महाकाल की ही कृपा रही वरना
KHULASA FIRST
संवाददाता

निरुक्त भार्गव स्वतंत्र लेखक, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
इस बार की नागपंचमी ने उज्जैन को कलंक से बचा लिया। 17 अगस्त वाकई असाधारण दिन था: महाकाल दर्शन के लिए 6 लाख लोग पहुंचे, बाबा की तीसरी परंपरागत सवारी देखने लगभग 8 लाख लोग निर्धारित मार्गों के इर्द-गिर्द जमा हुए।
सालभर में सिर्फ 24 घंटों के लिए खुलने वाले नागचंद्रेश्वर मंदिर में 10 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे। इस बीच, हादसा एक दर्जन से ज्यादा आगंतुकों को हताहत कर गया, लेकिन भला हो महाकाल का और उनके गले के आभूषण यानी नागराज का कि हजारों लोग भगदड़ का शिकार होने से बच गए।
पिछले 15 दिनों से साफ नज़र आ रहा था करीब 8 लाख की जनसंख्या वाले शहर में रोज बाहर से आ रहे आस्थावान लोगों की संख्या काफी ज्यादा है। सिलसिला लगातार बढ़ रहा था। पूर्व की तरह प्रशासन ने स्कूलों को श्रावण मास में सोमवार की जगह रविवार को संचालित करना भी आरम्भ करवा दिया था, मगर 16 अगस्त के रविवार ने इस पर पुनर्विचार की जरूरत को रेखांकित कर दिया।
उज्जैन आने वाले प्राय: हर मार्ग पर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें थीं। शहर के हाल तो भयानक थे, चारों दिशाओं में घंटों-घंटों के जाम लगे थे। लोग हलाकान थे और मन ही मन कसमसा भी रहे थे, लेकिन जिम्मेदारों के लिए तो ये सब घटनाक्रम शगल मात्र थे।
ये ध्रुव सत्य है बड़े त्योहार पर आने वाली भीड़ का सटीक आंकलन सदैव चुनौतीपूर्ण होता है। प्रशासन ने अपने हिसाब से पूर्वानुमान लगाये थे और उसी के अनुरूप इंतज़ाम भी किए। एक अदने-से कर्मचारी से लेकर वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर तक को चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था बनाने के काम में निरंतर सक्रिय भी देखा गया।
बावजूद हरसिद्धि मंदिर चौराहे और बड़ा गणेश मंदिर क्षेत्र में भयंकर अफरा-तफरी मच गई। नागचंद्रेश्वर मंदिर में स्थापित नाग परिवार की अद्भुत प्रतिमाओं के दर्शन करने 8-10 घंटे से दो-दो किमी लंबी पंक्तियों में लगे नर-नारियों और उनके परिजनों का धैर्य क्यों टूट गया, प्रभु जानें। भगदड़ के शिकार एक दर्जन से ज्यादा लोगों को ताबड़तोड़ अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
भले-ही इस घटना की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की जा रही हो, हर बार की तरह ऐसा कुछ नहीं होने वाला न किसी की जवाबदेही तय होगी। सत्तावादियों द्वारा फिर एक मर्तबा बड़ी बेशर्मी से ऐसा प्रदर्शित किया जाएगा आस्थावान लोग कुछ भी कहें अथवा सोचें, मूर्तियां नहीं बोलती हैं और असल में वो ही विधाता हैं।
आला अफसर घटना समय से लेकर देर रात तक खंडन करते रहे कुछ अनहोनी नहीं हुई है और सारी मीडिया रिपोर्ट्स बेमानी हैं। इन सबके इतर, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दर्जनों वीडियो क्लिप्स मंडराती रहीं। जो किशोर, युवतियां और अन्यान्य दर्शनार्थी हाथ, पांव, इत्यादि पर चोट खाये शासकीय चरक अस्पताल में लाए गए, उनकी दारूण कथाएं भी खूब वायरल हुईं।
दर्शनार्थी प्रबंधन में विफलता
विगत 30 वर्षों से महामृत्युंजय महाकाल के इस विश्व विख्यात देवालय ने अनेक हादसे, घपले-घोटाले देखे हैं और उनसे क्या सबक लिए गए, इसको भी बारीकी से मापा है। दुर्भाग्यपूर्ण है शासन तंत्र आज तक इस निष्कर्ष पर जा ही नहीं पाया कि विशालकाय मंदिर प्रबंधन किस तरह किया जाए। हकीकत है महाकाल मंदिर बनाम महाकाल महालोक को प्रयोगशाला बनाकर रख दिया गया है।
अध्यात्म और धार्मिक संस्कारों को प्रबल करने वाला यह प्राचीन स्थल, तेजी से धंधेबाजी के अड्डे के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। जिनकी अंटी में माल है, उन्हें ही घंटी बजाने की सुविधा है। भांति-भांति के चोलाधारियों को भगवान का स्पर्श करने और निकट जाने का विशेषाधिकार है और आमजन को धिक्कार।
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