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गंगा किनारे उपेक्षित रह गया रामायण का सबसे बड़ा त्याग: ऋषिकेश के अधिपति देव

Khulasa First

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संवाददाता

06 जून 2026, 8:13 pm
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गंगा किनारे उपेक्षित रह गया रामायण का सबसे बड़ा त्याग

‘भरत मंदिर’ में दफन है ब्रह्म-हत्या के दोष निवारण का सच, ऋषिकेश के बीचोबीच है ‘छोटा केदारनाथ’, कत्यूरी शैली का वो गर्भगृह और शालिग्राम मूर्ति, जिसे आदि गुरु शंकराचार्य ने खोजा

सिर्फ दो नदियों का मिलन नहीं है देवप्रयाग, संगम के ठीक ऊपर रघुनाथ मंदिर में छुपा है भरत की कठिन साधना का अंतिम अध्याय...

हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
उत्तराखंड की पावन वादियों में कदम रखते ही हर तीर्थयात्री का मन ऋषिकेश के लक्ष्मण झूला, त्रिवेणी घाट की चकाचौंध और आगे बढ़कर देवप्रयाग में अलकनंदा-भागीरथी के अलौकिक संगम की ओर खिंचा चला जाता है, लेकिन इस विहंगम आध्यात्मिक यात्रा मार्ग के बीच, अधिकांश लोग अनजाने में रामायण काल के एक ऐसे महाचरित्र की मुख्य तपोस्थली को पीछे छोड़ देते हैं, जिनका त्याग संपूर्ण सनातन परंपरा में अद्वितीय है।

हम बात कर रहे हैं भगवान राम के अनुज और अनन्य भक्त भरत की। ऋषिकेश के ठीक बीचों-बीच स्थित ‘भरत मंदिर’ और देवप्रयाग का प्राचीन ‘रघुनाथ मंदिर’ अपने भीतर कुछ ऐसे विस्मयकारी पौराणिक रहस्य और ऐतिहासिक दस्तावेज समेटे हुए हैं, जो आज भी आम यात्रियों और पर्यटकों की नजरों से ओझल हैं।

गंगा के तटों पर लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नाम पर बने मंदिरों, घाटों और एडवेंचर स्पोर्ट्स के शोर के बीच भरत जी का यह प्राचीन शिखरिणी धाम आज भी एक शांत साधना केंद्र के रूप में खड़ा है। इतिहास, पुरातत्व और आस्था का यह एक ऐसा अनूठा गठजोड़ है, जिसे गहराई से समझे बिना देवभूमि की यात्रा अधूरी ही रह जाती है।

बाबा केदारनाथ जैसी वास्तुकला और शालिग्राम मूर्ति का रहस्य...पुरातत्व और इतिहास के दृष्टिकोण से ऋषिकेश का यह ‘भरत मंदिर’ शोधकर्ताओं को अचंभित कर देता है। इस मंदिर का मुख्य गर्भगृह और इसकी आंतरिक पाषाण कला हूबहू बाबा केदारनाथ के मुख्य मंदिर के गर्भगृह से मेल खाती है।

मंदिर के भीतर भगवान विष्णु की एक अत्यंत दुर्लभ और भव्य चतुर्भुज मूर्ति स्थापित है, जिसे कसौटी पत्थर (शालिग्राम) के एक एकल शिलाखंड को तराशकर बनाया गया है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, बौद्ध काल के अवसान के दौरान जब प्राचीन सनातनी प्रतीकों को नुकसान पहुंच रहा था, तब आदि गुरु शंकराचार्य ने इस जीर्ण-शीर्ण धाम का पुनरुद्धार किया था।

उन्होंने वसंत पंचमी के दिन इस दिव्य मूर्ति को पुनः गर्भगृह में स्थापित किया था। आज भी सदियों पुरानी परंपरा के तहत हर साल वसंत पंचमी पर भगवान की इस मूर्ति को पवित्र डोली में रखकर त्रिवेणी घाट ले जाया जाता है, जहां गंगाजल से उनका भव्य अभिषेक होता है। मंदिर की दीवारों पर उत्कीर्ण प्राचीन शिलालेख और नक्काशीदार पत्थर कत्यूरी राजवंश के स्वर्ण काल की गवाही देते हैं।

देवप्रयाग का रघुनाथ मंदिर: जहां पूरी हुई भरत की प्रतिज्ञा...ऋषिकेश से जब यात्रा पहाड़ों की घुमावदार सड़कों से होते हुए 70 किलोमीटर आगे देवप्रयाग पहुंचती है, तो दो नदियों के पावन संगम के ठीक ऊपर ऊंचे और विशाल पत्थरों से बना एक भव्य प्राचीर दिखाई देता है- यही है ‘रघुनाथजी मंदिर’। यह गढ़वाल हिमालय के सबसे प्राचीन और वास्तुकला के लिहाज से बेजोड़ मंदिरों में से एक है।

