निजी टाउनशिप आबाद: आरटीआई में भी नहीं मिली जानकारी; अब सरकारी रिकॉर्ड पर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

चरनोई जमीन पर टाउनशिप का मामला
कागज चुप, बाबू खुश! सरकारी जमीन पर
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
महू तहसील में शासकीय चरनोई जमीन को निजी नाम पर दर्ज कर वहां टाउनशिप विकसित किए जाने के आरोपों के बीच अब सरकारी रिकॉर्ड की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। ग्राम कवटी की ऑरिका ग्रीन्स टाउनशिप से जुड़े विवाद में सूचना का अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी नहीं मिलने का खुलासा हुआ है।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने ग्राम कवटी के खसरा नंबर 111-112 और ग्राम बरदिया के खसरा नंबर 74-75 की वर्ष 1925 से 2026 तक की राजस्व प्रविष्टियों, नामांतरण आदेशों, कथित मद परिवर्तन और कॉलोनी विकास की अनुमतियों की प्रमाणित प्रतियां मांगी हैं।
मामला इसलिए गंभीर है, क्योंकि कवटी की जमीन को लेकर पहले के राजस्व आदेशों में भी पुराने मिसल बंदोबस्त में शासकीय चरनोई दर्ज होने का उल्लेख का खुलासा हो चुका है। वहीं बाद के आदेशों में कुछ जमीन के निजी स्वामित्व और नामांतरण के पक्ष में राजस्व रिकॉर्ड का हवाला दिया गया।
अब सवाल यह है कि चरनोई से निजी भूमि तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया क्या थी, किस अधिकारी ने किस दस्तावेज के आधार पर निर्णय लिया और टाउनशिप में शामिल जमीन के लिए विकास संबंधी अनुमतियां किस आधार पर जारी हुईं?
1925 से 2026 तक के रिकॉर्ड से सामने आएगी वास्तविकता
सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में ग्राम कवटी के खसरा नंबर 111 और 112 तथा ग्राम बरदिया के खसरा नंबर 74 और 75 के पुराने और वर्तमान राजस्व अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां शामिल हैं। इनमें मिसल बंदोबस्त, खसरा, बी-1, फील्ड बुक और नक्शे मांगे गए हैं।
मांग का उद्देश्य यह पता लगाना है कि संबंधित जमीन अलग-अलग कालखंडों में किस मद में दर्ज रहीं और यदि किसी समय शासकीय चरनोई से निजी मद में दर्ज की गईं, तो उस बदलाव के पीछे कौन-सा आदेश और कानूनी आधार था।
यह जानकारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि पुराने बंदोबस्त में दर्ज स्थिति और बाद की राजस्व प्रविष्टियों के बीच अंतर होने पर उसके दस्तावेजी आधार की जांच जरूरी होती है। केवल वर्तमान रिकॉर्ड या किसी एक पुराने दस्तावेज के आधार पर पूरे स्वामित्व विवाद का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
पटवारी रिपोर्ट से लेकर अंतिम आदेश तक की फाइल मांगी
आवेदन में हल्का पटवारी और राजस्व निरीक्षक की उन सभी जांच रिपोर्टों तथा पंचनामों की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई हैं, जिनमें संबंधित जमीन को शासकीय या चरनोई मद में दर्ज बताया गया हो।
इसके अलावा यदि जमीन का मद परिवर्तन या व्यपवर्तन किया गया है, तो संबंधित राजस्व प्रकरण की शुरुआत से अंतिम आदेश तक की पूरी आदेश पत्रिका और सक्षम प्राधिकारी के आदेश की प्रतियां मांगी गई हैं।
कवटी के खसरा 111-112 और बरदिया के 74-75 की प्रमाणित प्रतियां मांगीं, विनायक एंटरप्राइजेस के नामांतरण, जमीन के मद परिवर्तन और कॉलोनी की मंजूरी का हिसाब मांग रहे शिकायतकर्ता
विनायक एंटरप्राइजेस के नामांतरण का पूरा लेखा-जोखा भी
