तीन रंगों का सिग्नल सड़क नहीं: नागरिकता को भी नियंत्रित करता है; अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक लाइट दिवस विशेष
KHULASA FIRST
संवाददाता

राजकुमार जैन स्वतंत्र लेखक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
रोजमर्रा की भागदौड़ में हम अक्सर शहर के चौराहों पर टंगे तीन रंगों के उन डिब्बों को अनदेखा कर देते हैं, जो शांति से अपनी रोशनी बदलते रहते हैं। हर साल 5 अगस्त को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक लाइट दिवस केवल एक तकनीकी आविष्कार का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमें याद दिलाता है कि कैसे एक साधारण सा विचार पूरी दुनिया की रफ्तार को व्यवस्थित कर सकता है।
जब लाल बत्ती जलती है वाहन रुकते हैं, लेकिन क्या सचमुच हम रुकते हैं? यह सवाल सुनने में अजीब लग सकता है। गाड़ी तो रुक गई, फिर समस्या क्या है? समस्या यही है कि कई बार सड़क पर वाहन रुकता है, लेकिन उसके चालक के भीतर की जल्दबाजी नहीं रुकती। नजर सिग्नल पर कम और रास्ता निकालने पर ज्यादा रहती है।
लाल बत्ती को नियम नहीं, मजबूरी समझा जाता है, पीली बत्ती को सावधानी नहीं, ‘अब निकल लो’ का संकेत और हरी बत्ती को मानो आगे बढ़ने का अधिकार-पत्र। 5 अगस्त 1914 को अमेरिका के क्लीवलैंड शहर में पहली लाल और हरे रंग की दो लाइटों के साथ इलेक्ट्रिक ट्रैफिक सिग्नल की शुरुआत हुई थी।
तब मकसद सीधा था, सड़क पर बढ़ती आवाजाही को व्यवस्थित करना। 1920 के दशक में गाड़ियों की बढ़ती संख्या को देखते हुए पीली रोशनी (सावधानी का संकेत) को इसमें जोड़ा गया, जिसने यातायात को और अधिक सुरक्षित बनाया।
यदि यह व्यवस्था न होती तो आज हमारे आधुनिक शहर पूरी तरह ठप हो चुके होते। ट्रैफिक लाइट केवल गाड़ियों को रोकने या चलाने का काम नहीं करती, यह सड़क पर चलने वाले हर व्यक्ति, चाहे वह पैदल यात्री हो या ड्राइवर, के बीच समानता और सुरक्षा का संतुलन बनाती है।
आज एक सदी से ज्यादा समय बाद हमारे पास स्मार्ट सिग्नल हैं, एआई कैमरे हैं, नंबर प्लेट पहचानने वाली तकनीक है और घर बैठे मोबाइल पर ई-चालान पहुंचाने की व्यवस्था है, लेकिन एक सवाल तकनीक से बड़ा है, क्या हमारी नागरिक समझ भी स्मार्ट हुई? आज समस्या ट्रैफिक लाइट की तकनीक में नहीं, बल्कि हमारे रवैये में है।
पीली बत्ती देखते ही गाड़ी धीमी करने के बजाय रफ्तार बढ़ा देना या खाली सड़क देखकर लाल बत्ती पार कर लेना, ये ऐसी आदतें हैं जो अक्सर बड़ी दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। ट्रैफिक सिग्नल केवल पुलिस के चालान से बचने का जरिया नहीं है, यह समाज में अनुशासन और सह अस्तित्व की परीक्षा है।
जब हम लाल बत्ती पर रुकते हैं तो हम केवल एक नियम का पालन नहीं कर रहे होते, बल्कि चौराहे के दूसरी तरफ से आ रहे अनजान व्यक्ति के सुरक्षित गुजरने के अधिकार का सम्मान कर रहे होते हैं। यहीं कानून और नागरिकता के बीच का फर्क सामने आता है।
कानून का डर कहता है, कोई देख रहा है, इसलिए नियम मानो। लेकिन नागरिक बोध कहता है, कोई नहीं देख रहा, फिर भी नियम मानो। दुर्भाग्य से हम पहले वाले समाज से दूसरे वाले समाज की यात्रा अभी पूरी नहीं कर पाए हैं। सड़क पर हमारी सबसे बड़ी बीमारी ‘जल्दी’ है।
हर व्यक्ति जल्दी में है। किसी को ऑफिस पहुंचना है, किसी को दुकान खोलनी है, किसी को स्कूल छोड़ना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारी कुछ मिनट की जल्दी किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण है? पीली बत्ती इसी जल्दबाजी की परीक्षा है।
उसका संदेश है, गति कम कीजिए, सावधान हो जाइए, रुकने के लिए तैयार रहिए। लेकिन हममें से कितने लोग इसे ऐसा समझते हैं? अक्सर पीली बत्ती देखते ही एक्सीलेटर पर पैर और दब जाता है। यही कुछ सेकंड कभी-कभी जिंदगी और दुर्घटना के बीच की दूरी तय करते हैं।
ट्रैफिक सिग्नल के तीन रंगों को अगर नागरिकता के तीन सूत्र मान लें तो बात शायद ज्यादा आसानी से समझ आएगी। लाल-रुकिए, क्योंकि सड़क पर आपका अधिकार किसी दूसरे की जिंदगी से बड़ा नहीं है। पीला-सोचिए, क्योंकि हर जगह पहले पहुंचना जरूरी नहीं, सुरक्षित पहुंचना जरूरी है।
हरा-आगे बढ़िए, लेकिन इस भरोसे के साथ कि आपके आगे बढ़ने का रास्ता किसी दूसरे के अधिकार को कुचलकर नहीं बनाया गया है। हम शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं।
सेंसर लग रहे हैं, कैमरे लग रहे हैं, कमांड सेंटर बन रहे हैं। यह जरूरी भी है। मगर दुनिया की सबसे महंगी ट्रैफिक तकनीक भी उस चालक को सभ्य नहीं बना सकती जो नियम को केवल चालान से जोड़कर देखता है।
शहर की असली स्मार्टनेस उसके फ्लाईओवर, सिग्नल और कैमरों में नहीं, उसके नागरिकों के व्यवहार में दिखाई देती है। सवाल इसलिए यह नहीं कि हमारे चौराहे कितने आधुनिक हैं। सवाल यह है कि उन चौराहों पर खड़े हम कितने जिम्मेदार हैं।
अंतरराष्ट्रीय ट्रैफिक लाइट दिवस पर शायद हमें ट्रैफिक पुलिस से ज्यादा खुद से एक वादा करना चाहिए, लाल बत्ती पर पुलिस के डर से नहीं, किसी अनजान इंसान की जिंदगी के सम्मान में रुकेंगे। पीली बत्ती पर जल्दबाजी नहीं, संयम चुनेंगे।
हरी बत्ती पर अधिकार नहीं, जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ेंगे और शायद सभ्य समाज की शुरुआत भी यहीं से होती है, जहां कोई हमें रोकने वाला न हो, फिर भी हम रुकना जानते हों।
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