‘छात्रों की गूंज’ को बीजेपी, नगर निगम और पुलिस-प्रशासन ने बनाया महाआयोजन
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
कल लोकसभा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का कोटा, देहरादून, प्रयागराज, पुणे के बाद इंदौर में पांचवां ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम का आयोजन रहा। यह अभी तक का सबसे सफल और बड़ा आयोजन रहा।
कांग्रेस ने भले ही पंजीयन का खुलासा नहीं किया, लेकिन मौके पर पहुंची भीड़ का वह दो लाख होने का दावा कर रही है। वहीं शासन स्तर पर बनी रिपोर्ट में यह आंकड़ा 50 से 60 हजार का है। कांग्रेस के आयोजन में यह सबसे बड़ी भीड़ है। इसके दो दिन पहले 17 सितंबर को इंदौर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के शासकीय आयोजन में भी यह भीड़ नहीं थी।
इसे महाआयोजन बनाने के पीछे सबसे बड़ी भूमिका खुद बीजेपी की रही। बीजेपी ने सेल्फ गोल कर लिया। आयोजन की मंजूरी से लेकर बयानबाजी ने लगातार छात्रों की गूंज के आयोजन को चर्चा में ला दिया। इसे राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियां दे दीं। पार्टी पदाधिकारियों के भी बयान आते रहे कि राहुल के आने से बीजेपी को फायदा होता है, सर्कस देखने सभी जाते हैं आदि।
इस मामले में आयोजन को लेकर तब चर्चा शुरू हुई जब नगर निगम ने कांग्रेस को स्टेडियम देने के मामले में फैसला लेने में देरी की। हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देकर सात दिन बाद स्टेडियम देने से इनकार किया। जबकि खुद विधायक पुत्र यहां फरवरी में आयोजन कर चुके थे।
इसके बाद कांग्रेस ने इसे भुना लिया और आक्रामक हो गई। संदेश गया कि सरकार राहुल के आयोजन को होने नहीं देना चाहती है। इसके साथ ही राहुल के आयोजन को 12 सितंबर से बढ़ाकर 19 सितंबर कर दिया गया। इससे माहौल बनाने के लिए और सात दिन मिल गए।
प्रशासन ने फैसला लेने में की देरी
कांग्रेस पदाधिकारी लगातार माहौल बनाए रहे। शहराध्यक्ष चिंटू चौकसे, जिलाध्यक्ष विपिन वानखेड़े ने प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी के साथ मैदान में मोर्चा संभाला और लगातार अधिकारियों से मिलकर आयोजन को चर्चा में रखा।
इस मामले में जिला प्रशासन को पुलिस, निगम व अन्य एजेंसी के साथ समन्वय कर मामले का जल्द निराकरण करना था, जिसमें उसने चूक कर दी। मामला निगम और आईडीए से मंजूरी का बोलकर खुद को दूर रख लिया। इसमें सक्रिय भूमिका नहीं रही कि सभी को बैठाकर मामले का जल्द निराकरण करें। नतीजतन विवाद बढ़ता गया।
क्या कभी बीजेपी, संघ से राशि मांगी?
लंबी जद्दोजहद के बाद आईडीए ने रीजनल पार्क के सामने की दो हेक्टेयर जमीन कांग्रेस को दी, लेकिन इसमें किराए का मुद्दा आया और 10 लाख मांगे। फिर शिकायतों के बाद 4 लाख और मांगे। इसे भी कांग्रेस ने भुनाया और कहा कि दस लाख तो क्या 10 करोड़ मांगते तो देते, लेकिन क्या कभी बीजेपी, आरएसएस से राशि मांगी गई है? इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
कोचिंग और हॉस्टल संचालकों से शपथ पत्र भरवाए
अब सबसे बड़ी भूमिका की बात करें तो पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आयोजन मंजूरी के पहले राजीव गांधी हत्याकांड का मामला उठाया और 31 शर्तें बता दीं। इसके पहले किसी आयोजन में यह वर्मा रिपोर्ट की बात नहीं हुई थी।
इन शर्तों की खबर ने मामले को भावनात्मक रूप से कांग्रेस की ओर मोड़ दिया और यह संदेश गया कि बीजेपी अड़ंगे अड़ा रही है और आयोजन नहीं होने देना चाहती है। पुलिस यहीं नहीं रुकी।
इसके बाद कोचिंग और हॉस्टल संचालकों से शपथ पत्र भरवाए गए कि उनके छात्र आयोजन में जाएंगे तो उनकी जिम्मेदारी होगी। इस मसले को भीड़ को रोकने की कवायद के रूप में देखा गया, ताकि अधिक भीड़ नहीं पहुंचे।
इसके पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। मौके पर सांप पकड़ने वाला और एंटीवेनम भी रखो अनमने ढंग से पुलिस ने 19 सितंबर की सुबह ही मंजूरी दी और इसमें 30 शर्तें लगाईं। इसमें काफी कठोरता रखी गई।
यहां तक लिखा गया कि मौके पर सांप पकड़ने वाला और एंटीवेनम भी रखो। इस तरह की शर्त पहली बार देखी गई। मौके पर भी लगातार पुलिस और आयोजकों के बीच व राहुल गांधी की टीम के साथ विवाद हुआ। कभी डीजे लगाने के लिए तो कभी एंट्री देने और बंद करने को लेकर।
कांग्रेस ने हर मुद्दे को भुनाया
इस मामले में कांग्रेस प्रभारी हरीश चौधरी, पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के साथ चौकसे, वानखेड़े ने हर मुद्दे को भुनाया। समय-समय पर राष्ट्रीय प्रवक्ता भी आते रहे और माहौल बनाते हुए संदेश दिया कि बीजेपी सरकार अड़ंगे अड़ा रही है।
लगातार छात्रों के मुद्दे उठाते रहे, जिससे युवाओं को संदेश गया। छात्रों के साथ छोटे-छोटे संवाद रखे और उन्हें बताया कि राहुल गांधी समस्याएं उठाएंगे। राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेताओं ने भी इसमें नेतागीरी छोड़कर पर्दे के पीछे सहयोग किया।
पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह भी दो दिन पहले आ गए और रात को भंवरकुआं पर छात्रों से मिलने भी गए। मंच पर नेताओं को कोई जगह नहीं दी गई और आयोजन को गैर-राजनीतिक बनाकर माहौल बना लिया।
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