राहुल गांधी को सुनना इसलिए है जरूरी: संघर्ष की भट्ठी में तपकर उभरे राहुल; वैचारिक दृढ़ता और जन-स्वीकार्यता का नया दौर
KHULASA FIRST
संवाददाता

राहुल गांधी: वैचारिक दृढ़ता, जन-संघर्ष और एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प
डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारतीय राजनीति के केंद्र में राहुल गांधी एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित हैं, जिनकी राजनीतिक यात्रा वैचारिक संघर्ष, निरंतर सीखने और अपनी छवि के पुनरुत्थान की एक अनूठी मिसाल है। उन्होंने यह साबित किया कि वे लंबी दूरी की राजनीतिक लड़ाई लड़ने और जमीनी स्तर पर पसीना बहाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, जिससे उनकी जन-स्वीकार्यता में बड़ा इजाफा हुआ।
सीधे और तीखे सवालों के जरिये सरकार की जवाबदेही तय करते हैं। उनकी यह शैली उन्हें आलोचक के बजाय गंभीर, मुखर और वैचारिक रूप से मजबूत राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करती है।
जैसा कि सामाजिक कार्यकर्ता अमूल्य निधि बताते हैं बचपन से ही राहुल का जीवन असाधारण और गहरे व्यक्तिगत दुखों से घिरा रहा है। निजी जीवन की इन त्रासदियों के साथ-साथ उन्हें सार्वजनिक जीवन में भी लगातार कठिन संघर्षों का सामना करना पड़ा।
लेकिन इन तमाम संकटों ने उन्हें कमजोर करने के बजाय और अधिक दृढ़ बनाया। राजनीतिक विरोधियों ने भले ही उन्हें और उनकी पार्टी को शुरुआती दौर में कमजोर करने के तमाम प्रयास किए, पर वे सत्ता के भारी दबाव और सीधी लड़ाई के आगे कभी नहीं झुके, बल्कि इन संघर्षों की भट्ठी में तपकर और अधिक मजबूत व परिपक्व होकर उभरे हैं। आज का उनका राजनीतिक तेवर और लगातार जारी वैचारिक संघर्ष इसी लंबी और कठिन व्यक्तिगत-राजनीतिक यात्रा का जीवंत परिणाम है।
तमाम राजनीतिक आलोचनाओं के पार उनके मन में देश के मूल लोकतांत्रिक मूल्यों और जनता के प्रति एक सच्ची और गहरी प्रतिबद्धता साफ झलकती है। डर या दबाव के आगे हार न मानकर सीधे जनता के बीच रहकर देश के बुनियादी मूल्यों को बचाना ही उनकी राजनीतिक यात्रा का उद्देश्य नजर आता है।
साल 2004 में सक्रिय राजनीति में कदम रखने और अमेठी से सांसद बनने के बाद से उन्होंने विभिन्न भूमिकाएं निभाईं। सत्तापक्ष के तीखे हमलों और वर्षों तक चले सोशल मीडिया के नकारात्मक नैरेटिव के बावजूद वे लगातार संविधान, लोकतंत्र, आर्थिक असमानता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर अडिग रहे।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ जैसे बड़े अभियानों के बाद उनकी छवि एक ‘अनिच्छुक राजनेता’ से बदलकर पूरी तरह जमीन पर संघर्ष करने वाले, मुखर और जनता के बीच रहने वाले नेता की बन चुकी है। यह सब कुछ ऐसे समय में हुआ जब उनके विरोधियों ने एक दशक से उनके खिलाफ व्यक्तिगत, वैचारिक और मनोवैज्ञानिक नैरेटिव खड़े किए। लगातार सुनियोजित तरीकों से उनकी छवि को अयोग्य, नासमझ, बहुसंख्यक विरोधी, गैर हिंदू, विदेशी आदि जैसे नैरेटिव से बदनाम किया जाता रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों के अनुसार इसके पीछे गहरी चुनावी रणनीति है, ताकि सत्ता को प्रमुख विपक्षी नेता से किसी तरह की चुनौती नहीं मिल सके, लेकिन ऐसे प्रयास अब प्रभावहीन हो चुके हैं। जनजाति समाज के बीच जल, जमीन, जंगल और विकास के कारण होने वाले विस्थापन की लड़ाई लड़ने वाले राहुल यादव कहते हैं कि वह आदिवासियों की लड़ाई को केवल बुनियादी सुविधाओं या आर्थिक मदद तक सीमित नहीं मानते, बल्कि इसे उनकी अस्मिता, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा की एक बड़ी लड़ाई के रूप में देखते हैं।
जनजातीय छात्रों के होस्टल, आश्रम, स्कूलों की दुर्दशा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और छात्र-युवाओं के संघर्षों रोजगार (जैसे छात्र आंदोलनों और न्याय की मांग) में वे लगातार उनके साथ खड़े नजर आते हैं। उन्होंने शिक्षा को हर बच्चे का मूल अधिकार बताया है।
जल, जंगल और जमीन के अधिकारों की सुरक्षा पर उनका मानना है कि औद्योगिक और कॉरपोरेट लाभ के लिए आदिवासियों की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं होना चाहिए। आदिवासी देश के जल, जंगल और जमीन के असली मालिक हैं। वे ‘वनवासी’ शब्द के इस्तेमाल का कड़ा विरोध करते हुए इसे उनकी मूल पहचान और अधिकारों को मिटाने की साजिश करार देते हैं।
