दवाओं के मनमाने दाम पर सवाल: मरीज इलाज कराए या जेब बचाए
KHULASA FIRST
संवाददाता

दवा की कीमतों पर लगाम जरूरी: मरीजों को सस्ती दवा का विकल्प मिले, अस्पतालों में भी बढ़े पारदर्शिता
इलाज के साथ महंगी दवाओं का बोझ: ब्रांड के नाम पर कीमतों का अंतर, आम आदमी के सामने कई सवाल
मरीज की सेहत या मुनाफे का गणित? दवा की कीमत, डॉक्टर की पर्ची और अस्पतालों की व्यवस्था पर बहस
कैंसर की दवाओं के दाम घटे, अब दूसरे सवालों पर भी ध्यान जरूरी: मरीजों को राहत दिलाने के लिए जवाबदेही बढ़े
हेमंत उपाध्याय 99930-99008, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
बीमारी जब गंभीर होती है, तब मरीज और उसके परिवार की सबसे बड़ी चिंता इलाज की होती है, लेकिन इलाज के साथ जब दवाओं का खर्च लगातार बढ़ता है, तो परिवार के सामने एक और मुश्किल खड़ी हो जाती है।
सवाल उठता है कि दवा खरीदने के लिए पैसा कहां से आएगा और क्या उसी दवा का कोई कम कीमत वाला विकल्प भी उपलब्ध है? कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में यह परेशानी और बड़ी हो जाती है। मरीज को कई बार लंबे समय तक दवाएं लेनी पड़ती हैं। ऐसे में दवाओं की कीमत में थोड़ा-सा अंतर भी पूरे इलाज के खर्च पर बड़ा असर डाल सकता है।
हाल ही में कैंसर की कई दवाओं के दाम घटाए जाने की खबर ने इस विषय को फिर चर्चा में ला दिया है। कुछ दवाओं की कीमतों में बड़ी कटौती से मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन इसके साथ ही एक बुनियादी सवाल भी खड़ा होता है कि जब किसी दवा की कीमत कम की जा सकती है, तो मरीजों को पहले इतनी अधिक कीमत क्यों चुकानी पड़ रही थी?
यह सवाल केवल कैंसर की दवाओं तक सीमित नहीं है। आम आदमी रोजमर्रा के इलाज में भी ब्रांडेड दवाओं, जेनेरिक दवाओं और मेडिकल स्टोर पर मिलने वाले अलग-अलग विकल्पों के बीच उलझा रहता है।
आम आदमी के लिए दवा खरीदते समय सबसे बड़ी परेशानी यह समझना है कि एक ही बीमारी के लिए लिखी गई दवाओं की कीमतों में इतना अंतर क्यों होता है। किसी दवा को एक कंपनी अपने ब्रांड नाम से बेचती है, जबकि दूसरी कंपनी उसी सक्रिय औषधीय तत्व वाली दवा दूसरे नाम से बाजार में उतार सकती है।
दोनों की कीमत अलग हो सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि महंगी दवा हमेशा बेहतर होती है या सस्ती दवा हमेशा खराब होती है।
दवा की गुणवत्ता, उसमें मौजूद सक्रिय तत्व, उसकी मात्रा, निर्माण के मानक और मरीज की जरूरत महत्वपूर्ण हैं। इसलिए केवल कम कीमत देखकर दवा चुनना उचित नहीं है, लेकिन मरीज को यह जानकारी जरूर मिलनी चाहिए कि उसके लिए लिखी गई दवा का कोई सुरक्षित और कम कीमत वाला विकल्प उपलब्ध है या नहीं।
यहीं डॉक्टर की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। डॉक्टर मरीज को दवा के नाम, उसकी जरूरत और उपलब्ध विकल्पों के बारे में समझा सकता है। मरीज को भी यह पूछने का अधिकार होना चाहिए कि जिस दवा को खरीदने की सलाह दी जा रही है, उसका कोई उपयुक्त सस्ता विकल्प क्यों नहीं अपनाया जा सकता।
अस्पताल में भर्ती होते ही मरीज के विकल्प क्यों सीमित हो जाते हैं?
