नुक्कड़ नाटक से शॉर्ट फिल्म तक...नशे पर वार: स्कूल, कॉलेज, बाजार और मोहल्लों तक पहुंची इंदौर पुलिस; हजारों लोगों को दिलाई नशामुक्ति की शपथ
KHULASA FIRST
संवाददाता

‘नशे को ना 2.0’ अभियान
खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
नशे के खिलाफ पुलिस का जनजागरूकता अभियान लगातार रफ्तार पकड़ रहा है। ‘नशे से दूरी, है जरूरी 2.0’ अभियान के तहत गुरुवार को शहर के स्कूल, कॉलेज, बाजार और रिहायशी इलाकों में नुक्कड़ नाटक, पेंटिंग प्रतियोगिता, हस्ताक्षर अभियान, रैली, शॉर्ट फिल्म और शपथ कार्यक्रम आयोजित किए गए। अभियान का उद्देश्य युवाओं और परिवारों को नशे के दुष्परिणामों से अवगत कराकर नशामुक्त समाज का निर्माण करना है।
पुलिस कमिश्नर संतोष कुमार सिंह के निर्देशन में चल रहे इस अभियान के तहत गुरुवार को शहरभर में जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित हुए। पुलिस अधिकारियों और जवानों ने विद्यार्थियों, शिक्षकों, दुकानदारों, वाहन चालकों व आम नागरिकों के बीच पहुंचकर नशे के खिलाफ जनअभियान को नई गति दी।
अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (महिला सुरक्षा शाखा) संध्या राय की टीम ने दिल्ली इंटरनेशनल स्कूल, धार रोड में विद्यार्थियों के बीच नुक्कड़ नाटक, पेंटिंग प्रतियोगिता और हस्ताक्षर अभियान आयोजित किया। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों और शिक्षकों को नशामुक्त समाज के निर्माण की शपथ दिलाई गई।
वहीं अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त (क्राइम) राजेश दंडोतिया की टीम ने मारथोमा पब्लिक स्कूल में विद्यार्थियों को नशे के दुष्परिणाम बताते हुए उनसे नशे से दूर रहने का संकल्प कराया। क्राइम ब्रांच की टीम ने गवर्नमेंट गर्ल्स पॉलिटेक्निक कॉलेज, रेनबो किड्स हायर सेकंडरी स्कूल और कनकेश्वरी हायर सेकंडरी स्कूल में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए।
थाना तेजाजी नगर पुलिस ने श्री चैतन्य टेक्नो स्कूल के विद्यार्थियों के साथ नशामुक्ति जागरूकता रैली निकाली। एमआईजी थाना पुलिस ने विद्यासागर स्कूल में विद्यार्थियों को मानस हेल्पलाइन सहित अन्य सहायता सेवाओं की जानकारी दी।
छत्रीपुरा पुलिस ने लाबरिया भेरू क्षेत्र के रहवासियों को नशे के दुष्परिणाम बताते हुए उपचार और पुनर्वास केंद्रों की जानकारी भी दी। महिला थाना पुलिस ने पलासिया चौराहा पर आम नागरिकों को नशे से दूर रहने की शपथ दिलाई, जबकि छोटी ग्वालटोली पुलिस ने शास्त्री ब्रिज क्षेत्र में
दुकानदारों और लोक परिवहन चालकों को जागरूक किया। कनाड़िया थाना पुलिस ने बिचौली मर्दाना स्थित क्रोमा सेंटर की एलईडी स्क्रीन पर नशामुक्ति पर आधारित लघु फिल्में और वीडियो प्रदर्शित कर लोगों तक संदेश पहुंचाया।
नशे के खिलाफ सबसे कारगर हथियार परिवार का साथ और विश्वास...