कांग्रेस नेता राजेश चौकसे कहते हैं कि राहुल गांधी लगातार केंद्र सरकार की जन विरोधी नीतियों को लेकर चेतावनी देते रहे हैं। चाहे आर्थिक नीति हो या अमेरिका ट्रेड डील इन नीतियों पर राहुल ने जो कहा, वह सब सच साबित हो रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक संकट आदि इसके उदाहरण हैं।
युवा प्रगतिशील कृषक और कांग्रेस के युवा नेता देवेंद्र पाटीदार बताते हैं अमेरिका ट्रेड डील को लेकर राहुल ने आरोप लगाया था कि इस डील के तहत पहली बार भारतीय कृषि क्षेत्र को अमेरिकी कृषि के लिए खोला गया है, जिससे बीज, डेयरी, खाद्य सुरक्षा से लेकर उपज और बड़ी मशीनीकृत अमेरिकी कंपनियों के सामने देश के छोटे किसान टिक नहीं पाएंगे। उनकी इन चेतावनियों से देश के प्रबुद्ध वर्ग वैज्ञानिक और संगठन भी सहमत नजर आए।
उन्होंने कहा था कि अमेरिका से किए गए समझौते में ‘गैर-व्यापार बाधाओं’ को हटाने और समझौतों के नाम पर भविष्य में न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद और जीएम फसलों से जुड़े नियमों को कमजोर करने का दबाव बढ़ेगा, जबकि सरकार ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि किसानों के हितों और प्रमुख कृषि उत्पादों को इस समझौते में पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। आर्थिक मामलों के जानकार दिनेश कोठारी मानते हैं कि आर्थिक विषयों पर राहुल ने हमेशा सवाल खड़े किए, जो सही साबित हुए।
अर्थव्यवस्था और बैंक ऋण माफी
राहुल गांधी ने लगातार यह आरोप लगाया कि सरकार की नीतियां चुनिंदा उद्योगपतियों (जैसे अडानी-अंबानी) को फायदा पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं। बड़े कॉरपोरेट घरानों के खरबों रुपए के ऋण माफ किए जाने और आर्थिक संरचना को गलत तरीके से मोड़े जाने के खिलाफ बार-बार चेतावनी दी कि इससे देश में गंभीर आर्थिक असमानता और संकट पैदा होगा।
इसके अलावा नोटबंदी को बड़ा झटका बताया था। उनकी यह चेतावनी काफी हद तक सही मानी गई। असंगठित क्षेत्र, छोटे व्यवसायों और मध्यम वर्ग को भारी नुकसान हुआ। देश में बेरोजगारी और आर्थिक मंदी व अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ती चली जा रही है।
पर्यावरण की तबाही
पर्यावरण के मुद्दों को राजनीतिक एजेंडा में शामिल करने की बात कहते हुए उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाने वाली विकास परियोजनाओं की आलोचना की है। ग्रेट निकोबार जैसी मेगा परियोजनाओं और पर्यावरणीय कानूनों को कमजोर किए जाने को लेकर उन्होंने चेतावनी दी थी कि यह भविष्य में गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का कारण बन सकता है। जलवायु परिवर्तन से जुड़ी घटनाओं, हिमालयी क्षेत्रों (जैसे नेपाल, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश) में लगातार हो रहे ग्लेशियर मेल्टिंग, भूस्खलन और पर्यावरणविदों की चिंता इन चेतावनियों को सही साबित कर रहे हैं।
रक्षा नीति और चीन
विदेश नीतियों के जानकार बताते हैं कि राहुल गांधी ने पूर्वी लद्दाख और डोकलाम के समय से ही चीन की आक्रामकता व भारतीय सीमाओं में घुसपैठ के मामले पर सरकार को घेरा था। उन्होंने कहा था कि चीन से खतरे की सच्चाई छिपाना देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। रक्षा विशेषज्ञों और उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों ने यह साबित किया कि चीन ने लद्दाख सीमा के पास घुसपैठ की, जिससे भारत की सामरिक स्थिति पर दबाव बढ़ा है।
राहुल गांधी होने के मायने
राहुल गांधी होने का मतलब एक ऐसे राजनेता के रूप में उभरना है, जिसने सत्ता की राजनीति से ज्यादा वैचारिक प्रतिबद्धता की राह अपनाई। यह इस बात का प्रतीक है कि लंबे समय तक राष्ट्र पर राज करने वाले परिवार की सुख-सुविधाओं में रहने और तमाम राजनीतिक संघर्षों के बावजूद कैसे कोई व्यक्ति लगातार जनता के बीच रहकर अपनी प्रासंगिकता और एक मजबूत लोकतांत्रिक विपक्ष की भूमिका को फिर से जीवित कर सकता है।
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