हादसे के बाद बड़ा सवाल: सिटी बस से ज्यादा खतरनाक अतिक्रमण का जाल; वसूली गैंग ने बिगाड़ी व्यवस्था!
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
मध्यप्रदेश के राजवाड़ा पर हुए हादसे के बाद शहर में सिर्फ सिटी बस को लेकर सवाल नहीं उठ रहे, बल्कि राजवाड़ा की सड़कों पर पसरे अतिक्रमण और वसूली गैंग के खेल ने भी पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
हादसे ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि आखिर शहर के सबसे व्यस्त इलाके में सड़क और फुटपाथ पर कब्जे को लंबे समय तक कैसे नजरअंदाज किया जाता रहा?
राजवाड़ा के आसपास अतिक्रमण का जाल
राजवाड़ा और आसपास के बाजार क्षेत्र में सड़क किनारे ठेले, अस्थायी दुकानें और दूसरे तरह के कब्जे लंबे समय से यातायात व्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। कई जगह स्थिति ऐसी है कि पैदल चलने वालों के लिए सड़क या फुटपाथ का हिस्सा ही बचता है।
भीड़भाड़ वाले इलाके में जब पैदल यात्री, सिटी बस, ई-रिक्शा, दोपहिया और अन्य वाहन एक ही सीमित जगह में चलते हैं, तो हादसे का खतरा बढ़ना स्वाभाविक है।
ई-रिक्शा और ठेलों की वजह से और सिकुड़ती सड़क
राजवाड़ा क्षेत्र में ई-रिक्शा द्वारा सड़क पर रुककर सवारी बैठाने, वाहनों की बेतरतीब पार्किंग और ठेलों के कारण यातायात प्रभावित होने की शिकायतें सामने आती रही हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार सड़क का बड़ा हिस्सा अस्थायी कब्जों और खड़े वाहनों में घिर जाता है। ऐसे में किसी वाहन के अचानक नियंत्रण खोने पर पैदल यात्रियों के पास बचने के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं रहती।
सबसे गंभीर सवाल: क्या अतिक्रमण के पीछे है वसूली गैंग का खेल?
राजवाड़ा की व्यवस्था को लेकर सबसे गंभीर आरोप नगर निगम की अतिक्रमण हटाने वाली कार्रवाई पर लगाए जा रहे हैं। आरोप है कि रिमूवल विभाग से जुड़े कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत के कारण कुछ अवैध ठेले और अस्थायी कब्जे लंबे समय तक बने रहते हैं। आरोप यह भी है कि कुछ कब्जाधारियों से कथित रूप से नियमित रकम वसूली जाती है और इसके बदले कार्रवाई से बचाया जाता है।
कार्रवाई होती है, फिर कुछ दिन बाद लौट आते हैं कब्जे
राजवाड़ा सहित शहर के कई बाजार क्षेत्रों में अक्सर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई दिखाई देती है। लेकिन सवाल यह है कि कार्रवाई के कुछ समय बाद वही ठेले और अस्थायी कब्जे दोबारा कैसे खड़े हो जाते हैं?
अगर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई लगातार चल रही है, तो फिर एक ही जगह पर बार-बार कब्जे लौटने की वजह क्या है? यही सवाल कथित वसूली के आरोपों को भी गंभीर बनाता है और इसकी निष्पक्ष जांच की जरूरत को सामने लाता है।
प्रशासन को पहले भी दी जाती रही है चेतावनी
राजवाड़ा की यातायात व्यवस्था को लेकर स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों की ओर से समय-समय पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। सिटी बसों के संचालन के साथ-साथ अतिक्रमण और ई-रिक्शा की आवाजाही को नियंत्रित करने की मांग भी होती रही है।
एक प्रस्ताव यह भी रहा है कि राजवाड़ा से सिटी बसों को हटाकर यशवंत रोड-नंदलालपुरा-जवाहर मार्ग होते हुए संजय सेतु क्षेत्र की पार्किंग में स्थानांतरित किया जाए और वहां व्यवस्थित सिटी बस स्टैंड विकसित किया जाए, लेकिन हादसे के बाद अब सवाल सिर्फ बसों के रूट का नहीं है।
हादसे के बाद अब जवाब देना होगा
राजवाड़ा हादसे ने प्रशासन के सामने कई सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं।
-सड़क और फुटपाथ पर अतिक्रमण क्यों कायम है?
-कार्रवाई के बाद कब्जे दोबारा कैसे लौट आते हैं?
-क्या अतिक्रमण हटाने वाली कार्रवाई की नियमित निगरानी होती है?
-कथित वसूली के आरोपों की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?
-क्या हादसे की जांच में सिर्फ सिटी बस और चालक की भूमिका देखी जाएगी या पूरे सिस्टम की जिम्मेदारी तय होगी?
राजवाड़ा शहर की पहचान है। यहां यातायात और अतिक्रमण की समस्या को सिर्फ अभियान चलाकर नहीं, बल्कि स्थायी व्यवस्था और जवाबदेही तय करके खत्म करना होगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है, राजवाड़ा हादसे के बाद प्रशासन सिर्फ बस पर कार्रवाई करेगा या उस पूरे सिस्टम की भी जांच होगी, जिसने सड़क, फुटपाथ और यातायात व्यवस्था को लगातार अव्यवस्थित होने दिया?
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