लटूरी देवता की गवाही के बिना अधूरी और खंडित है बाबा केदार की यात्रा
KHULASA FIRST
संवाददाता

दृश्य बही-खाता: केदारघाटी के रक्षक भी और श्रद्धालुओं की हाजिरी के साक्षात् ‘साक्षी’ भी
देवभूमि की अटूट परंपरा: बाबा केदार के दर्शन से पहले क्यों जरूरी है क्षेत्रपाल के दरबार में उपस्थिति
हिमपात के बीच अदम्य सुरक्षा: शून्य डिग्री तापमान में भी घाटी की व्यवस्था संभालते हैं लाटू देवता
हिमालय का वो रहस्यमयी रक्षक, जिसके आदेश के बिना केदारनाथ धाम में प्रवेश नहीं मानती परंपरा
केदारनाथ के असली पथ को समझने के लिए जरूरी है इस चौखट पर सिर झुकाना
हेमंत उपाध्याय 99930-99008 खुलासा फर्स्ट।
देवभूमि उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय की गोद में बसी संस्कृति केवल भव्य मंदिरों और बर्फीली चोटियों तक सीमित नहीं है। यहां का कण-कण लोक-आस्था, पौराणिक नियमों और कड़े आध्यात्मिक-प्रशासनिक बंधनों से बंधा हुआ है।
बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक, बाबा केदारनाथ के दर्शनों के लिए हर साल देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु केदारघाटी पहुंचते हैं। मुख्य मंदिर की भव्यता और केदारनाथ धाम की महिमा से तो हर कोई परिचित है, लेकिन इस पूरी घाटी की सुरक्षा, व्यवस्था और सीमाओं की रक्षा का जिम्मा सदियों से एक दिव्य महाशक्ति के हाथों में है।
इन्हें स्थानीय लोक-संस्कृति में ‘लटूरी देवता’ (या लाटू देवता) कहा जाता है, जो बाबा केदारनाथ के मुख्य क्षेत्रपाल यानी रक्षक देवता हैं। केदारघाटी की प्राचीन और अडिग परंपराओं के अनुसार, जब तक कोई तीर्थयात्री इस मार्ग पर स्थित क्षेत्रपाल लटूरी देवता के दरबार में हाजिरी नहीं लगाता, तब तक बाबा केदार की उसकी पूरी यात्रा अधूरी और खंडित मानी जाती है।
केदारघाटी के रक्षक भी और साक्षात् ‘साक्षी’ भी...पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव ने केदारघाटी को अपना परम निवास स्थान चुना, तब उन्होंने इस दुर्गम हिमालयी क्षेत्र की सुरक्षा और सीमाओं की रखवाली का दायित्व अपने परम गणों और क्षेत्रपालों को सौंपा था। स्थानीय लोक-मान्यताओं में लटूरी देवता को भगवान शिव का ही अंश या उनके रौद्र रूप भगवान भैरवनाथ का स्थानीय स्वरूप माना जाता है।
गुप्तकाशी और उखीमठ के मध्य पड़ने वाले पावन बेल्ट में लटूरी देवता का मुख्य स्थान है। गढ़वाल की लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ और इतिहासकार बताते हैं कि लटूरी देवता यहां केवल एक रक्षक की भूमिका में नहीं हैं, बल्कि वे केदारनाथ आने वाले हर एक श्रद्धालु के ‘साक्षी’ भी हैं।
मान्यता है कि उनके दरबार में माथा टेकने के बाद ही किसी श्रद्धालु का नाम बाबा केदार के दिव्य बही-खाते में दर्ज होता है। यदि कोई तीर्थयात्री अज्ञानतावश या अहंकारवश इनकी उपेक्षा कर सीधे मुख्य धाम की ओर बढ़ जाता है, तो क्षेत्रपाल उस यात्री की पूजा और हाजिरी को स्वीकार नहीं करते।
