घाट पर छूट आई मूर्ति घर तक साथ लौट आई वही पुरानी आत्मीयता
KHULASA FIRST
संवाददाता

हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
आज गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के बाद जब घाट से लौटकर घर का दरवाजा खुलेगा, तो पहली नजर सीधे पूजा की चौकी पर जाएगी। करीब दो सप्ताह तक जहां रोशनी का एक पूरा दायरा सिमटा हुआ था, वहां आज कुछ बिखरे हुए अक्षत (चावल) नजर आएंगे, लकड़ी पर बैठा गुलाल का हल्का लाल आवरण, सूखती दूर्वा की एक पत्ती और बुझी हुई बाती का काला सिरा भी दिखाई देगा। चौकी वही है, घर की दीवारें भी वही हैं, लेकिन घर की ‘आवाज’ और उसका ‘सुर’ बदल गया है।
बाहर ढोल थम चुके हैं। गलियों में उड़ता अबीर-गुलाल जमीन पर बैठ चुका है। जिन पैरों ने घाट तक नाचते हुए राह नापी थी, वे अब घर की सीढ़ियां बहुत भारी कदमों से चढ़ रहे हैं। कोई किसी से कुछ नहीं कह रहा। बस, एक अनकहा सन्नाटा है और मन के किसी कोने में कौंधता एक छोटा-सा सवाल- आज शाम जब आरती का वक्त होगा, तब हम क्या करेंगे।
बीते 12 दिनों में घर का पूरा भूगोल और दिनचर्या बप्पा के इर्द-गिर्द सिमट गई थी। सुबह आंख खुलते ही ताजे फूलों और दूर्वा की फिक्र होती थी। शाम ढलते ही काम-काज छोड़ पूरा घर एक जगह जुट जाता था। बच्चे स्कूल का बस्ता फेंककर सीधे मंडप की ओर भागते थे।
जो पड़ोसी साल भर हाय-हेलो तक सीमित थे, वे बिना बुलाए आकर घंटों बैठ जाते थे। माटी की एक मूर्ति ने इतने दिनों के भीतर बिखरे हुए इंसानों को जोड़कर ‘परिवार’ बना दिया था। विसर्जन के बाद का यह खालीपन दरअसल उसी साथ‘’ के छूटने की टीस है।
इस पर्व का सबसे गहरा दर्शन यही है कि हम जिस आराध्य को इतने लाड़-प्यार से विराजित करते हैं, उसे अपने ही हाथों से जल की धाराओं को सौंप आते हैं। कोई इसे महज एक धार्मिक रस्म कह सकता है, लेकिन जिसने अपने कंधे पर बप्पा की मूर्ति का भार उठाया है और जिसके हाथों ने घाट के ठंडे पानी में उस माटी को पिघलते देखा है, वही जानता है कि वह कितना भारी क्षण होता है।
माटी से बने बप्पा माटी में ही लौट गए। जीवन का यह सबसे बड़ा दर्शन किसी भारी-भरकम प्रवचन से नहीं मिलता। यह उसी एक पल में समझ आ जाता है जब हाथ से मूर्ति छूटती है और पानी में सिंदूर की लाल लकीर तैरने लगती है, लेकिन यह उदासी किसी हार या शोक की नहीं है, जो हमारे भीतर कुछ गहरा छोड़ जाए, उसी का जाना खलता है। बप्पा इन दिनों में टूटते हुए रिश्तों को जोड़ गए, बच्चों को अपनी संस्कृति का स्वाद चखा गए और बड़ों को एक साथ बैठकर मुस्कुराना सिखा गए।
इसलिए सच तो यह है कि चौकी भले खाली दिख रही हो, पर घर खाली नहीं हुआ है। उसमें बप्पा का आशीर्वाद और उनकी उपस्थिति हमेशा के लिए दर्ज हो गई है।
रात को सोने से पहले उस खाली चौकी की तरफ एक बार फिर देखिएगा। वहां एक छोटा-सा दीया जलाकर रख दीजिए। उस खाली जगह को सन्नाटा नहीं, एक छोटी-सी लौ का साथ चाहिए और फिर हाथ जोड़कर मन ही मन वही कहिए, जो हर उदास, लेकिन उम्मीद से भरा दिल कहता है- अगले बरस तू जल्दी आ...।
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