इस स्थान का सीधा जुड़ाव भी भरत जी की उसी तपस्या की पूर्णाहुति से है। माना जाता है कि ऋषिकेश में अपनी इंद्रियों को वश में करने के बाद, भरत जी ने देवप्रयाग के इस ऊंचे शिखर पर अपने आराध्य भगवान राम (रघुनाथ) के विग्रह की स्थापना कर अपनी साधना को अंतिम मुकाम दिया था।

द्रविड़ और कत्यूरी शैली के इस अनूठे मिश्रित वास्तुकला वाले मंदिर के बारे में यह भी कहा जाता है कि यहां स्वयं भगवान राम ने भी अपने मानवीय स्वरूप में ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्ति के लिए कुछ समय तक मौन ध्यान लगाया था।

आधुनिक पर्यटन की चकाचौंध में क्यों उपेक्षित रह गई यह विरासत...यहां एक बड़ा पत्रकारीय और सांस्कृतिक सवाल यह उठता है कि ऋषिकेश के मुख्य बाजार और रेलवे स्टेशन के इतने नजदीक होने के बावजूद, यह ऐतिहासिक धरोहर आम तीर्थयात्रियों की प्राथमिक सूची में लक्ष्मण झूला या राम झूला जितनी लोकप्रिय क्यों नहीं हो पाई?

इसका मुख्य कारण आधुनिक पर्यटन का व्यावसायिक और सतही स्वरूप है। अधिकांश ट्रैवल एजेंसियां, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और कमर्शियल गाइड यात्रियों को केवल गंगा आरती, कैफे कल्चर और एडवेंचर स्पोर्ट्स (राफ्टिंग-कैंपिंग) तक ही सीमित रखते हैं।

इसके अतिरिक्त, गंगा किनारे बने लक्ष्मण और शत्रुघ्न के नाम से जुड़ी लोक-कथाओं का प्रचार-प्रसार अधिक हुआ, जिसके कारण भरत जी की यह मूक तपोस्थली केवल स्थानीय श्रद्धालुओं और उच्च कोटि के संतों के बीच ही सिमट कर रह गई, लेकिन जो लोग वास्तव में देवभूमि के गूढ़ इतिहास और रामायण कालीन वास्तविक ऊर्जा को महसूस करना चाहते हैं, उनके लिए यह स्थान एक जीवंत पुरातात्विक पुस्तकालय की तरह है।

यह मंदिर ऋषिकेश के मुख्य ओल्ड टाउन में त्रिवेणी घाट के बिल्कुल समीप स्थित है, जहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर में एक अत्यंत समृद्ध पुरातत्व संग्रहालय भी है, जहां खुदाई में मिलीं दूसरी शताब्दी से लेकर दसवीं शताब्दी तक की दुर्लभ मूर्तियां, प्राचीन सिक्के और पुरातात्विक अवशेष सहेजकर रखे गए हैं।

गढ़वाल के वरिष्ठ संतों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, चार धाम (केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री) की यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं को ऋषिकेश से आगे बढ़ने से पहले इस ‘नगर देवता’ के दर्शन कर अनुमति और आशीर्वाद जरूर लेना चाहिए, क्योंकि भरत जी को ही इस पूरे क्षेत्र का रक्षक और अधिपति देव माना गया है।

रावण वध और ‘ब्रह्म-हत्या’ का दोष : अंगूठे पर खड़ी वह कठिन साधना...
इस स्थान के अस्तित्व में आने की पृष्ठभूमि लंका विजय के बाद के कालखंड से जुड़ती है। रामायण के पन्नों के अनुसार, यद्यपि रावण एक अत्याचारी और अधर्मी राजा था, परंतु वह एक प्रकांड विद्वान, चारों वेदों का ज्ञाता और जन्म से उच्च कुलीन ब्राह्मण भी था।

यही कारण था कि रावण का वध करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और उनके भाइयों पर ‘ब्रह्म-हत्या’ का भारी दोष लगा था। इस महादोष के निवारण और आत्म-शुद्धि के लिए कुल गुरु महर्षि वशिष्ठ के आदेश पर चारों भाइयों ने उत्तराखंड के अलग-अलग निर्जन स्थानों पर तपस्या करने का संकल्प लिया।

जहां लक्ष्मण जी ने ऋषिकेश के तपोवन क्षेत्र को चुना, वहीं त्याग की साक्षात प्रतिमूर्ति भरत जी ने ऋषिकेश के इसी हृदय स्थल को अपनी कठिन साधना के लिए चुना।

पौराणिक मान्यता है कि भरत जी ने यहां कई वर्षों तक निराहार रहकर, केवल अपने पैर के अंगूठे पर खड़े होकर भगवान नारायण की घोर आराधना की थी।

उनकी इस निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर साक्षात् भगवान विष्णु ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान दिया कि कलियुग में यह पूरा क्षेत्र ‘भरत क्षेत्र’ के नाम से विख्यात होगा।

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