अस्पताल में भर्ती मरीज सामान्य ग्राहक की तरह बाजार में जाकर दवाओं की कीमतों की तुलना नहीं कर सकता। उसकी स्थिति ऐसी होती है कि उसे डॉक्टर और अस्पताल की व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है।
कई बार मरीज के परिजनों को अस्पताल के मेडिकल स्टोर से ही दवा खरीदने के लिए कहा जाता है। ऐसे में उनके सामने यह सवाल होता है कि क्या बाहर से वही दवा खरीदी जा सकती है, क्या किसी दूसरे ब्रांड का विकल्प स्वीकार होगा और क्या कम कीमत पर दवा मिलने की संभावना है।
अस्पताल की फार्मेसी से दवा खरीदने के पीछे उपलब्धता, भंडारण, गुणवत्ता और उपचार की निगरानी जैसी व्यावहारिक वजहें हो सकती हैं। विशेष दवाओं के मामले में अस्पताल की व्यवस्था का पालन करना जरूरी भी हो सकता है, लेकिन यदि मरीज को बिना स्पष्ट कारण बताए बाहर से दवा खरीदने का विकल्प नहीं दिया जाता, तो पारदर्शिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मरीज के परिजन जब पहले ही बीमारी और अस्पताल के खर्च से परेशान होते हैं, तब उनके पास हर दवा की कीमत जांचने का समय और जानकारी नहीं होती। ऐसे में यदि उन्हें केवल एक ही जगह से दवा खरीदनी पड़े, तो कीमत की तुलना करने का अवसर सीमित हो जाता है।
अस्पतालों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीज को दवा की कीमत, उसके उपयोग और उपलब्ध विकल्पों के बारे में स्पष्ट जानकारी मिले। जहां किसी विशेष दवा का इस्तेमाल जरूरी हो, वहां उसका चिकित्सकीय कारण भी समझाया जाना चाहिए।
डॉक्टर की पर्ची पर कौन-सी दवा लिखी जा रही है, यह भी महत्वपूर्ण सवाल
डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा पर मरीज आमतौर पर सवाल नहीं उठाता। वह मानकर चलता है कि जो दवा लिखी गई है, वही उसके लिए सबसे उपयुक्त होगी। दवा के चयन में मरीज की जरूरत के साथ उसकी आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
यदि समान रूप से उपयुक्त और सुरक्षित विकल्प कम कीमत पर उपलब्ध है, तो मरीज को उसके बारे में जानकारी मिलनी चाहिए। इससे मरीज और डॉक्टर के बीच भरोसा बढ़ेगा तथा उपचार का खर्च कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, यह मान लेना भी गलत होगा कि सभी डॉक्टर किसी कंपनी के लाभ के लिए महंगी दवा लिखते हैं।
कई बार किसी विशेष दवा को चुनने के पीछे मरीज की बीमारी, पहले से चल रहा उपचार, दवा का असर या दूसरी चिकित्सकीय जरूरतें होती हैं। फिर भी, यदि दवा कंपनियों और डॉक्टरों के बीच आर्थिक संबंध दवा के चयन को प्रभावित करते हैं, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।
दवा लिखने का आधार मरीज का स्वास्थ्य होना चाहिए, न कि किसी कंपनी या मेडिकल स्टोर का व्यावसायिक हित। इसलिए जरूरी है कि दवा लिखते समय डॉक्टर मरीज को उसके विकल्पों के बारे में समझाएं और जहां संभव हो, उचित कीमत वाली दवा चुनने में मदद करें।
कैंसर की दवाओं के दाम घटने से क्या बदलेगा?
कैंसर की कुछ दवाओं की कीमतों में कटौती मरीजों के लिए राहत का महत्वपूर्ण अवसर है। जिन मरीजों को संबंधित दवाएं लेनी पड़ती हैं, उनके उपचार का खर्च कम हो सकता है। इस राहत को पूरे दवा बाजार की समस्या का समाधान नहीं माना जा सकता। सभी दवाओं की कीमतें एक जैसी नहीं हैं और हर दवा पर समान नियम लागू नहीं होते।
कुछ दवाओं की कीमतों में बदलाव हो सकता है, जबकि कुछ की कीमतें पहले जैसी रह सकती हैं। इसके अलावा, केवल दवा का दाम घटने से इलाज का पूरा खर्च कम नहीं हो जाता। अस्पताल में भर्ती, जांच, दूसरी दवाएं और उपचार की अवधि भी परिवार पर आर्थिक बोझ डालती हैं।
इसलिए सरकार के फैसले का वास्तविक लाभ तभी दिखाई देगा, जब नई कीमतों का पालन हो, मरीजों को सही जानकारी मिले और दवा खरीदते समय उन्हें उचित विकल्प उपलब्ध हों।
सरकार और अस्पतालों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
दवाओं की कीमतों को लेकर व्यवस्था में सुधार के लिए कुछ बुनियादी कदम जरूरी हैं।
