इंदौर मांगे समस्याओं से आजादी
KHULASA FIRST
संवाददाता

नितेश पाल वरिष्ठ पत्रकार, खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
भारत को तो 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से आजादी मिल गई थी, लेकिन इसी भारत का एक हिस्सा इंदौर आज भी आजादी के लिए सिसक रहा है। इंदौर को आजादी चाहिए, ट्रैफिक जाम से, खुदी हुई सड़कों से, नलों से आ रहे गंदे पानी से, शहर में लगने वाले होर्डिंग पोस्टरों से, सड़ चुके तंत्र, खुद को राजा मानने वाले नेता और अफसरों से।
पूरे शहर में आजादी को याद करते हुए तिरंगा यात्रा निकल रही है। इंदौर में हर साल 15 अगस्त को आजादी के तराने बजाते हुए नेता तिरंगे को फहराते हैं। तिरंगा प्रतीक है हर भारतीय के सम्मान का। आजादी के बाद इस देश का मालिक इस देश में रहने वाला हर भारतीय बन गया है, लेकिन क्या ये सच है। अन्य जगहों का तो पता नहीं, लेकिन इंदौर में तो ऐसा कुछ नहीं होता।
भारत की आजादी को बनाए रखने के लिए तीन पिलर बनाए गए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। लेकिन ये तीनों ही शायद इंदौर से गायब हैं, क्योंकि इंदौर साल के 365 दिन जाम में उलझा रहता है। इस शहर में एक भी दिन ऐसा नहीं जाता, जब शहर के किसी हिस्से में जाम नहीं लगा हो।
पूरे सालभर इंदौर की सड़कों पर कुछ न कुछ होता रहता है। कभी धार्मिक तो कभी अन्य आयोजन होते ही रहते हैं और कोई आयोजन नहीं हो तो सड़क पर ठेले-गुमटी या दुकानों की पार्किंग का कब्जा तो रहता ही है। इनके कारण 80 फीट की सड़क भी 30 फीट की ही रह जाती है, लेकिन मजाल है कि इससे शहरवासियों को मुक्ति मिल जाए।
इंदौर के नेता हो, अफसर हो या न्याय प्रणाली से जुड़े लोग। तीनों ही बेसुध रहते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि इन्हें जगाने के लिए भगतसिंह को आना पड़ेगा और इनके बीच में कोई बम फोड़ना होगा। इंदौर वाले पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा टैक्स देते हैं, लेकिन इंदौर में एक भी सड़क ऐसी नहीं है, जिसमें 500 मीटर की दूरी में गड्ढा नहीं हो और वो खुला हुआ नहीं हो।
यदि सीमेंट की सड़क है तो उसे भी खोद दिया गया होगा या उसके बीच की दरारें ऐसी होंगी कि गाड़ी गिरने से कोई नहीं रोक सकता। इससे भले ही इंदौरी गिरकर घायल हो या मरें, किसी को इसकी परवाह नहीं है। इंदौर इनसे मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा है, क्या इंदौर वालों को इससे मुक्ति के लिए सविनय अवज्ञा आंदोलन की तरह कोई आंदोलन करना होगा।
इंदौर के लोग आज भी हर इंसान को जिंदा रखने के लिए जरूरी साफ पानी के लिए तरस रहे हैं। देश के 14वें बड़े शहर इंदौर में साफ पानी मिलना मुश्किल है। अंग्रेजों के समय बंगाल में अकाल पड़ा था, लाखों लोग मर गए थे, लेकिन अंग्रेजों ने कोई ध्यान नहीं दिया था।
भारत का अनाज जो इन भूख से मर रहे लोगों को जिंदा रख सकता था, उसे द्वितीय विश्वयुद्ध में लड़ रहे ब्रिटिश सैनिकों को भेज दिया था। इंदौर में भी 36 लोग गंदे पानी के कारण मर गए, लेकिन इनकी मौत के लिए कोई जिम्मेदार तय नहीं हो पाया।
अंग्रेजों के समय जैसे हर गलत बात पर सरकार आंखें बंद कर लेती थी, इंदौर में भी गंदे पानी को रोकने के लिए कोई कदम उठाया गया हो ऐसा कभी दिखता नहीं। उल्टा पानी के लिए बोरिंग मशीन से गैस लाइन फोड़कर लोगों को मार जरूर दिया गया। इंदौर में आदमी सरकारी दफ्तरों में खजल होता रहता है, लेकिन मजाल है उसकी बात को कोई सुन ले।
इंदौर के नेता हो या अफसर सब इसे अपनी बपौती समझते हैं, जैसे अंग्रेज भारत के बाप बने हुए थे, वैसे ही ये भी हो चुके हैं। अंग्रेजों से कोई सवाल करता था तो उसे सजा मिलती थी, आज इंदौर के किसी नेता या अफसर भले ही वो कुछ भी करे, कोई सवाल नहीं किया जा सकता है।
अंग्रेजों के समय उनका ध्यान केवल टैक्स वसूली पर होता था, आज इंदौर में भी जनता केवल टैक्स देने के लिए ही बची है, उसे इस पैसे के बदले कोई सुविधा मिल रही हो ये दूर तक नहीं दिखता। लोकतंत्र के तीनों खंभे विधायिका, अफसरशाही और न्याय क्षेत्र से जुड़े लोग सभी मौन बने हुए हैं।
ताकत तो तीनों में हैं, लेकिन तीनों एक-दूसरे को साधकर जनता को मरने के लिए बेबस छोड़ चुके हैं। जनता की बात को ये सभी ऐसे नकारते हैं, जैसे जनता इनकी मालिक नहीं बल्कि एक काॅकरोच हो।
इंदौर कभी विद्रोहियों की सरजमीं था, लेकिन आज लगता है तंत्र के आगे इंदौर घुटने टेक चुका है। नेताओं, अफसरों की गुलामी को स्वीकार कर चुके इंदौर के मन में तो इनसे आजादी की भावना है, इंदौर इस स्वतंत्रता दिवस पर सड़े हुए तंत्र से आजादी मांग रहा है, लेकिन उसे गुलामी से मुक्ति मिलेगी ऐसा होता दिख नहीं रहा है।
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