जहां अदृश्य रूप से बहती हैं गंगा-यमुना... लटूरी देवता के इस पावन क्षेत्र के ठीक समीप गुप्तकाशी का ऐतिहासिक और चमत्कारी मणिकर्णिका कुंड स्थित है। काशी (वाराणसी) की तरह ही इस गुप्तकाशी क्षेत्र का भी सनातन धर्म में अत्यंत विशेष महत्व है।
इस पौराणिक कुंड की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां दो प्राचीन पत्थरों के मुखों (जिन्हें धार्मिक प्रतीक रूप में गाय और हाथी का मुख माना जाता है) से जल की अविरल धाराएं चौबीसों घंटे गिरती रहती हैं।
स्थानीय तीर्थ पुरोहितों और वेदों के ज्ञाताओं के अनुसार, ये धाराएं कोई साधारण पहाड़ी जलस्रोत नहीं हैं, बल्कि साक्षात् गंगा और यमुना हैं, जो यहां भूमिगत और अदृश्य रूप से प्रकट होकर इस कुंड में विलीन होती हैं।
प्राचीन काल से ही यह नियम रहा है कि केदारनाथ जाने वाले तीर्थयात्री पहले इस मणिकर्णिका कुंड के पवित्र जल में स्नान या आचमन करते थे, उसके बाद लटूरी देवता के दर्शन कर अपनी यात्रा की अनुमति मांगते थे और फिर केदारनाथ की अंतिम दुर्गम चढ़ाई की ओर कदम बढ़ाते थे।
शीतकाल में सीमाओं की रखवाली का दैवीय विज्ञान...आज के आधुनिक और वैज्ञानिक दौर में जहां भू-वैज्ञानिक इस क्षेत्र के जलस्रोतों को हिमालयी ग्लेशियरों का एक जटिल अंडरग्राउंड नेटवर्क मानते हैं, वहीं स्थानीय समाज की आस्था विज्ञान से कई कदम आगे है।
सर्दियों के भीषण दिनों में जब भारी बर्फबारी के कारण केदारनाथ मंदिर के कपाट छह महीने के लिए बंद कर दिए जाते हैं और बाबा की चल-विग्रह डोली को नीचे उखीमठ के ओंकारेश्वर मंदिर में ले आया जाता है, तब भी केदारघाटी सूनी नहीं होती।
लोगों का दृढ़ विश्वास है कि शीतकाल में जब इंसान तो क्या, परिंदे भी घाटी छोड़ देते हैं, तब पूरी केदारघाटी की सीमाओं, पवित्र गर्भगृह और संपूर्ण क्षेत्र की रखवाली का जिम्मा यही लटूरी देवता संभालते हैं।
सदियों से बिना रुके, बिना सूखे इन जलधाराओं का निरंतर बहना और लटूरी देवता के मंदिर के चारों तरफ फैली एक अलौकिक, रहस्यमयी शांति आज भी आधुनिक शोधकर्ताओं के लिए एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है।
आधुनिक पर्यटन बनाम आध्यात्मिक अनुशासन... आजकल की भागदौड़ भरी, वीआईपी कल्चर और पूरी तरह कमर्शियल हो चुकी चार धाम यात्रा के दौर में केदारनाथ यात्रा का मूल स्वरूप बदलता जा रहा है।
आधुनिक गाड़ियों और हेलीकॉप्टर सेवाओं के कारण कई तीर्थयात्री मार्ग में पड़ने वाले इन अत्यंत महत्वपूर्ण पौराणिक पड़ावों को छोड़ते हुए सीधे सोनप्रयाग या गौरीकुंड पहुंच जाते हैं। इस वजह से केदारघाटी की आत्मा कहे जाने वाले ये प्राचीन पड़ाव मुख्यधारा के पर्यटन मानचित्र पर उपेक्षित होते जा रहे हैं।
केदारनाथ की यात्रा महज एक ट्रेक, हॉलिडे या एडवेंचर टूरिज्म नहीं है। यह एक परम आध्यात्मिक अनुशासन है। गुप्तकाशी के मणिकर्णिका कुंड का पवित्र आचमन और क्षेत्रपाल लटूरी देवता की चौखट पर हाजिरी इस पूरी यात्रा का प्राण हैं।
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