‘छात्रों की गूंज’ की सफलता के साथ संगठन के ‘सन्नाटे’ की पड़ताल भी जरूरी
KHULASA FIRST
संवाददाता

नितेश पाल वरिष्ठ पत्रकार, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शनिवार को छात्रों की गूंज सुनाई दी। इतनी तेज कि संख्या गिनने की कोशिश भी शायद किसी सरकारी विभाग को करना हो तो समिति बनाना पड़े। किसने कितने छात्र गिने, यह अलग विषय है, लेकिन दिखाई दिया मैदान में सिर्फ कुर्सियां नहीं, बेचैनी भी थी।
सिर्फ चेहरे नहीं, सवाल भी थे। करीब 20 दिनों में इस आयोजन को लेकर जितना कुछ हुआ, वह कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए नहीं, बल्कि असफल बनाने की कोशिश माना गया। जमीन को लेकर विवाद, प्रचार को लेकर सवाल, रजिस्ट्रेशन को लेकर आपत्तियां और तरह-तरह की चर्चा। हर दिन नया सवाल पैदा होता रहा। कुछ के जवाब दिए गए, कुछ के तथ्य सामने रखे गए और कुछ सवाल शायद सवाल पूछने वालों के पास ही रह गए।
अंतत: कार्यक्रम हुआ और छात्रों ने वह कहा, जो शायद 20 दिनों से चल रही राजनीतिक बहस में कहीं दब गया था। उन्होंने अपने सवाल रखे। भोपाल में छात्रों के निर्जला उपवास से हॉस्टल की कमी तक।
प्रतियोगी परीक्षाओं की परेशानियों से लेकर परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों तक। व्यापमं की पुरानी यादों से एमपीपीएससी की शिकायतों तक। बालाघाट सहित अलग-अलग मामलों का जिक्र हुआ। यानी छात्रों के पास सिर्फ नारे नहीं, अपनी जिंदगी से जुड़े सवाल भी थे। यही इस पूरे आयोजन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। बाकी सब राजनीति है।
कांग्रेस के नेता चाहें तो इस आयोजन की सफलता पर एक-दूसरे को बधाई दे सकते हैं। फोटो खिंचवा सकते हैं। सोशल मीडिया पर पोस्ट कर सकते हैं। यह भी बता सकते हैं इतने छात्र आए, इतनी भीड़ हुई और कार्यक्रम ऐतिहासिक रहा।
लेकिन एक सवाल इन छात्रों ने जाते-जाते कांग्रेस के लिए भी छोड़ दिया। जब छात्र इन समस्याओं से जूझ रहे है तो जमीन पर कांग्रेस कहां है? यह सवाल राहुल गांधी के इंदौर आने के बाद का नहीं, उससे बहुत पहले का है।
जब किसी छात्र को हॉस्टल नहीं मिला, तब कितने कांग्रेस नेताओं ने उसके साथ खड़े होकर आवाज उठाई? किसी परीक्षा में गड़बड़ी का आरोप लगा, तब कितने नेताओं ने छात्रों के बीच जाकर उनकी समस्या सुनी?
जब एमपीपीएससी को लेकर छात्र परेशान हुए, तब कितने नेताओं ने उनकी लड़ाई को अपनी राजनीतिक लड़ाई बनाया? जब युवा नौकरी के इंतजार में उम्र की सीमा पार करने के डर से परेशान हुआ, तब कितने नेताओं ने उसके लिए सडक़ पर संघर्ष किया?
और सबसे बड़ा सवाल, क्या कांग्रेस के स्थानीय और प्रदेश स्तर के नेताओं ने इन मुद्दों को कभी इतनी गंभीरता से उठाया कि छात्रों को लगे कि कोई उनकी लड़ाई लड़ रहा है?
छात्रों की समस्याओं पर काम करने वाले कहां?... प्रदेश कांग्रेस में पदों की कमी नहीं है। अध्यक्ष, पदाधिकारी, प्रवक्ता, प्रदेश प्रभारी हैं। अलग-अलग समितियां हैं। नेताओं की लंबी सूची है लेकिन क्या उस लंबी सूची में छात्रों की समस्याओं पर लगातार काम करने वालों की सूची भी उतनी ही लंबी है?
