जूनी इंदौर के सिद्ध मंदिर की कहानी: पोटली वाले चिंतामण गणेश
KHULASA FIRST
संवाददाता

दाहिनी सूंड वाले गणेशजी के हाथ में कब और कैसे प्रकट हुई पोटली
105 साल तक बप्पा की सेवा में रहे पुजारी गणेशानंद
प्रत्येक गुरुवार हल्दी की गांठ, हर मान्यता अलग
पत्थर तराशने वाले गडरियों से सोने के सिंहासन तक
बियाबानी में विराजे अवध के राजा
जंगल थीम पर सजा पंडाल
सिंह पर सवार महोत्कट रूप में विराजे गणेशजी
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
हर साल गणेशोत्सव के दिनों में इंदौर के मोहल्लों में जब पंडाल सजते हैं और ढोल-ताशों की गूंज गलियों में उतरती है, तब शहर के कुछ पुराने गणेश मंदिरों की ओर भी श्रद्धालुओं के कदम स्वाभाविक रूप से मुड़ जाते हैं। सरस्वती नदी के किनारे बसे जूनी इंदौर में एक ऐसा ही मंदिर है, जिसकी पहचान बप्पा के दाहिने हाथ में उभरी धन की पोटली से बनी है।
शहरवासी इसे गणेश महल के नाम से भी जानते हैं। चिंतामण गणेश मंदिर के रूप में यह जूनी इंदौर के सबसे पुराने आस्था-केंद्रों में गिना जाता है। गणेशोत्सव के दौरान यहां भीड़ सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाती है। बप्पा के भव्य शृंगार से लेकर हल्दी की गांठ पाने तक हर आने वाला अपनी मुराद लेकर यहां पहुंचता है।
मंदिर की उम्र को लेकर अलग-अलग मान्यताएं... मंदिर की प्राचीनता को लेकर एक तय आंकड़ा नहीं मिलता और यही इसकी कहानी का दिलचस्प पहलू भी है। कुछ श्रद्धालु इसे लगभग 200 वर्ष पुराना मानते हैं तो कुछ इसे 500 वर्ष प्राचीन बताते हैं, जबकि कई इतिहासप्रेमी और श्रद्धालु इसे परमारकालीन मानते हुए करीब 1200 वर्ष पुराना होने का दावा करते हैं।
मंदिर से जुड़ा कोई पुरातात्विक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, इसलिए ये सभी आंकड़े स्थानीय मान्यताओं और मंदिर परिवार की जनश्रुतियों पर आधारित हैं, न कि किसी प्रमाणित इतिहास पर।
एक लोककथा के अनुसार रोजगार की तलाश में इंदौर आए कुछ गडरियों ने एक पत्थर को तराशकर गणपति की प्रतिमा गढ़ी थी, जो धीरे-धीरे श्रद्धा का केंद्र बन गई। यह कथा मंदिर की प्राचीनता को परमारकाल तक ले जाने वाले दावे से अलग है, इसलिए इसे भी इतिहास के बजाय आस्था-कथा के रूप में ही देखना उचित है।
दाहिनी सूंड वाले गणेशजी... इस मंदिर की प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता है गणेशजी की दाहिनी सूंड। पारंपरिक मान्यता में ऐसी प्रतिमाएं दुर्लभ मानी जाती हैं और तंत्र-अध्यात्म की परंपरा में इन्हें विशेष रूप से शक्तिशाली और सिद्ध माना जाता है। यही वजह है कि मंदिर को सिद्ध पीठ के रूप में भी पहचाना जाता है।
इसलिए कहते हैं ‘गणेश महल’... मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही इसकी भव्यता समझ आ जाती है। यही वजह है कि स्थानीय लोग इसे मंदिर से अधिक ‘महल’ कहकर पुकारते हैं। चिंतामण गणेश की प्रतिमा लकड़ी के एक सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान है, जिस पर सोने की परत चढ़ी है।
मंदिर परिवार के अनुसार 1985 में यहां ऋद्धि-सिद्धि की प्राण-प्रतिष्ठा भी की गई थी, जिसके बाद से प्रतिमा-समूह की पूजा पूर्ण गणेश परिवार के रूप में होने लगी। गणेशोत्सव के दिनों में यह सिंहासन फूलों, रोशनी और विशेष वस्त्रों से और भी आकर्षक रूप ले लेता है। शाम की आरती के समय पूरा परिसर दीपों की रोशनी से जगमग रहता है।
पोटली का रहस्य: 2011 में सामने आया अनोखा रूप... मंदिर की मौजूदा पहचान ‘पोटली वाले गणेश’ ज्यादा पुरानी नहीं है। मुख्य पुजारी परिवार के अनुसार वर्ष 2011 में जब प्रतिमा का पुराना चोला बदला गया, तब गणेशजी के दाहिने हाथ में धन की पोटली स्पष्ट रूप से दिखाई दी।
पुजारी परिवार का कहना है कि वर्षों तक सिंदूर की परत के नीचे यह पोटली छिपी रही और चोला हटने पर पहली बार सामने आई। इसी घटना के बाद से बप्पा को यह नया नाम मिला।
भक्तों को प्रति गुरुवार दी जाती है हल्दी की गांठ... मंदिर से जुड़ी सबसे प्रचलित परंपरा है हल्दी की गांठ का वितरण। पुजारी के अनुसार प्रति गुरुवार यहां आने वाले भक्तों को हल्दी की गांठ दी जाती है। मान्यता है कि विवाह में आ रही बाधाओं या अटके कार्यों को लेकर श्रद्धालु इस हल्दी का विधिवत पूजन करते हैं, जिसे स्थानीय स्तर पर बेहद प्रभावी माना जाता है।
