दूध और पनीर का काला सच: जब सफेदी के नाम पर बिकने लगा ज़हर
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. दीपक गोस्वामी मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
ब्रजभूमि का नाम सुनते ही मन में माखन की सुगंध, दूध की सफेदी और दही की मिठास तैरने लगती है। यह वही पावन धरती है जहां श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं हुईं, जहां दूध केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और पवित्रता का प्रतीक रहा है। सफेदी के पीछे ऐसा अंधेरा पनप रहा है जो आस्था को ही नहीं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और सामाजिक नैतिकता को भी चुनौती दे रहा है।
अनेक जनपदों में नकली दूध, मिलावटी पनीर, कृत्रिम घी, निम्न गुणवत्ता वाला खोया तथा अन्य संदिग्ध दुग्ध उत्पादों की बरामदगी की घटनाएं सामने आती रहती हैं। प्रत्येक ऐसी घटना उपभोक्ताओं के विश्वास को गहरी चोट पहुंचाती हैं और यह सोचने पर विवश करती हैं कि हमारे भोजन की थाली कितनी सुरक्षित है।
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के वर्ष 2023–24 के आंकड़ों के अनुसार उत्तर प्रदेश ने लगभग 3.89 करोड़ टन दूध का उत्पादन किया, जो भारत के कुल उत्पादन का लगभग 16 प्रतिशत है। इसी अवधि में भारत का कुल दुग्ध उत्पादन लगभग 23.93 करोड़ टन रहा और भारत विश्व का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बना रहा। इतनी विशाल उत्पादन क्षमता के बावजूद यदि मिलावट का व्यापार बढ़ रहा है तो यह सामाजिक और नैतिक संकट भी है।
दिल्ली, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व हरियाणा में प्रतिदिन लाखों लीटर दूध तथा भारी मात्रा में पनीर, घी, खोया और मिठाइयों की खपत होती है। विवाह समारोह, होटल, धर्मशालाएं, भोजनालय तथा धार्मिक आयोजन इसे बढ़ा देते हैं। जहां मांग अत्यधिक होती है वहां लोग अनुचित लाभ के लिए मिलावट का रास्ता अपनाते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर खाद्य सुरक्षा विभाग और पुलिस संदिग्ध दुग्ध उत्पाद जब्त करती है।
भारत सरकार के अनुसार फरवरी 2026 तक देश में 1,17,928 दुग्ध एवं दुग्ध उत्पाद निर्माता खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत या अनुज्ञापत्र प्राप्त थे। इसके बावजूद संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2023–24 में देशभर में 1,77,511 खाद्य नमूनों की जांच की गई, जिनमें 44,626 नमूने निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए। उत्तर प्रदेश में 30,140 नमूनों की जांच में 18,108 मामलों में अनियमितताएं पाई गईं और कार्रवाई की गई। यह आंकड़े नहीं, बल्कि उपभोक्ता सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी हैं।
आज मिलावट केवल छोटे कस्बों तक सीमित नहीं है। आकर्षक पैकेजिंग, प्रसिद्ध ब्रांड जैसी दिखने वाली पैकिंग और ऊंची कीमत देखकर भी शुद्धता की गारंटी नहीं मानी जा सकती। त्योहारों, मेलों और धार्मिक आयोजनों में पनीर, खोया, रबड़ी और पेड़े की मांग कई गुना बढ़ जाती है। अधिकांश व्यापारी ईमानदारी से व्यापार करते हैं, किंतु कुछ लोग इसी विश्वास का दुरुपयोग करते हैं।
इसी संदर्भ में आजकल एनालॉग पनीर भी चर्चा का विषय है। यह पारंपरिक डेयरी पनीर से भिन्न है, जिसे प्रायः वनस्पति वसा, स्टार्च, सोया प्रोटीन तथा अन्य स्वीकृत खाद्य अवयवों से तैयार किया जाता है। यदि इसे उसके वास्तविक नाम और उचित लेबलिंग के साथ बेचा जाए तो यह अलग श्रेणी का खाद्य उत्पाद है।
किंतु यदि इसे सामान्य डेयरी पनीर बताकर बेचा जाए या उसकी पहचान छिपाई जाए तो यह उपभोक्ता के साथ धोखा है और खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है।
दूध से बना वास्तविक पनीर प्राकृतिक प्रोटीन, कैल्शियम तथा अन्य पोषक तत्वों का स्रोत होता है। इसके विपरीत एनालॉग पनीर का पोषण मूल्य उसकी संरचना पर निर्भर करता है। निम्न गुणवत्ता वाले कच्चे माल या अनुचित निर्माण प्रक्रिया से बने उत्पादों का नियमित सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। इसलिए उपभोक्ता को उत्पाद का लेबल अवश्य पढ़ना चाहिए और उसकी वास्तविक प्रकृति समझकर ही खरीदना चाहिए।
चिकित्सा विशेषज्ञों का मत है कि निम्न गुणवत्ता वाले अथवा मिलावटी दुग्ध पदार्थों का लगातार सेवन पाचन तंत्र, यकृत और गुर्दों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यदि किसी खाद्य पदार्थ में मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त रसायन या अवैध मिलावट पाई जाए, तो दीर्घकाल में कैंसर, ह्रदय रोग, हार्मोन असंतुलन तथा अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए मिलावट आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। घर पर केवल रंग, गंध, स्वाद या झाग देखकर किसी दुग्ध उत्पाद की शुद्धता का अंतिम निर्णय नहीं किया जा सकता। आधुनिक मिलावट इतनी परिष्कृत हो चुकी है कि उसकी प्रमाणिक पहचान केवल मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में वैज्ञानिक परीक्षण द्वारा ही संभव है।
यदि किसी खाद्य पदार्थ पर संदेह हो तो उसका सेवन करने के बजाय संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारी को सूचना देना अधिक सुरक्षित और जिम्मेदार कदम है। उपभोक्ता को हमेशा पंजीकृत विक्रेता से खरीदी कर बिल लेना चाहिए। यदि कोई उत्पाद असामान्य रूप से कम कीमत पर मिल रहा हो, तो उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न करना स्वाभाविक है।
उत्तर प्रदेश में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा देने, पशुपालकों को प्रोत्साहित करने, महिला स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने और संगठित दुग्ध संग्रह प्रणाली को मजबूत करने के लिए अनेक योजनाएं चल रही हैं। इन प्रयासों की सफलता तभी संभव है जब ईमानदार उत्पादकों को उचित सम्मान और उचित मूल्य मिले तथा मिलावट करने वालों के लिए समाज में कोई स्थान न बचे।
कानून अपराधी को दंडित कर सकता है, परंतु बाजार को शुद्ध केवल जागरूक उपभोक्ता ही बना सकता है। जिस दिन समाज यह निश्चय कर लेगा कि शुद्धता से समझौता नहीं होगा, उसी दिन मिलावट का सबसे बड़ा बाज़ार स्वयं समाप्त होने लगेगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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