अधिकतर कमिश्नर-कलेक्टर ऑफिस छोड़ने को राजी नहीं: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का ‘गांव में रात गुजारो’ आदेश नजरअंदाज
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
प्रदेश में प्रशासन को जनता के बीच ले जाने के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कलेक्टर-कमिश्नर को गांवों में रात्रि विश्राम और चौपाल लगाने के सख्त निर्देश दिए हैं लेकिन जमीनी हकीकत और ही कहानी बयां कर रही है।
अधिकांश जिलों में यह पहल कागजों तक सीमित है। गिने-चुने कलेक्टर ही सक्रिय नजर आ रहे हैं। सवाल है क्या मुख्यमंत्री के निर्देश की अनदेखी हो रही है?
मुख्यमंत्री ने हाल ही में कलेक्टर-कमिश्नर सम्मेलन और समीक्षा बैठकों में अधिकारियों को साफ तौर पर कहा है अधिकारी प्रशासन को दफ्तरों से निकालकर गांव-कस्बों तक ले जाएं। गांवों और कस्बों में रात्रि विश्राम करें, रात में चौपाल लगाकर ग्रामीणों से सीधा संवाद करें। गेहूं खरीदी, पेयजल और अन्य योजनाओं की जमीनी स्थिति परखें और समस्याओं का समाधान करें।
जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट
सरकार का मकसद स्पष्ट था फाइलों में चल रही योजनाओं की वास्तविकता को जमीन पर जाकर समझना और जनता से सीधा जुड़ाव बढ़ाना। हालांकि, सख्त निर्देश के बावजूद अधिकांश जिलों में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिख रही है।
कई जिलों में न नियमित रात्रि विश्राम हो रहा है न चौपाल से व्यापक संवाद। सूत्रों के अनुसार, कुछ जिलों में औपचारिकता निभाने के लिए दौरे जरूर किए जा रहे हैं, लेकिन प्रभावी नहीं हैं। न समस्याओं का त्वरित समाधान हो रहा है न योजनाओं की वास्तविक समीक्षा।
पुराना मॉडल, नई उम्मीद
रात्रि विश्राम और चौपाल मॉडल नया नहीं है। पहले भी अधिकारी गांवों में रात बिताते और संवाद करते थे। बाद में यह व्यवस्था कमजोर पड़ गई थी। मुख्यमंत्री इसे फिर से सक्रिय करना चाहते हैं, ताकि योजनाओं की असली स्थिति सामने आए, किसानों, महिलाओं और ग्रामीणों की समस्याएं सीधे सुनी जाएं और मौके पर ही समाधान सुनिश्चित हो।
सफलता की कुंजी- नीयत और निगरानी
विशेषज्ञ मानते हैं इस पहल की सफलता पूरी तरह अधिकारियों की नीयत और निगरानी व्यवस्था पर निर्भर करेगी। अगर केवल औपचारिक दौरे बनकर रह गए तो असर सीमित रहेगा लेकिन ईमानदारी से अमल हुआ, तो यह ‘गांव की सरकार, गांव के बीच’ अवधारणा को फिर जीवंत कर सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है अन्य जिलों के कलेक्टर गांव में रात कब बिताएंगे? क्या प्रशासन वास्तव में जनता के बीच पहुंचेगा या यह पहल भी कागजी बनकर रह जाएगी?
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