नगर निगम का बड़ा एक्शन: 70 बिल्डर्स को थमाए 200 करोड़ की टैक्स वसूली नोटिस
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नगर निगम की ओर से ईडब्ल्यूएस/एलआईजी आवास के बदले आश्रय निधि (शेल्टर राशि) और विकास शुल्क की मांग को लेकर रियल एस्टेट सेक्टर में विवाद खड़ा हो गया है। नगर निगम ने 2021 के बाद मल्टी बनाने की मंजूरी लेने वाले 70 से अधिक बिल्डर्स को नोटिस जारी किए हैं।
राशि 200 करोड़ से अधिक
जानकारी के मुताबिक, किसी बिल्डर को करीब 2 करोड़ तो किसी को 5 करोड़ रुपए तक जमा कराने के नोटिस दिए गए हैं। सभी नोटिसों की कुल राशि 200 करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है।
खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे प्रोजेक्ट भी शामिल हैं, जिन्हें निगम से मंजूरी मिल चुकी है और कुछ बिल्डर्स अपनी मल्टी का कार्यपूर्णता प्रमाणपत्र भी ले चुके हैं।
30 जून के आदेश के बाद शुरू हुई वसूली
निगम की यह कार्रवाई नगर निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल के 30 जून 2026 के आदेश के बाद शुरू हुई है। इसके लिए मध्यप्रदेश नगर पालिका (कॉलोनी डेवलपमेंट) नियम, 2021 का आधार लिया गया है।
निगम की ओर से इस नियम में इस्तेमाल किए गए 'कॉलोनी' शब्द की व्याख्या के आधार पर कहा जा रहा है कि आवासीय या व्यावसायिक प्रोजेक्ट में मल्टी बनाकर संपत्ति बेचने की स्थिति में ईडब्ल्यूएस और एलआईजी आवास का प्रावधान किया जाना चाहिए।
इस आधार पर मांगी जा रही राशि
यदि बिल्डर ऐसा प्रावधान नहीं करता है तो बिक्री योग्य क्षेत्र की गाइडलाइन कीमत का 6 प्रतिशत शुल्क निगम में जमा कराने का प्रावधान बताया गया है। इसी आधार पर संबंधित बिल्डर्स से राशि मांगी जा रही है।
बिल्डर्स का सवाल- मल्टी को कॉलोनी कैसे माना?
इस कार्रवाई पर बिल्डर्स और रियल एस्टेट संगठन क्रेडाई ने आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि नियम में 'कॉलोनी' की परिभाषा को सही तरीके से समझे बिना इसे मल्टी स्टोरी प्रोजेक्ट पर लागू किया जा रहा है।
क्रेडाई के मुताबिक, नियम में पार्सल ऑफ लैंड यानी जमीन के टुकड़े कर प्लॉटिंग और बिक्री जैसी स्थिति में ईडब्ल्यूएस/एलआईजी प्रावधान की बात आती है। जबकि एक संपूर्ण प्लॉट पर मल्टी का निर्माण कर फ्लैट बेचने को उसी अर्थ में कॉलोनी नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर बिल्डर्स का दावा है कि निगम द्वारा नियम की व्याख्या गलत तरीके से की जा रही है।
सिर्फ इंदौर में नोटिस क्यों?
विवाद का एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि बिल्डर्स के अनुसार इस तरह की वसूली के नोटिस मध्यप्रदेश के अन्य स्थानीय निकायों में नहीं दिए जा रहे हैं। क्रेडाई का कहना है कि यदि 2021 के नियम का यही अर्थ है तो पूरे प्रदेश में एक समान नीति लागू होनी चाहिए।
रुपए की मांग पर उठ रहे सवाल
केवल इंदौर में नियम की अलग व्याख्या कर बिल्डर्स से करोड़ों रुपए की मांग किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। बिल्डर्स का कहना है कि निगम को पहले शासन स्तर से स्पष्ट मार्गदर्शन लेना चाहिए था, न कि केवल कानूनी राय के आधार पर इतनी बड़ी वसूली शुरू करनी चाहिए।
पांच साल बाद क्यों जागा निगम?
बिल्डर्स की ओर से सबसे बड़ा सवाल नोटिस के समय को लेकर उठाया जा रहा है। उनका कहना है कि नियम वर्ष 2021 से लागू है। इसके बावजूद करीब पांच साल तक निगम के अधिकारियों ने इस शुल्क की मांग नहीं की। अब अचानक पुराने प्रोजेक्ट्स पर करोड़ों रुपए की मांग क्यों की जा रही है?
बिल्डर्स का सवाल है कि यदि पहले के निगमायुक्तों के कार्यकाल में यह शुल्क देय था, तो उस समय इसकी गणना और मांग क्यों नहीं की गई? और यदि पहले दी गई मंजूरियां नियमों के अनुरूप थी, तो अब अचानक नया शुल्क किस आधार पर लगाया जा रहा है?
जिन प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी, उन्हीं से अब शुल्क क्यों?
