगम का प्रशासनिक अमला मामले को ठंडे बस्ते में डालने और कागजी लीपापोती करने में जुटा प्रतीत हो रहा है।
सुनियोजित और संगठित नेटवर्क का काम
आयुक्त क्षितिज सिंघल के संरक्षण में में काम कर रही टीम की कार्यप्रणाली पर अब सीधे-सीधे सवाल उठने लगे हैं। आयुक्त क्षितिज सिंघल की व्यक्तिगत छवि भले ही एक निष्पक्ष और सख्त अधिकारी की मानी जाती रही हो, लेकिन जब परीक्षा का कठिन समय आया है, तब उनकी प्रशासनिक टीम की रफ्तार और इच्छाशक्ति बेहद संदिग्ध दिखाई दे रही है।
शहर में यह चर्चा आम हो चुकी है कि सैकड़ों नामांतरण फाइलों में बदलाव, सिस्टम के पासवर्ड का दुरुपयोग और बैकडेट में सरकारी मुहरें लगाकर नामांतरण की प्रक्रिया पूरी कर देना केवल दो-चार निचले कर्मचारियों का काम नहीं हो सकता, यह एक सुनियोजित और संगठित नेटवर्क का काम है, जिसके तार निगम के बड़े दफ्तरों, वरिष्ठ कमरों और प्रभावी तंत्र से सीधे जुड़े हैं।
इसके बावजूद, निगम प्रशासन द्वारा की गई अब तक की कार्रवाई केवल संविदा कर्मचारियों को हटाने या कंप्यूटर ऑपरेटरों पर निलंबन की गाज गिराने तक ही सीमित रही है। नगर निगम प्रशासन क्यों बड़े चेहरों का नाम सार्वजनिक करने से बच रहा है? क्यों जांच फाइलों को दबाकर पूरी प्रक्रिया को केवल विभागीय जांच के नाम पर खींचा जा रहा है?
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