12 साल तक एक साल के ठेके पर चलता रहा सिक्योरिटी गार्डों की सप्लाई का खेल: 2014 में प्राणी संग्रहालय की सुरक्षा के लिए दिया था ठेका
KHULASA FIRST
संवाददाता

पूरे नगर निगम में होती रही कर्मचारियों की नियुक्ति, 2016 से 2026 तक छह करोड़ से अधिक का भुगतान
चिंटू चौकसे ने दस्तावेजों के साथ उठाए सवाल, 180 दिन की निविदा वैधता के बावजूद जारी रहा अनुबंध; लोकायुक्त में शिकायत की तैयारी
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम में अब सिक्योरिटी गार्डों की नियुक्ति का मामला विवादों में आ गया है। शहर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे ने दस्तावेजों के आधार पर आरोप लगाया है कि वर्ष 2014 में प्राणी संग्रहालय की सुरक्षा के लिए एक साल के लिए दिया गया ठेका 12 साल तक पूरे नगर निगम में इस्तेमाल होता रहा।
जिस एजेंसी को सीमित कार्य और अवधि के लिए ठेका दिया गया था, उसी के माध्यम से निगम के विभिन्न विभागों, जोनल कार्यालयों और आयोजनों के लिए सुरक्षा गार्ड, गनमैन और सुपरवाइजर उपलब्ध कराए जाते रहे।
चौकसे के मुताबिक वर्ष 2016 से 2026 के बीच एजेंसी को 6 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया, जबकि मूल स्वीकृत कार्य का भुगतान महज 28.35 लाख रुपए बनता था।
पत्रकारों से चर्चा में चौकसे ने बताया कि वर्ष 2014 में नगर निगम ने सुरक्षा गार्ड, गनमैन और सुपरवाइजर उपलब्ध कराने के लिए आशापुरी सिक्योरिटी सर्विस, शेखर रेसीडेंसी, स्कीम नंबर 54, विजय नगर को ठेका दिया था।
महापौर परिषद के संकल्प क्रमांक 274, दिनांक 13 अगस्त 2014 के तहत सुरक्षा गार्ड के लिए 5270 रुपए और गनमैन व सुपरवाइजर के लिए 5550 रुपए प्रतिमाह की दर स्वीकृत की गई थी।
चौकसे के अनुसार 2014 के फैसले के आधार पर एजेंसी के साथ अनुबंध 25 अगस्त 2016 को किया गया। इसमें स्पष्ट रूप से प्राणी संग्रहालय के लिए कम से कम 30 सुरक्षा गार्ड, चार गनमैन और दो सुपरवाइजर उपलब्ध कराने का प्रावधान था।
रात की प्रत्येक शिफ्ट में दो गनमैन रखने, उनके हथियार, कारतूस और लाइसेंस की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी भी एजेंसी की थी।
प्राणी संग्रहालय का ठेका, पूरे निगम में सप्लाई... चौकसे ने सवाल उठाया कि प्राणी संग्रहालय के लिए किए गए अनुबंध को निगम के अन्य विभागों और जोनल कार्यालयों में कर्मचारियों की आपूर्ति का आधार कैसे बना लिया गया?
वर्ष 2016 में जिंसी स्थित नगर निगम की नई वर्कशॉप की सुरक्षा के लिए तत्कालीन आयुक्त ने इसी एजेंसी से कर्मचारी लेने की स्वीकृति दी थी। इसके बाद इसी स्वीकृति के आधार पर 2026 तक एजेंसी से मैनपावर लिया जाता रहा और भुगतान भी किया जाता रहा।
उन्होंने अनुबंध की शर्त क्रमांक 39 का हवाला देते हुए कहा कि निविदा की वैधता 180 दिन निर्धारित थी। इसके बावजूद इतनी सीमित अवधि की निविदा के आधार पर वर्षों तक काम लिया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।
छह करोड़ भुगतान, नए टेंडर की नोटशीट भी बेअसर... चौकसे के मुताबिक वर्ष 2016 से 2026 तक एजेंसी को 6 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान किया गया। जबकि मूल स्वीकृत कार्य और निर्धारित अवधि के हिसाब से भुगतान 28.35 लाख रुपए होना था।
इस दौरान एजेंसी से निगम के विभिन्न विभागों के अलावा आयोजनों और कार्यक्रमों के लिए भी मैनपावर लिया जाता रहा। एजेंसी के संचालक देवेंद्र सिंह चौहान बताए गए हैं। उन्होंने बताया कि इस पूरे मामले में एक बार तत्कालीन अपर आयुक्त मनोज कुमार पाठक ने नए सिरे से टेंडर जारी कर एजेंसी नियुक्त करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए नोटशीट लिखी थी, लेकिन उस पर भी अमल नहीं हुआ।
कई अधिकारियों की भूमिका पर उठाए सवाल... चौकसे ने तत्कालीन अपर आयुक्तों रोहन सक्सेना, वीरभद्र शर्मा, संदीप सोनी, रजनीश कसेरा, एस. कृष्ण चैतन्य, ऋषभ गुप्ता, मनोज कुमार चौरसिया, देवघर दरवई और रोहित सिसोनिया सहित अन्य अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए।
उन्होंने प्राणी संग्रहालय प्रभारी डॉ. उत्तम यादव के साथ लोकेंद्र सिंह सोलंकी, राम गुप्ता, हिमांशु सिंह, सुमित अस्थाना, मनीष पांडे, प्रकाश नागर, लता अग्रवाल, भूपेंद्र सिंह सिसोदिया, आशुतोष यादव और कमलेश त्रिवेदी का भी उल्लेख किया।
चौकसे का आरोप है कि इतने वर्षों तक नए सिरे से निविदा प्रक्रिया नहीं अपनाई गई और एक ही एजेंसी को लगातार काम मिलता रहा। कांग्रेस अब इस पूरे मामले की शिकायत लोकायुक्त पुलिस से करेगी। साथ ही संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की जाएगी।
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