ग्राम कवटी की जमीन से संबंधित पूर्व राजस्व आदेशों में श्री विनायक एंटरप्राइजेस का नाम सामने आया है। फरवरी 2026 में पारित अपीलीय आदेश में सर्वे नंबर 111/2/3/2, रकबा 0.218 हेक्टेयर और 111/3/3/2, रकबा 0.210 हेक्टेयर के नामांतरण से संबंधित तहसीलदार का आदेश निरस्त कर अपील स्वीकार की गई थी। आदेश में बाद के राजस्व रिकॉर्ड में निजी नाम दर्ज होने के आधार पर नामांतरण के पक्ष में निष्कर्ष दिया गया।
वहीं वर्ष 2023 के एक अन्य तहसीलीय आदेश में सर्वे नंबर 111 और 112 के संबंध में 1925-26 के मिसल बंदोबस्त में शासकीय चरनोई भूमि दर्ज होने तथा निजी मद में विधिवत दर्ज किए जाने के प्रमाण प्रस्तुत नहीं होने का उल्लेख था।
इन अलग-अलग आदेशों के संदर्भ में अब नामांतरण प्रकरण की पूरी फाइल, पटवारी प्रतिवेदन, आदेश पत्रिका, विक्रय संबंधी दस्तावेज और अंतिम आदेश की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई हैं। इनसे यह जांचने में मदद मिलेगी कि संबंधित सर्वे नंबरों की प्रविष्टियों में बदलाव किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ और अलग-अलग आदेशों में दर्ज तथ्यों का आपस में क्या संबंध है।
जमीन निजी संस्था को किस आधार पर दी
आवेदन में शासन, राजस्व विभाग या अन्य सक्षम प्राधिकारी की उस विशेष अनुमति अथवा स्वीकृति की प्रमाणित प्रति भी मांगी गई है, जिसके आधार पर कथित रूप से शासकीय चरनोई भूमि का निजी संस्था को हस्तांतरण, आवंटन या उपयोग परिवर्तन किया गया हो।
साथ ही यह भी पूछा गया है कि संबंधित जमीन पर विनायक एंटरप्राइजेस या किसी अन्य पक्ष को टाउन एंड कंट्री प्लानिंग अथवा संबंधित कार्यालय से कॉलोनी विकास की अनुमति, कॉलोनाइजर लाइसेंस या एनओसी जारी की गई है या नहीं। यदि अनुमति दी गई है, तो स्वीकृत ले-आउट प्लान और अनुमति-पत्र की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने की मांग की गई है।
इससे टाउनशिप की स्वीकृत सीमा और विवादित खसरों की वास्तविक स्थिति का मिलान किया जा सकेगा। हालांकि अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि ऐसी अनुमति जारी नहीं हुई या कोई दस्तावेज फर्जी है। यह स्थिति संबंधित विभागों के रिकॉर्ड सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला... शिकायतकर्ता ने जगपाल सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले तथा मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों का हवाला देते हुए सार्वजनिक चरागाह भूमि के संरक्षण का मुद्दा उठाया है।
मांग है कि यदि संबंधित जमीन शासकीय चरनोई पाई जाती है और उसके हस्तांतरण या उपयोग परिवर्तन में नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो जिम्मेदारों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में गांवों की सामुदायिक भूमि और चरागाहों को अतिक्रमण से मुक्त कराने के सिद्धांत पर जोर दिया गया है।
हालांकि कवटी और बरदिया की संबंधित जमीन पर उस फैसले का कानूनी प्रभाव निर्धारित करने के लिए जमीन की वास्तविक स्थिति, राजस्व रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच आवश्यक होगी।
अब प्रशासन के जवाब पर टिकी नजर... इस पूरे मामले में अब तीन अहम पहलुओं का स्पष्ट होना जरूरी है- पहला, संबंधित खसरों का मूल और वर्तमान राजस्व दर्जा। दूसरा, निजी नामांतरण या मद परिवर्तन का वैधानिक आधार और तीसरा, टाउनशिप विकास की अनुमतियां तथा स्वीकृत नक्शे।
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