9 एफआईआर में से 6 को ही कोर्ट में चुनौती दी क्यों: सनपाल की अर्जी खारिज; अब सवालों के घेरे में पूरी कहानी
KHULASA FIRST
संवाददाता

केस खत्म कराने जा पहुंचा अदालत, सुनवाई आगे बढ़ने से पहले ही राह हुई बंद
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भगोड़ा सतीश सनपाल से जुड़े नौ प्रकरणों की फाइल अब सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं रही। छह थाना क्षेत्रों में दर्ज मामलों में से छह एफआईआर को खत्म कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन पहली कोशिश ही नाकाम हो गई।
अर्जी खारिज होने के बाद सवाल यह है कि नौ में से सिर्फ छह एफआईआर को ही चुनौती देने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इन मामलों में कोई समानता थी? क्या आरोपों, शिकायतकर्ताओं, आरोपियों या लेन-देन के बीच ऐसी कड़ी थी, जिसके आधार पर एक साथ कानूनी राहत मांगी गई?
उपलब्ध न्यायिक और सार्वजनिक रिकॉर्ड के मुताबिक, 2022 में जबलपुर के ओमती, मदनमहल, लार्डगंज, कोतवाली, गोरखपुर व गढ़ा क्षेत्रों में सनपाल से जुड़े नौ प्रकरण दर्ज बताए हैं। इनमें सट्टेबाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश संबंधी धाराओं का उल्लेख है। बाद में छह एफआईआर को लेकर निरस्तीकरण की मांग अदालत तक पहुंची।
आखिरकार छह ही क्यों?: यही इस पूरे मामले का सबसे पहला और सबसे सीधा सवाल है। यदि सभी नौ एफआईआर पर आपत्ति थी तो अदालत में छह को ही चुनौती क्यों दी गई? और यदि छह मामलों की प्रकृति अलग थी तो उनमें ऐसा क्या समान आधार था, जिसके कारण उन्हें निरस्त कराने की कोशिश की गई?
इसका जवाब संबंधित याचिका और न्यायिक आदेश से सामने आ सकता है, इसलिए अब उस आदेश की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
ओमती, मदनमहल, लार्डगंज, कोतवाली, गोरखपुर और गढ़ा छह अलग-अलग थाना क्षेत्र है। एफआईआर अलग-अलग। लेकिन क्या इनके भीतर कोई समान नाम, मोबाइल नंबर, बैंक खाता, फर्म, कारोबारी पता, शिकायतकर्ता या लेन-देन दोहराया गया?
अगर ऐसा है तो सवाल और गंभीर हो जाता है कि क्या अलग-अलग थानों में दर्ज प्रकरणों के पीछे कोई साझा नेटवर्क या लेन-देन की कड़ी थी? और यदि ऐसी कोई समानता नहीं है, तो फिर छह मामलों को एक साथ कानूनी चुनौती देने की वजह क्या थी?
कोर्ट में राहत क्यों नहीं मिली?
सनपाल की ओर से एफआईआर निरस्त कराने की मांग की गई, लेकिन अदालत ने अर्जी स्वीकार नहीं की। अब सवाल यह नहीं कि अर्जी खारिज हुई, बल्कि यह है कि अदालत के सामने कौन सा आधार रखा गया था और उस आधार पर न्यायिक रुख क्या रहा? क्या एफआईआर में लगाए गए आरोपों को चुनौती दी गई थी? क्या पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए गए थे? क्या मामला आपसी विवाद बताया गया था? या फिर कोई तकनीकी कानूनी आधार रखा गया था? इन सवालों का जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि संबंधित न्यायिक आदेश से ही निकलेगा।
चार साल बाद नौ मामलों की स्थिति क्या?
वर्ष 2022 में दर्ज इन प्रकरणों को अब करीब चार साल हो चुके हैं। ऐसे में एक और सवाल सामने आता है कि इन चार वर्षों में जांच कहां तक पहुंची? किस एफआईआर में चार्जशीट दाखिल हुई? किस मामले में ट्रायल शुरू हुआ?
कौन सा प्रकरण अभी जांच में है? क्या किसी केस में अदालत ने कोई महत्वपूर्ण आदेश दिया? क्या किसी आरोपी को राहत मिली? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह साफ होगा कि नौ एफआईआर की कहानी आज किस मुकाम पर खड़ी है।
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