आरोपी के पैर में पट्टा, लेकिन आंखों पर पट्टी किसकी: थाने में लूट के आरोपी को घुटने के ऊपर तक प्लास्टर; मेडिकल प्रक्रिया पर उठे सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
पुलिस के कथित ‘फर्जी प्लास्टर कांड’ का विवाद अभी पूरी तरह ठंडा भी नहीं पड़ा था कि करीब 15 दिन के भीतर फिर पुलिस कार्रवाई की तस्वीरों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बार मामला पलासिया थाने में लूट के मामले में पकड़े गए आरोपियों में से एक से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोपी के पैर पर ऐसा प्लास्टर नजर आया, जिसे देखकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर यह प्लास्टर किस चोट के लिए लगाया गया और क्या यह सामान्य मेडिकल प्रक्रिया के अनुरूप था?
मामला सिर्फ प्लास्टर तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि यदि आरोपी को चोट लगी थी तो उसका स्पष्ट मेडिकल रिकॉर्ड क्या है? चोट कितनी गंभीर थी? डॉक्टर ने किस हिस्से में प्लास्टर की सलाह दी थी और पुलिस हिरासत में आने के बाद पैर पर प्लास्टर का स्वरूप कैसे बदल गया? इन सवालों के जवाब इसलिए भी जरूरी हो जाते हैं, क्योंकि कुछ समय पहले हीरा नगर थाने से जुड़ा प्लास्टर विवाद सामने आने के बाद इंदौर पुलिस की कार्यप्रणाली पर देशभर में सवाल उठ चुके हैं।
हीरा नगर मामले के बाद भी नहीं लिया सबक?
हीरा नगर मामले में आरोपी के पैर पर प्लास्टर को लेकर सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने पुलिस की कार्रवाई को लेकर बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। मामला सोशल मीडिया पर तेजी से फैला और पुलिस की कार्यशैली चर्चा में आ गई।
इसके बाद उम्मीद थी कि पुलिस आरोपी को मेडिकल आधार के बिना प्लास्टर या अन्य चिकित्सकीय उपचार के साथ मीडिया के सामने पेश करने में सावधानी बरतेगी, लेकिन अब पलासिया थाने से सामने आई तस्वीर ने फिर वही सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या पुलिस ने पिछले विवाद से कोई सबक नहीं लिया? या फिर अपराधियों पर कार्रवाई को प्रभावी दिखाने की जल्दबाजी में मेडिकल प्रक्रिया की बारीकियों को नजरअंदाज किया जा रहा है?
घुटने के ऊपर तक प्लास्टर, सवालों के घेरे में प्रक्रिया
पलासिया थाने में पकड़े गए लूट के आरोपी को जिस तरह पैर पर प्लास्टर के साथ प्रस्तुत किया गया, उसे लेकर सबसे बड़ा सवाल प्लास्टर की स्थिति और उसकी जरूरत को लेकर है। सामान्य तौर पर प्लास्टर कहां और कितना लगाया जाएगा, यह चोट की प्रकृति, फ्रैक्चर की जगह और डॉक्टर की चिकित्सकीय सलाह पर निर्भर करता है।
ऐसे में सवाल सीधा है-क्या आरोपी के पैर में वास्तव में ऐसी चोट थी, जिसके लिए घुटने के ऊपर तक प्लास्टर जरूरी था? अगर था तो उसका मेडिकल रिकॉर्ड क्या कहता है? और यदि डॉक्टर ने ऐसा प्लास्टर नहीं बताया था, तो फिर आरोपी के पैर पर यह पट्टा किस आधार पर दिखाई दिया?
पुलिस के पास हर कार्रवाई की कहानी
आमतौर पर कार्रवाई के पीछे अपराध, आरोपी की भूमिका और गिरफ्तारी की कहानी सामने रख दी जाती है, लेकिन इस मामले में मुद्दा अपराध की गंभीरता से अलग मेडिकल प्रक्रिया और पुलिस की प्रस्तुति का है। किसी आरोपी पर गंभीर अपराध का आरोप होना उसे मेडिकल प्रक्रिया से अलग नहीं कर देता।
कानून के तहत आरोपी भी एक व्यक्ति है और उसकी चिकित्सकीय जांच निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। ऐसे में यदि किसी चोट या प्लास्टर को लेकर सवाल उठते हैं तो पुलिस को स्पष्ट करना चाहिए कि आरोपी की मेडिकल जांच कब हुई, किस डॉक्टर ने की, चोट क्या पाई गई और प्लास्टर किस चिकित्सकीय सलाह पर लगाया गया। सवाल पूछने वाले को यह कह देना कि पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद सब पता चलेगा, किसी भी विवाद का जवाब नहीं हो सकता।
क्या यह कार्रवाई है या कैमरे के सामने ‘प्रेजेंटेशन’?: पुलिस जब किसी आरोपी को गिरफ्तार करती है तो उसके अपराध और पुलिस कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है, लेकिन जब आरोपी को कैमरों के सामने पेश किया जाता है, तब उसके शरीर पर दिखाई देने वाली चोट, प्लास्टर या अन्य चिकित्सकीय स्थिति भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
