शिक्षकों से कराए जा रहे गैर शैक्षणिक कार्य: कैसे सुधरेगी शिक्षा की गुणवत्ता
एसआईआर, परीक्षा, मूल्यांकन के बाद मकानों की गणना करेंगे शिक्षक खुलासा फर्स्ट, इंदौर । शिक्षकों को परीक्षा, मूल्यांकन के साथ ही एसआईआर, मकानों की गणना और जनगणना की जिम्मेदारी तक सौंप दी गई है। इस तरह...
Khulasa First
संवाददाता

एसआईआर, परीक्षा, मूल्यांकन के बाद मकानों की गणना करेंगे शिक्षक
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शिक्षकों को परीक्षा, मूल्यांकन के साथ ही एसआईआर, मकानों की गणना और जनगणना की जिम्मेदारी तक सौंप दी गई है। इस तरह शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य कराए जा रहे हैं। ऐसे में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के अभियान की हवा निकल गई है।
शहर सहित समूचे प्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता खराब होती जा रही है।
इसके चलते शासन लगातार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने का अभियान चलाकर उसे बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन सरकारी स्कूल के शिक्षकों को कक्षा में पढ़ाने का समय ही नहीं मिलता है, जिससे पढ़ाई कराना उनके लिए मुश्किल हो गया है।
मौजूदा में हालात ऐसे हैं कि अब तक शिक्षकों से एसआईआर का कार्य कराया गया। अब भी मतदान केंद्रों पर उन्हें तैनात रहकर सुधार कार्य करने के निर्देश मिले हुए हैं। इसके बाद फरवरी माह में हाई स्कूल और हायर सेकंडरी की बोर्ड परीक्षाओ का आयोजन होगा।
उसमें शिक्षकों को पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी संभालनी है। परीक्षाएं पूरी होते-होते लोकल परीक्षाएं भी शुरु हो जाएगी इस तरह शिक्षकों को बोर्ड परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन कार्य करने के साथ ही लोकल परीक्षाओं के नतीजे भी तैयार करने होंगे।
जबकि प्रशासन ने मार्च माह में शिक्षकों को मकानों की गणना करने की जिम्मेदारी के निर्देश जारी कर दिए हैं। यही नहीं, मार्च माह में यह कार्य पूर्ण करने के बाद माह अप्रैल में शिक्षकों को जनगणना भी करना होगी। इस तरह शिक्षकों का अधिकतर समय गैर शैक्षणिक कार्य करने में ही बीत जाता है, वह पढ़ाई कराने में असहाय साबित हो रहे हैं।
सरकारी स्कूलों में गिरता जा रहा शिक्षा का स्तर
शासन भले ही सीएम राइज, नवोदय, मॉडल स्कूल सहित शासकीय स्कूलों में मुफ्त शिक्षा अभियान को बढ़ावा दे रहा है। इसके साथ ही शासन का प्रयास है कि स्कूलों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दी जाए, लेकिन हकीकत में जब शिक्षक स्कूल पहुंच ही नहीं रहे हैं तो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कैसे होगी।
यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर गिरता जा रहा है और लोग मजबूरन बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने भेज रहे हैं। हालांकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को मध्याह्न भोजन देकर स्कूल बुलाने का अभियान भी शुरू किया गया, लेकिन इससे बच्चे महज खानापूर्ति के लिए ही स्कूल जाते हैं।
वहां जाकर एक शिक्षक या शिक्षिका उन्हें बैठाए रखती है और खाना खाते ही बच्चे अपने घरों को लौट जाते हैं। शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य कराए जाने से स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो गई है। तलाशने के बाद भी शिक्षक नहीं मिलते हैं। जानकारी लेने पर बताया जाता है कि शिक्षक दूसरे कार्य करने गए हैं। इससे सरकारी स्कूलों मेें पढ़ाई प्रभावित होने लगी है।
गैर शैक्षणिक कार्य से मिले राहत
सेवानिवृत्त कर्मचारी नेता भगवती पंडित का कहना है कि शासन व प्रशासन को शिक्षकों को गैर शिक्षण कार्य से राहत देनी चाहिए, जिससे शिक्षक पूरी तरह से पढ़ाई पर फोकस कर सकें। इससे शिक्षा की गुणवत्ता भी सुधरेगी और बच्चों को बेहतर भविष्य बनाने का अवसर भी मिलेगा। इससे सरकारी स्कूलों में शिक्षा का प्रभाव बढ़ेगा तो छात्र संख्या भी बढ़ने लगेगी, लेकिन इसके लिए सबसे जरूरी है कि शिक्षकों से गैर शैक्षणिक कार्य बंद कराया जाए।
गिनती के बच्चे ही लेते हैं सरकारी स्कूलों में एडमिशन
शासन ने एक किलोमीटर पर प्राइमरी स्कूल और तीन किलो मीटर पर मिडिल स्कूल की अनिवार्यता तय की। इसके साथ ही हर पांच किलोमीटर में हाई स्कूल या हायर सेकंडरी स्कूल होना अनिवार्य किया गया। इसके बाद भी सरकारी स्कूलों में गिनती के बच्चे ही एडमिशन लेते हैं।
जबकि मुफ्त शिक्षा के चलते बच्चों की फीस भी नहीं लगती है, छात्रवृत्ति भी मिलती है, यूनिफार्म मिलती है और पुस्तकों के साथ मध्याह्न भोजन भी मिलता है, लेकिन स्कूलो में पढ़ाई के लिए सबसे जरूरी शिक्षक नहीं मिलता है। इससे शासन की नीति और शिक्षा की गुणवत्ता सुधार अभियान पर सवालिया निशान लग गया है।
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