पहला, मरीज को दवा की कीमत स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए। मेडिकल स्टोर पर बिल देना और दवा के पैक पर लिखी अधिकतम खुदरा कीमत का पालन करना जरूरी है।
दूसरा, डॉक्टर को जहां चिकित्सकीय रूप से उचित हो, वहां कम कीमत वाले विकल्पों के बारे में मरीज को जानकारी देनी चाहिए। तीसरा, अस्पतालों को अपनी फार्मेसी की व्यवस्था में पारदर्शिता रखनी चाहिए।
मरीज को यह समझने का अवसर मिलना चाहिए कि कोई विशेष दवा उसी अस्पताल से लेना क्यों जरूरी बताया जा रहा है। चौथा, दवा की कीमतों पर निगरानी और शिकायतों के समाधान की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए। यदि किसी दवा को निर्धारित कीमत से अधिक पर बेचा जा रहा है, तो मरीज को शिकायत करने में अनावश्यक परेशानी नहीं होनी चाहिए।
पांचवां, दवा कंपनियों, डॉक्टरों और अस्पतालों के बीच ऐसे व्यावसायिक संबंधों की निगरानी होनी चाहिए जो मरीज के हितों को प्रभावित कर सकते हैं। मरीज अपनी जेब पर पड़ने वाला बोझ कैसे कम कर सकता है? आम आदमी कुछ सावधानियां अपनाकर दवाओं पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करने की कोशिश कर सकता है।
डॉक्टर से दवा का नाम, सक्रिय तत्व और उसकी मात्रा स्पष्ट रूप से पूछें। दवा खरीदते समय पैक पर लिखी कीमत देखें और बिल जरूर लें। महंगी दवा के मामले में डॉक्टर से पूछें कि क्या कोई कम कीमत वाला उपयुक्त विकल्प उपलब्ध है।
अस्पताल में भर्ती होने पर पूछें कि क्या निर्धारित दवा बाहर से खरीदी जा सकती है और उसके लिए क्या प्रक्रिया है। डॉक्टर की सलाह के बिना दवा का ब्रांड न बदलें और न ही इलाज बीच में छोड़ें। यदि निर्धारित कीमत से अधिक पैसे लिए जाने की आशंका हो, तो दवा का पैक और बिल सुरक्षित रखें तथा संबंधित प्राधिकरण से शिकायत करें।
यह भी जरूरी है कि सस्ती दवा के नाम पर गुणवत्ता से समझौता न हो और हर महंगी दवा को गलत न माना जाए। मरीज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसे प्रभावी और सुरक्षित उपचार मिले, उसकी कीमत स्पष्ट हो और उपलब्ध विकल्पों के बारे में सही जानकारी दी जाए।
कैंसर की दवाओं की कीमतों में कटौती से कुछ मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है, लेकिन लंबे समय तक आम आदमी को राहत देने के लिए दवा की कीमतों पर प्रभावी निगरानी, अस्पतालों में पारदर्शिता और डॉक्टरों की जवाबदेही भी जरूरी है।
बीमारी से लड़ रहे मरीज को अपनी ऊर्जा इलाज और स्वस्थ होने पर लगानी चाहिए, न कि इस चिंता में कि उसे जरूरी दवा उचित कीमत पर मिल भी पाएगी या नहीं। दवा की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिसमें मरीज का हित सबसे ऊपर रहे और आर्थिक मजबूरी उसके उपचार में बाधा न बने।
दवाओं का खर्च परिवार को किस तरह प्रभावित करता है?
दवा की अधिक कीमत का असर केवल मरीज तक सीमित नहीं रहता। पूरा परिवार इससे प्रभावित हो सकता है। किसी परिवार में यदि एक सदस्य लंबे समय से बीमार है, तो इलाज के साथ घर का खर्च चलाना भी चुनौती बन जाता है। नियमित दवाओं, जांच, अस्पताल आने-जाने और डॉक्टर की फीस पर पैसा खर्च होता है।
यदि दवाएं भी महंगी हों, तो परिवार को दूसरी जरूरतों में कटौती करनी पड़ सकती है। कुछ परिवार अपनी बचत का इस्तेमाल करते हैं, तो कुछ को उधार लेना पड़ता है। गंभीर बीमारी के मामले में आर्थिक दबाव इतना बढ़ सकता है कि मरीज के सामने उपचार जारी रखने और दूसरे जरूरी खर्चों के बीच चुनाव करने की नौबत आ जाए।
यह स्थिति किसी भी परिवार के लिए कठिन है। इलाज का उद्देश्य मरीज को स्वस्थ करना है। यदि दवाओं की कीमत के कारण मरीज समय पर दवा नहीं खरीद पाता या उपचार में बाधा आती है, तो समस्या केवल आर्थिक नहीं रह जाती, बल्कि स्वास्थ्य से भी जुड़ जाती है। इसीलिए दवाओं की उचित कीमत सुनिश्चित करना आम आदमी के हित का महत्वपूर्ण मुद्दा है।
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