जहर है, कब तक पीना पड़ेगा: जानलेवा ‘पैराक्वेट’ पर शीघ्र लगे प्रतिबंध
KHULASA FIRST
संवाददाता

डॉ. संतोष पाटीदार 93400-81331 खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
दे श में मानव जीवन की कीमत सरकारों के लिए ज्यादा मायने नहीं रखती। इसका उदाहरण वे सारे जहरीले जानलेवा कीटनाशक और खरपतवारनाशक एवं अन्य ऐसे ही जहरीले रसायन हैं, जिनका उपयोग देश में धड़ल्ले से किया जा रहा है, जबकि इनमें से कई खतरनाक रसायन विश्व स्वास्थ्य संगठन और विदेश में प्रतिबंधित किए जा चुके हैं।
इसके बावजूद हमारे देश में इनके प्रयोग की पूरी छूट है। यह जानते हुए भी कि इन रसायनों के कारण देश में हर वर्ष हजारों लोगों की जान जा रही है। पैराक्वेट डाइक्लोराइड एक ऐसा ही जहरीला रसायन है, जो ब्रिटेन में लगभग 20 वर्ष पहले ही प्रतिबंधित किया जा चुका है, लेकिन भारत में इस पर प्रतिबंध की कार्रवाई अब शुरू हुई है। केंद्र सरकार तमाम तरह की औपचारिकताएं निभाने में लगी है, जबकि इस पर तत्काल प्रतिबंध लगाया जाना था।
इस बारे में केंद्र सरकार ने एक गजट नोटिफिकेशन ड्रॉफ्ट जारी किया है और इसकी खानापूर्ति होते-होते सैकड़ों लोग इस रसायन के शिकार हो चुके होंगे। फिर भी सरकार पूर्ण प्रतिबंध शीघ्र लगाने के प्रति गंभीर नहीं दिखती।
नागरिक संगठनों के मंच ‘आशा-किसान स्वराज’ ने केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित पैराक्वेट डाइक्लोराइड प्रतिबंध आदेश, 2026 का पुरजोर स्वागत किया है। साथ ही सरकार से मांग की है कि इस बेहद जहरीले और जानलेवा हर्बिसाइड (खरपतवारनाशक) पर बिना एक भी दिन की देरी किए तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए।
इस संबंध में संगठन ने सरकार को पत्र लिखा है तथा देशभर के वैज्ञानिकों, किसानों और नागरिकों से भी जहरीले रसायनों पर प्रतिबंध के लिए केंद्र सरकार से अपील करने का अभियान चलाने की अपेक्षा की है।
गौरतलब है मंत्रालय ने 10 जुलाई 2026 को इस संबंध में एक गजट नोटिफिकेशन जारी कर जनता से सुझाव मांगे थे। इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए संगठनों ने स्पष्ट किया है कि भारत इस प्रतिबंध को लागू करने में पहले ही बहुत देर कर चुका है, जिसके कारण अनगिनत लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
पैराक्वेट पर प्रतिबंध का ड्रॉफ्ट आना इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने इसकी बेहद जहरीली प्रकृति, कोई एंटीडोट न होने और इसके कारण हो रही मौतों (विशेषकर आत्महत्या और स्वास्थ्य संबंधी खतरों) को स्वीकार कर लिया है। चूंकि प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में है, इसलिए नागरिक संगठनों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मांग है कि इसमें और अधिक देरी न करते हुए तुरंत अंतिम प्रतिबंध आदेश जारी किया जाए।
राज्यों को अधिकार... राज्य सरकारों को अपनी कृषि नीतियों के अनुसार कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार मिले। प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को भी लागू करने की मांग की जा रही है। इसके अंतर्गत कीटनाशक जहर से पीड़ित और उनके परिवारों को मुआवजा देने के लिए सख्त नियम बनाए जाएं।
दुनियाभर में प्रतिबंध, तो भारत में देरी क्यों?... पत्र में इस बात पर गहरी चिंता जताई गई है कि जिस खतरनाक रसायन को दुनियाभर के 70 से अधिक देशों में प्रतिबंधित या प्रतिबंधित श्रेणी में रखा जा चुका है, उसके इस्तेमाल की अनुमति भारत में अब तक क्यों दी जा रही है।
एक वर्ष में 34 हजार से अधिक मौतें... राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि केवल वर्ष 2024 में देश में कीटनाशकों के सेवन से 34,000 से अधिक मौतें दर्ज की गईं (जिनमें 26,921 आत्महत्या और 7,821 दुर्घटनाएं शामिल हैं)। ये आंकड़े उन अनगिनत लोगों के अलावा हैं, जो इसके दीर्घकालिक दुष्प्रभावों से अपनी जान गंवा रहे हैं।
