हार पर सवाल शिवराज सिंह से पूछना चाहिए: 2023 में दतिया से हारे थे नरोत्तम; 2026 में कैसे मिलता टिकट
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में नरोत्तम मिश्रा की हार के संदर्भ में उस दौरान मुख्यमंत्री रहे शिवराजसिंह चौहान ने हार को अप्रत्याशित बताया था। शिवराज के नेतृत्व में यह चुनाव हुए थे और इसमें ऐसे-ऐसे भाजपा उम्मीदवार जीत गए, जिनकी जीत बेहद कठिन थी।
इनमें कई बुजुर्ग नेता भी थे। ऐसे में नरोत्तम की पराजय उनकी खुद की थी और इस बात को शिवराजसिंह चौहान से बेहतर कोई नहीं जानता होगा, क्योंकि कई सारे सर्वे और ग्राउंड रिपोर्टिंग के कर्मकांड उस समय खूब हुए थे। उस समय टिकट देने और उसके बाद चुनाव में नरोत्तम की स्थिति शिवराज अच्छे से जानते होंगे।
2023 के चुनाव के बाद अब 2026 में नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देना और फिर दतिया हार जाना, इस पूरी कहानी का वृत्तांत जानने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसी और से नहीं, बल्कि शिवराज सिंह से मंत्रणा की।
इस बांकीपुर और दतिया विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को मिली हार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराजसिंह चौहान के साथ बैठक की। सूत्रों के मुताबिक करीब 45 मिनट चली बैठक में किसानों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके अलावा मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर पार्टी की हार को लेकर भी मंथन होने की बात सामने आई है।
स्पष्ट है कि दतिया उपचुनाव में पराजय के सवालों का जवाब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से नहीं, शिवराजसिंह चौहान से लेना चाहिए। नरोत्तम की राजनीति दतिया में मसल पावर, मनी पावर गेम सरकार में उनके साथ गृहमंत्री रहते हुए जो कुछ हुआ होगा और किया गया होगा, इस सब की पांडुलिपियां भी बनाई होंगी और कहा जाता था कि कच्चा चिट्ठा दिल्ली तक गया था।
यह बात भी सुनने में आती थी कि गृहमंत्री और मुख्यमंत्री के बीच पावर पॉलिटिक्स चलती रहती थी। यह 2023 की बात है। तब से लेकर इस समय 2026 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं, लेकिन उनसे वरिष्ठ नरोत्तम मुख्यमंत्री के दावेदार होने के बावजूद विधानसभा चुनाव का टिकट भी नहीं पा सके।
टिकट नहीं मिलने की अलग-अलग चर्चाएं या अनुमान है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक के समीकरण टिकट से जोड़े जा रहे हैं। ग्राउंड सर्वे रिपोर्ट का भी हवाला दिया जा रहा है। एक बार हार चुके नरोत्तम पर फिर से दांव लगाने की रिस्क संगठन और सरकार नहीं लेना चाहते थे।
2023 में नरोत्तम ने प्रदेश सरकार में अपने आप को पावरफुल मिनिस्टर बना लिया था। उनकी कार्यशैली के लंबे-चौड़े किस्से शहर से लेकर गांव तक सुनाई पड़ते थे। जैसा काम वैसा दाम की जगह बहुत ऊंचा दाम जैसे किस्से प्रचलित थे।
एक चर्चित किस्सा हथियार लाइसेंस का था, जिसका दाम 3 से 5 लाख वाला भी था। जो भी हो, उनके चुनाव में हार के बाद घटनाक्रम को लेकर राजनीतिक गलियारों और मीडिया में जो तथ्य सामने आए, उनके मुताबिक नरोत्तम की पराजय में व्यक्तिगत और स्थानीय कारक अधिक प्रभावी थे।