105 वर्ष तक सेवा में रहे पुजारी गणेशानंदजी... मंदिर की सेवा-परंपरा में एक नाम खास तौर पर लिया जाता है- हरिजी पुराणिक, जो संन्यास लेने के बाद गणेशानंदजी कहलाए। फरवरी 1907 में जन्मे गणेशानंदजी का निधन दिसंबर 2012 में हुआ। यानी वे लगभग 105 वर्ष जीवित रहे और जीवनभर मंदिर की सेवा से जुड़े रहे। आज भी उनका परिवार ही मंदिर की पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभालता है।
नियमित पूजा और विशेष शृंगार... मंदिर में प्रतिदिन पूजा-अर्चना और शृंगार होता है, जबकि बुधवार को यहां श्रद्धालुओं की सबसे अधिक भीड़ देखी जाती है। मंदिर परिवार के अनुसार वर्षभर आने वाली चार प्रमुख चतुर्दशी के अवसर पर बप्पा का विशेष शृंगार किया जाता है, तब मंदिर किसी महल की तरह सजा दिखता है।
गणेशोत्सव के दिनों में बदल जाता है मंदिर का रंग-ढंग
गणेशोत्सव के दस दिनों में इस मंदिर की रौनक देखते ही बनती है। मंदिर परिवार के अनुसार इन दिनों प्रतिदिन विशेष शृंगार, अतिरिक्त आरतियां और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है, जबकि गुरुवार की हल्दी गांठ परंपरा इन दिनों और भी बड़े पैमाने पर निभाई जाती है, क्योंकि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है।
शहर के अन्य गणेश पंडालों में जहां नई-नई सजी प्रतिमाओं का दस दिन का उत्सव होता है, वहीं चिंतामण गणेश मंदिर का आकर्षण इसकी सदियों पुरानी, सिद्ध मानी जाने वाली मूल प्रतिमा ही है। यही वजह है कि गणेशोत्सव में भी यहां नए से ज्यादा पुराने और सिद्ध की खोज में लोग पहुंचते हैं।
शहर में गणेश उत्सव की धूम मची हुई है और हर तरफ बप्पा के जयकारे गूंज रहे हैं, लेकिन इस बार बियाबानी क्षेत्र में हो रहा गणेश उत्सव अपनी एक अलग और अनोखी पहचान बना रहा है।
बियाबानी स्थित धार रोड पोस्ट ऑफिस के पास “अवध के राजा” गणेश उत्सव समिति द्वारा इस वर्ष गणेश उत्सव का बेहद भव्य और आकर्षक आयोजन किया जा रहा है। इस पंडाल की सबसे खास और चर्चित बात यह है कि इस बार इसकी पूरी थीम “जीरो वेस्ट’ रखी गई है, जो भक्ति के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश दे रही है।
मुख्य आयोजक अखिलेश मेवाती ने बताया इस बार पंडाल की सजावट में पर्यावरण संरक्षण को सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। पंडाल की पूरी सजावट जीरो वेस्ट थीम पर की गई है। इसके लिए बांस, लकड़ी, जूट, पुराने कपड़े, मिट्टी के बर्तन और रिसाइकल किए गए सामान का उपयोग किया गया है, ताकि उत्सव के बाद कोई भी कचरा न बचे और पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे।
अखिलेश मेवाती ने कहा हमारा उद्देश्य सिर्फ उत्सव मनाना ही नहीं, बल्कि लोगों को यह संदेश देना भी है कि हम भक्ति के साथ-साथ प्रकृति की भी रक्षा कर सकते हैं। गणेशजी खुद प्रकृति के देवता हैं, इसलिए उनकी आराधना में पर्यावरण का ख्याल रखना हमारी जिम्मेदारी है।
पश्चिम क्षेत्र के मल्हारगंज में 12 दिवसीय गणेश उत्सव श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष उत्सव के लिए विशेष रूप से वन सृष्टि की थीम पर पंडाल तैयार किया गया है। पंडाल में भगवान श्री गणेश को महोत्कट स्वरूप में सिंह पर सवार दर्शाया गया है, जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।
उत्सव में प्रतिदिन भगवान गणेश की आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी का वितरण किया जा रहा है। इसके साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
शाम के समय बड़ी संख्या में श्रद्धालु पंडाल पहुंचकर गणेशजी के दर्शन कर रहे हैं। आयोजक रामा भावसार और उनकी टीम करीब 16 वर्षों से मल्हारगंज क्षेत्र में गणेश उत्सव का आयोजन करती आ रही है। कार्यक्रम प्रभारी कान्हा गोयल ने बताया कि इस वर्ष पंडाल को राजा के भव्य और अलौकिक जंगल की थीम पर तैयार किया गया है।
‘एक पेड़ मां के नाम’ का दिया संदेश... उत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा रहा है। ‘एक पेड़ मां के नाम’ संकल्प के तहत श्रद्धालुओं और आम लोगों को हजारों तुलसी के पौधे वितरित किए गए। गणेश उत्सव के समापन अवसर पर 24 सितंबर को महाआरती और विशाल भंडारे का आयोजन किया जाएगा।
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