जब किसी युवा की मृत्यु ड्रग्स के ओवरडोज़ से होती है, किसी परिवार का बेटा या बेटी पुनर्वास केंद्र के चक्कर लगाता है, या ड्रग्स की नई खेप पकड़ी जाती है, तो हमारी पहली प्रतिक्रिया कानून, पुलिस और तस्करी के नेटवर्क की ओर जाती है। यह स्वाभाविक भी है।
गिरफ्तारी बढ़ रही है, कानून कठोर हो रहे हैं और पुनर्वास केंद्रों की संख्या भी बढ़ रही है, इसके बावजूद नशे की समस्या दुनिया के लगभग हर समाज में फैल रही है, तो शायद हम गलत मोर्चे पर लड़ रहे हैं।निर्णायक लड़ाई अदालतों, जेलों या अस्पतालों, पुनर्वास केंद्रों में नहीं, बल्कि परिवारों के भीतर लड़ी जानी चाहिए।
आज नशा स्वास्थ्य का संकट नहीं; सामाजिक संबंधों के विघटन का आईना है। संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न रिपोर्टें लगातार संकेत देती हैं। दुनियाभर में करोड़ों लोग मादक पदार्थों का सेवन करते हैं और लाखों लोग इसकी गंभीर निर्भरता से जूझ रहे हैं। यह केवल रसायनों की कहानी नहीं है; यह टूटते भरोसे, बढ़ते अकेलेपन और घटते संवाद की भी कहानी है।
प्रायः मान लिया जाता है लोग नशा इसलिए करते हैं क्योंकि ये सरलता से उपलब्ध हो जाते है। वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। अधिकांश लोग किसी मादक पदार्थ की तलाश में नहीं निकलते; वे वास्तव में किसी भावना से बचने या किसी खालीपन को भरने की कोशिश कर रहे होते हैं।
मनोविज्ञान में इसे सेल्फ-मेडिकेशन हाइपोथिसिस कहा जाता है। मनुष्य प्रायः दो कारणों से नशे की ओर आकर्षित होता है—या तो अपनी खुशी को और अधिक तीव्र करना चाहता है, या दुख, तनाव, अकेलेपन और असफलताओं से छुटकारा पाना चाहता है। नशा समाधान नहीं देता, केवल दर्द को थोड़ी देर के लिए सुन्न कर देता है।
यहीं से परिवार की भूमिका शुरू होती है। उसकी छोटी-सी उपलब्धि परिवार की तालियों से बड़ी बन जाती है। उसी तरह उसका डर, उसकी असफलता और उसकी उदासी भी परिवार के कंधों पर हल्की हो जाती है। समस्या तब शुरू होती है जब यह सुरक्षा-चक्र कमजोर पड़ता है।
21वीं सदी ने अभूतपूर्व तकनीकी संपर्क दिया है, लेकिन भावनात्मक दूरी भी उतनी ही तेज़ी से बढ़ी है। एक ही घर में रहने वाले लोग अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त हैं। बातचीत की जगह निर्देशों ने ले ली है, और सुनने की जगह निर्णयों ने। परिवार मौजूद है, लेकिन संवाद अनुपस्थित।
ऐसे में युवा प्रश्नों, भय, असफलताओं और मानसिक संघर्षों को घर में व्यक्त नहीं कर पाते। जब घर में भावनात्मक स्थान नहीं मिलता, तो वे उसे बाहर खोजते हैं। दुर्भाग्य से बाहर हमेशा सही लोग नहीं मिलते। कई बार वहां गलत संगति, नशे का बाजार और ऐसे नेटवर्क मिलते हैं जो इसी भावनात्मक रिक्तता का लाभ उठाते हैं।
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक ब्रूस अलेक्जेंडर का ‘रेट पार्क’ प्रयोग इसी सत्य को रेखांकित करता है। अलग-थलग, नीरस वातावरण में रखे गए जीव नशे की ओर आकर्षित हुए, जबकि सामाजिक, सक्रिय व सुरक्षित वातावरण में वही प्रवृत्ति लगभग समाप्त हो गई। इस प्रयोग का संदेश स्पष्ट है—लत केवल पदार्थ की शक्ति नहीं, बल्कि वातावरण की विफलता भी है।
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