बिल्डर्स ने निगम की अपनी मंजूरी प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि संबंधित मल्टी प्रोजेक्ट्स की भवन मंजूरी निगम ने ही जारी की थी। कई प्रोजेक्ट हाईराइज हैं और उनकी मंजूरी की प्रक्रिया में निगम की हाईराइज कमेटी भी शामिल रही है।
बिल्डर्स का दावा है कि मंजूरी के समय निगम ने जिन शुल्कों की मांग की, उन्होंने उनका भुगतान किया। लेकिन उस समय आश्रय निधि और विकास शुल्क की अतिरिक्त मांग नहीं की गई। ऐसे में अब प्रोजेक्ट्स को मंजूरी और कई मामलों में कार्यपूर्णता प्रमाणपत्र मिलने के बाद लाखों-करोड़ों रुपए की नई मांग को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
IDA स्कीम वाले प्लॉट पर भी सवाल
इस मामले में आईडीए की योजनाओं में प्लॉट लेकर मल्टी बनाने वाले बिल्डर्स का अलग तर्क है। एनआरके ग्रुप के दीपक कालरा, करण सिंह पिता पिंटू छाबड़ा समेत अन्य बिल्डर्स का कहना है कि जिन जमीनों पर वे प्रोजेक्ट बना रहे हैं, वे आईडीए की योजनाओं का हिस्सा हैं।
उनके मुताबिक, योजना तैयार करते समय ही आईडीए स्तर पर ईडब्ल्यूएस/एलआईजी से जुड़े प्रावधान किए जा चुके हैं। ऐसे में उनका सवाल है कि उसी जमीन पर बनने वाली मल्टी के लिए दोबारा अलग से यही प्रावधान या उसके बदले शुल्क क्यों लगाया जाए?
शुल्क नहीं दिया तो मंजूरी रद्द करने की चेतावनी पर भी आपत्ति
क्रेडाई की महापौर पुष्यमित्र भार्गव और निगमायुक्त क्षितिज सिंघल के साथ हुई बैठक में नोटिस में दी गई भवन मंजूरी रद्द करने की चेतावनी का मुद्दा भी उठाया गया। क्रेडाई का कहना है कि यदि किसी बिल्डर ने जानकारी छिपाकर या गलत जानकारी देकर भवन मंजूरी हासिल की है तो नियमों के तहत कार्रवाई समझ में आती है।
लेकिन जिस शुल्क की गणना और मांग निगम ने मंजूरी के समय ही नहीं बताई, उसे बाद में मांगकर जानकारी छिपाने के आधार पर मंजूरी रद्द करने की चेतावनी देना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला
नोटिस के खिलाफ क्रेडाई इंदौर के साथ कई बिल्डर्स ने इंदौर हाईकोर्ट का रुख किया है। याचिकाओं में नगर निगम द्वारा जारी किए गए नोटिस को निरस्त करने की मांग की गई है।
मामले में स्नेह डेवलपर्स, माइक्रोमिट्टी सायबरसिटी, वी टू एम इन्फ्रास्ट्रक्चर, अमृत इन्फ्रास्ट्रक्चर के शरद डोसी, अंबर बिल्डर्स के अमरलाल चुग, राजेंद्र कुमार शुक्ला, मयंक इंटरप्राइजेस के करण सिंह छाबड़ा, श्रीमंत महाराजा तुकोजीराव पवार रिलिजियस एंड चैरिटेबल ट्रस्ट के विक्रम सिंह पवार और एवी एस्टेट के दीपक कालरा समेत कई पक्षकार शामिल हैं।
क्रेडाई- 'कॉलोनी' की परिभाषा गलत समझी गई
क्रेडाई इंदौर के प्रमुख संदीप श्रीवास्तव का कहना है कि इस तरह के नोटिस केवल इंदौर में जारी किए गए हैं। उनका दावा है कि 'कॉलोनी' की परिभाषा को गलत तरीके से समझकर मल्टी प्रोजेक्ट्स पर शुल्क लगाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि इस विषय को महापौर और निगमायुक्त के सामने रखा जा चुका है, लेकिन अभी तक कोई समाधान नहीं निकला है। मामला अब हाईकोर्ट में भी पहुंच गया है।
अब फैसला कोर्ट और शासन की व्याख्या पर
एक तरफ नगर निगम नियमों के आधार पर शुल्क वसूली को सही मान रहा है, वहीं बिल्डर्स इसे नियम की गलत व्याख्या और मंजूरी के बाद की गई नई मांग बता रहे हैं।
मामले में अब मुख्य सवाल यही है कि 2021 के कॉलोनी डेवलपमेंट नियमों में 'कॉलोनी' की परिभाषा मल्टी स्टोरी प्रोजेक्ट पर किस तरह लागू होती है और क्या मंजूरी व कार्यपूर्णता प्रमाणपत्र जारी होने के वर्षों बाद इस तरह की अतिरिक्त राशि की मांग की जा सकती है?
हाईकोर्ट में चल रही सुनवाई और शासन की ओर से होने वाली व्याख्या से ही इस विवाद पर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।
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