यही वजह है कि पलासिया थाने के मामले में यह सवाल उठ रहा है कि क्या आरोपी को वास्तविक मेडिकल स्थिति के साथ पेश किया गया या कार्रवाई को ज्यादा प्रभावी दिखाने की कोशिश हुई? यदि चोट वास्तविक है तो उसका मेडिकल रिकॉर्ड सामने आना चाहिए। यदि प्लास्टर डॉक्टर की सलाह पर है तो पुलिस को यह बताने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि किस डॉक्टर ने किस चोट के लिए इसे लगाया। लेकिन चुप्पी संदेह को और बढ़ाती है।
अधिकारियों का डर…आज कार्रवाई की तो कल कोर्ट में जवाब देना पड़ेगा?: पुलिस विभाग के कुछ अधिकारियों की ओर से यह तर्क सामने आने की बात कही जा रही है कि यदि अभी कार्रवाई की गई और बाद में संबंधित व्यक्ति की ओर से कोर्ट में परिवाद दायर हुआ तो अधिकारियों को उसका सामना करना पड़ेगा।
यदि वास्तव में ऐसा है तो यह स्थिति और गंभीर सवाल खड़े करती है। कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसी यदि किसी कार्रवाई पर इसलिए पीछे हटती है कि भविष्य में अदालत में जवाब देना पड़ सकता है, तो फिर सवाल उठता है कि क्या कार्रवाई की निष्पक्षता से ज्यादा चिंता उसके बाद आने वाली कानूनी जवाबदेही की है? अगर पुलिस की कार्रवाई नियमों के मुताबिक है तो अदालत में उसका जवाब देना कोई डर की बात नहीं होनी चाहिए। और यदि किसी कार्रवाई में गलती है तो उसे सुधारना ही व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
डॉक्टर बोले-आरोपी, पुलिस और कोर्ट के लिए मेडिकल प्रक्रिया एक समान: मामले में सरकारी डॉक्टर से बात करने पर उन्होंने स्पष्ट किया कि मेडिकल प्रक्रिया में किसी व्यक्ति को उसकी पहचान या स्थिति के आधार पर अलग नहीं माना जाता।
आरोपी हो, पुलिसकर्मी हो या कोई अन्य व्यक्ति, चोट के परीक्षण और उपचार का आधार मेडिकल स्थिति ही होती है। हालांकि, डॉक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को अस्पताल से ले जाने के बाद पुलिस उसके प्लास्टर या पट्टी की व्यवस्था किस तरह करवाती है, इसकी उन्हें जानकारी नहीं होती।
चोट के प्रकार के अनुसार घुटने तक या उससे ऊपर तक प्लास्टर लगाया जाना चिकित्सकीय रूप से संभव हो सकता है, लेकिन यह पूरी तरह चोट की जगह और डॉक्टर की सलाह पर निर्भर करता है यानी केवल प्लास्टर देखकर यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि वह फर्जी है, लेकिन यदि प्लास्टर की स्थिति, चोट और मेडिकल रिकॉर्ड में अंतर है तो यह जांच का विषय जरूर बनता है।
पैर में फ्रैक्चर की जगह के आधार पर तय होता है उपचार:चिकित्सकीय तौर पर पैर के निचले हिस्से में फ्रैक्चर अलग-अलग जगह हो सकता है। इसमें टिबिया और फिबुला जैसी प्रमुख हड्डियां शामिल हैं। इसके अलावा पैर के पंजे या पैर की अन्य छोटी हड्डियों में भी फ्रैक्चर हो सकता है। हर फ्रैक्चर के लिए एक जैसा प्लास्टर नहीं लगाया जाता।
चोट की जगह, फ्रैक्चर की गंभीरता, हड्डी की स्थिति और मरीज की मेडिकल जांच के आधार पर डॉक्टर तय करते हैं कि किस तरह का सपोर्ट या प्लास्टर जरूरी है। कुछ मामूली चोटों में क्रेप बैंडेज या अन्य सपोर्ट से भी उपचार किया जा सकता है, जबकि गंभीर फ्रैक्चर में अलग प्रकार का प्लास्टर या सर्जिकल उपचार जरूरी हो सकता है। यही कारण है कि घुटने के ऊपर तक दिखाई देने वाले प्लास्टर पर सवाल उठना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि प्लास्टर फर्जी है।
‘नकल में भी अकल चाहिए’-अब सवालों का जवाब कौन देगा?: हीरा नगर मामले के बाद यदि वही तरह की तस्वीरें फिर सामने आती हैं तो सवाल सिर्फ एक आरोपी या एक थाने का नहीं रह जाता। सवाल पुलिस की प्रेजेंटेशन, मेडिकल प्रक्रिया और जवाबदेही का बन जाता है।
पुलिस का काम अपराधियों पर कार्रवाई करना है और जनता को अपराध से सुरक्षित रखना भी। लेकिन कार्रवाई जितनी सख्त हो, उतनी ही पारदर्शी भी होनी चाहिए। कैमरे के सामने आरोपी को पेश करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि पुलिस की कार्रवाई अदालत और मेडिकल रिकॉर्ड की कसौटी पर भी खरी उतरे।
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