नगर निगम में नामांतरण के नाम पर ‘जाहिर सूचना’ का चल रहा खेल: शुल्क वसूली और मनमानी पर उठे सवाल; वैध कॉलोनियों की रजिस्ट्रियों का रिकॉर्ड एक बार तैयार करने का दिया सुझाव
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम में संपत्ति नामांतरण के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं लागू करना निश्चित रूप से स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन इसी प्रक्रिया में जाहिर सूचना के नाम पर हो रही कथित शुल्क वसूली और मनमानी ने सवाल खड़े कर दिए हैं।
पूर्व प्रवक्ता मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी एवं अधिवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी ने नगर निगम आयुक्त को पत्र भेजकर नामांतरण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सरल और वैधानिक बनाने के लिए दो महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं।
द्विवेदी ने सुझाव दिया है कि यदि किसी कॉलोनाइजर द्वारा विकसित वैध कॉलोनी में रजिस्ट्री कराई गई है तो उसके संपूर्ण दस्तावेज एक बार निगम में प्राप्त कर उनकी फाइल तैयार की जाए। इसके साथ संबंधित रजिस्ट्रियों की सूची और सहमति पत्र भी रिकॉर्ड में लिया जाए।
उन्होंने सुझाव दिया कि नामांतरण आवेदन में ही सहमति पत्र के लिए अलग कॉलम अथवा पृष्ठ जोड़ दिया जाए, ताकि बार-बार दस्तावेज जुटाने और आवेदकों को अनावश्यक प्रक्रिया से गुजरने की जरूरत न पड़े।
‘जाहिर सूचना’ के नाम पर कौन तय कर रहा अखबार?... सबसे गंभीर सवाल जाहिर सूचना को लेकर उठाया गया है। आरोप है कि वर्तमान में विभिन्न जोन कार्यालयों में जाहिर सूचना के नाम पर पक्षकारों से राशि ली जा रही है।
सवाल यह है कि किस समाचार-पत्र में जाहिर सूचना प्रकाशित होगी, यह तय करने का अधिकार आखिर किस अधिकारी या कर्मचारी के पास है? पत्र में आरोप लगाया गया है कि कुछ कर्मचारियों द्वारा पक्षकारों से नगद राशि लेकर अपनी सुविधा के अनुसार साप्ताहिक एवं अन्य समाचार-पत्रों में जाहिर सूचना प्रकाशित करवाने की कवायद की जा रही है। इससे पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।
अब पारदर्शिता की परीक्षा
नामांतरण जैसी नागरिक सुविधा में यदि दस्तावेजों का स्थायी रिकॉर्ड, सहमति की स्पष्ट व्यवस्था और जाहिर सूचना के लिए अधिकृत समाचार-पत्रों की सार्वजनिक सूची तय हो जाती है तो इससे आवेदकों की परेशानी कम होने के साथ-साथ कथित अनौपचारिक वसूली पर भी अंकुश लग सकता है। अब देखना होगा कि निगम प्रशासन इन आरोपों और सुझावों पर क्या कार्रवाई करता है।
निगम क्यों नहीं अपनाता कलेक्टर कार्यालय की पारदर्शी व्यवस्था?
द्विवेदी ने सुझाव दिया कि जिस तरह कलेक्टर कार्यालय में जाहिर सूचना तैयार कर संबंधित पक्षकार को दी जाती है, उसी तरह नगर निगम में भी स्पष्ट और निर्धारित व्यवस्था लागू की जाए। नगर निगम द्वारा अधिकृत समाचार-पत्रों की सूची सार्वजनिक की जाए और पक्षकार को स्पष्ट रूप से बताया जाए कि सूचना किन-किन समाचार-पत्रों में प्रकाशित कराई जा सकती है। इसके बाद पक्षकार अपनी आर्थिक स्थिति और सुविधा के अनुसार समाचार-पत्र का चयन कर सके।
कर्मचारी तय करेंगे या पक्षकार?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जाहिर सूचना प्रकाशित कराने का अधिकार पक्षकार का होगा या निगम के कर्मचारी और अधिकारी इसका निर्णय करेंगे? यदि प्रक्रिया निर्धारित नहीं की गई तो शुल्क वसूली और समाचार-पत्र चयन के नाम पर मनमानी की गुंजाइश बनी रहेगी।
‘कतिपय ठेकेदार’ भी सक्रिय होने का आरोप
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि इस व्यवस्था में कतिपय ठेकेदार सक्रिय बताए जा रहे हैं। ऐसे में निगम प्रशासन से मांग की गई है कि वह इस पहलू पर भी विशेष ध्यान दे और यह सुनिश्चित करे कि नामांतरण जैसी नागरिक सेवा किसी अनौपचारिक वसूली अथवा मध्यस्थ व्यवस्था का माध्यम न बने।
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