उद्योगों और कंपनियों का खेल... देश में कीटनाशकों, जहरीले रसायनों का हर साल का करोड़ों-अरबों रुपए का व्यापार-व्यवसाय हो रहा है। इस मौत के धंधे में देश ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के साथ कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय कॉरपोरेट कंपनियां लगी हुई हैं, जो भारत जैसे देश में जहरीले और उनके देश में प्रतिबंधित रसायनों को बेच रही हैं। इन कंपनियों का भारत सरकार पर हमेशा दबाव और प्रभाव बना रहता है। ये कंपनियां सरकार की नीतियों को भी प्रभावित करने की ताकत रखती हैं, जो एक बड़ा कारण बताया जाता है। इसीलिए मुनाफाखोर कंपनियां बेखौफ अपना धंधा चलाती हैं।
जानकार बताते हैं कि इस प्रकार के जहरीले रसायनों के उत्पादन और व्यापार से जुड़ी बड़ी कंपनियों और उद्योगों द्वारा अक्सर कानूनी या नीतिगत स्तर पर दबाव बनाया जाता है। सरकार को सभी पक्षों की समीक्षा करनी होती है, ताकि भविष्य में कानूनी अड़चनें न आएं।
वैज्ञानिक समितियों की रिपोर्ट... सरकार ने जनवरी 2026 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसने जून 2026 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसके बाद रजिस्ट्रेशन कमेटी की सलाह पर ड्रॉफ्ट तैयार हुआ।
अंतिम गजट नोटिफिकेशन... पैराक्वेट डाइक्लोराइड के खतरनाक और जहरीले प्रभाव को प्रबंधित करने की मांग पर सरकार ने जो गजट नोटिफिकेशन ड्रॉफ्ट जारी किया है उसी दिन से 30 दिन की समय-सीमा पूरी होने के बाद प्राप्त सुझावों और आपत्तियों की समीक्षा करके केंद्र सरकार से अंतिम आदेश जारी होगा। जहरीले रसायनों को प्रतिबंधित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे आधिकारिक गजट में प्रकाशित किया जाता है। उसके बाद ही यह देशभर में कानूनी रूप से पूरी तरह प्रतिबंधित माना जाता है।
कानूनी प्रक्रियाधीन है मामला
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 10 जुलाई 2026 को पैराक्वेट डाइक्लोराइड प्रतिबंध आदेश का ड्रॉफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया है। इसका मतलब है कि सरकार ने इस खतरनाक रसायन को देश में पूरी तरह प्रतिबंधित करने का इरादा आधिकारिक रूप से घोषित कर दिया है और इस पर कानूनी प्रक्रिया चल रही है।
देशभर के स्वास्थ्य विशेषज्ञों, नागरिकों और किसान संगठनों ने केंद्रीय कृषि मंत्रालय से अपील की है कि वह कीटनाशक उद्योग के किसी भी दबाव में न आकर निम्नलिखित सुधारों के साथ कड़े कदम उठाए...विशेषज्ञों ने मांग की है कि पैराक्वेट डाइक्लोराइड पर तुरंत रोक लगाई जाए। अन्य देशों में इसके अलावा अन्य जो कीटनाशक प्रतिबंधित हैं, वे भारत में भी प्रतिबंधित किए जाएं। नियमित समीक्षा करने के साथ पंजीकृत कीटनाशकों की समय-समय पर वैज्ञानिक समीक्षा की अनिवार्यता हो।
पैराक्वेट डाइक्लोराइड के खतरनाक और जहरीले प्रभाव
आशा-किसान स्वराज द्वारा सरकार को भेजे जाने वाले पत्र में इस रसायन के भयानक दुष्प्रभावों का विशेष उल्लेख किया गया है-
कोई एंटीडोट नहीं (इलाज असंभव): पैराक्वेट दुनिया के सबसे खतरनाक हर्बिसाइड्स में से एक है। इसकी बहुत कम मात्रा भी यदि शरीर के भीतर चली जाए, तो वह जानलेवा साबित होती है, क्योंकि इसका कोई भी ज्ञात एंटीडोट (विषनाशक दवा) मौजूद नहीं है।
फेफड़ों और किडनी पर सीधा हमला: इसके जहर से होने वाली मौतों की दर (केस फैटलिटी रेट) 70 प्रतिशत तक है। यह फेफड़ों और किडनी को गंभीर रूप से प्रभावित करता है, जिससे फेफड़ों में फाइब्रोसिस जैसी लाइलाज स्थिति पैदा हो जाती है।
पार्किंसंस और गंभीर बीमारियां: वैज्ञानिक शोधों से पुष्टि हुई है कि पैराक्वेट के संपर्क में आने से तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर पड़ता है और पार्किंसंस रोग जैसी गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारियां होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसके अलावा यह जन्मजात विकृतियों और बच्चों में विकास संबंधी विकारों का भी कारण बनता है।
खुदकुशी और हादसों का जरिया: बाजार में आसानी से और कम कीमत में उपलब्ध होने के कारण यह युवाओं में आत्महत्या और दुर्घटनावश जहर सेवन का एक बड़ा माध्यम बन गया है।
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