यह सवाल असहज है, लेकिन जरूरी है। क्योंकि कांग्रेस के सामने समस्या केवल यह नहीं है भाजपा सत्ता में है। उससे बड़ी समस्या है जिन वर्गों के बीच उसे अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी है, उनके बीच उसकी सक्रिय मौजूदगी कितनी है। छात्रों ने शनिवार को यह नहीं कहा वे कांग्रेस के साथ हैं। उन्होंने अपनी समस्याएं बताईं। इन दोनों बातों में बहुत फर्क है।
कांग्रेस ने इस अंतर को नहीं समझा तो वह हर सफल आयोजन को अपनी सफलता समझने की गलती करती रहेगी। किसी मंच पर राहुल गांधी आ जाएं, हजारों छात्र जमा हो जाएं, भाषण हों, नारे लगें और तस्वीरें वायरल हो जाएं, यह सब राजनीति का एक हिस्सा है। असली राजनीति अगले दिन शुरू होती है जब कैमरे चले जाते हैं। मंच खाली हो जाता है।
जब छात्र अपने हॉस्टल लौटता है। जब अगली परीक्षा की तारीख आती है, रिजल्ट में गड़बड़ी का आरोप लगता है, नौकरी का विज्ञापन नहीं निकलता, जब बेरोजगार युवक फिर किसी चौराहे पर खड़ा होकर सोचता है किसके पास जाए। उस समय कांग्रेस कहां होगी?
यही सवाल छात्रों की गूंज ने प्रदेश कांग्रेस के सामने रखा है। और जवाब किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं, जमीन पर देना होगा क्योंकि आने वाला समय इन्हीं छात्रों का है। आज जो छात्र भीड़ में खड़ा है, कल का मतदाता है।
आज जो बेरोजगार युवक सवाल पूछ रहा है, कल वही तय करेगा किससे सवाल पूछना है और किस पर भरोसा करना है। राजनीति में नेता अक्सर आने वाले चुनाव को देखते हैं। युवा उससे आगे देखता है अपने आने वाले जीवन को इसलिए छात्रों की गूंज की सफलता पर कांग्रेस जश्न मनाए, इसमें बुराई नहीं लेकिन जश्न के बाद एक बैठक जरूर होना चाहिए। उसमें कुर्सियां कम हों और सवाल ज्यादा।
एक कागज पर प्रदेश की छात्र और युवा समस्याएं लिखी जाएं, दूसरे पर कांग्रेस के उन नेताओं के नाम, जिन्होंने पिछले वर्षों में इन मुद्दों पर जमीन पर संघर्ष किया। फिर दोनों कागजों को सामने रखकर देखा जाए।
शायद तब कांग्रेस को पता चले शनिवार को मैदान में सिर्फ छात्रों की गूंज नहीं, कांग्रेस के लिए भी एक आईना था। अब यह कांग्रेस पर है वह आईने में चेहरा देखती है या फिर आईना ही बदल देती है। चेहरा बदलती है तो शायद ये कांग्रेस में युवाओं के लिए 2028 में नई तस्वीर बन सकता है, वरना यही युवा कांग्रेस के मप्र में खत्म होने का सबब भी बन सकता है।
भीड़ समर्थन का पैमाना नहीं
जवाब तलाशने बैठेंगे तो शायद कांग्रेस के पास कार्यक्रम की भीड़ का हिसाब तो मिल जाएगा, लेकिन उन छात्रों के बीच बिताए गए दिनों का हिसाब मुश्किल होगा। राजनीति में एक पुरानी गलती है।
नेता मान लेते हैं कि भीड़ ही समर्थन है। जबकि भीड़ और भरोसे में बहुत अंतर है। कार्यक्रम में भीड़ आ सकती है, लेकिन भरोसा समय लगाकर बनता है। छात्र किसी नेता के भाषण पर ताली बजा सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं वह अगली बार उस नेता के साथ खड़ा भी होगा।
खासकर वह छात्र, जिसने फीस, नौकरी, परीक्षा, हॉस्टल और भविष्य को लेकर वर्षों से संघर्ष किया है। जेन-जी को शायद नेताओं से भाषण कम और मौजूदगी ज्यादा चाहिए। उसे यह याद नहीं रखना किस नेता ने मंच से क्या कहा था।
याद रहेगा जब वह परीक्षा की गड़बड़ी के खिलाफ खड़ा था, तब साथ कौन खड़ा था। जब बेरोजगारी के खिलाफ आवाज उठा रहा था, तब कौन उसके साथ थाने गया था। किसी सरकारी दफ्तर के चक्कर काट रहा था, तब किस नेता ने उसका फोन उठाया था। यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को इस आयोजन की सफलता से ज्यादा अपने भीतर झांकने की जरूरत है।
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