नरोत्तम मिश्रा की हार मुख्य रूप से उनके अपने विधानसभा क्षेत्र दतिया में स्थानीय एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर), कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती की मजबूत रणनीति और जमीनी स्तर पर जनता की नाराजगी का परिणाम थी।
चुनाव के दौरान कड़े मुकाबले में वे कांग्रेस के राजेंद्र भारती से पराजित हुए थे। भाजपा का भितरघात भी इसके लिए एक कारण बताया गया था। इसके लिए बड़े नेताओं को भी जिम्मेदार बताया गया था।
पार्टी के भीतर का समीकरण और बदलाव की राजनीति ने उस समय चुनाव पर प्रभाव डाला। 2023 के चुनाव के समय और उसके बाद मध्य प्रदेश भाजपा में नेतृत्व और संगठन के स्तर पर नए समीकरणों और बदलावों की चर्चा जरूर रही थी।
सत्ता की छटपटाहट
2023 के चुनाव में हार के बाद जब दतिया सीट पर आगे की राजनीतिक परिस्थितियां बदलीं, तो पार्टी ने नए चेहरों को अवसर देने की रणनीति अपनाई। विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी का यह केंद्रीय या प्रांतीय नेतृत्व का निर्णय था कि संगठन को किसी एक व्यक्ति के प्रभाव से मुक्त किया जाए। यानी संगठन से ऊपर किसी नेता का अपना राजनीतिक साम्राज्य संगठन के लिए नुकसानदायक है।
नए चेहरों को आगे बढ़ाया जाए, इस फार्मूले को अपनाते हुए पार्टी ने दतिया से नरोत्तम को टिकट नहीं दिया होगा, जिसे कुछ हलकों में शीर्ष नेतृत्व के रणनीतिक बदलाव के रूप में देखा गया। 2023 में नरोत्तम की हार का मुख्य कारण दतिया का स्थानीय राजनीतिक समीकरण, कांग्रेस की प्रभावी चुनौती और जनता का आक्रोश था।
किसी एक नेता (जैसे शिवराजसिंह चौहान) के तौर पर नहीं देखा गया। ऐसे में इस समय मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से जवाब मांगना या उन्हें जिम्मेदार ठहराने की कोशिश के मायने भाजपा की अंदरूनी राजनीति में छिपे हैं।
जब पार्टी ने मिश्रा को टिकट नहीं दिया और पहली बार उम्मीदवार बने तिवारी को मैदान में उतारा, तो यह माना गया कि 2023 के विधानसभा चुनाव ने पहले ही यह बता दिया था कि दतिया में पूर्व गृहमंत्री का राजनीतिक दबदबा अब जीत की गारंटी के लिए काफी नहीं था।
इस समय उपचुनाव मुख्यमंत्री के लिए ही नहीं, संगठन के लिए और बाकी आसपास के सभी बड़े नेताओं, जिनमें नरेंद्रसिंह तोमर, ज्योतिरादित्य सिंधिया, उमा भारती जैसे नाम शामिल हैं, सब की सामूहिक जिम्मेदारी थी।
शिवराजसिंह चौहान भी चुनाव प्रचार में थे। चुनाव की शुरुआत से ही भितरघात बलवती हो गया था। कांग्रेस ने इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते हुए स्वच्छ व ईमानदार छवि के प्रत्याशी घनश्याम सिंह को उतारा।
राजपूत समाज को साथ में लेने की रणनीति कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में तैयार हुई। घनश्याम सिंह चौकी दतिया राजघराने से आते हैं, इसलिए स्वाभाविक है राजपूत वोट उनके साथ ताकत से आए।
आजाद भारत काशीराम पार्टी बताया जाता है कि नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव में हर चुनाव में जरूरत के अनुसार आती-जाती है और वोट बटोर ले जाती है। जो भी हो, दतिया उपचुनाव में भाजपा की पराजय पर सटीक जवाब और जानकारी शिवराजसिंह चौहान से बेहतर कोई नहीं दे सकता।
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