बीजेपी नेता की कॉलोनी पर विवाद: ऐसे खुली करोड़ों की जमीन की ‘कुंडली’; इतनी एकड़ जमीन सीलिंग से निजी होने पर सवाल
KHULASA FIRST
संवाददाता

खुलासा फर्स्ट, इंदौर।
शहर के बीजेपी नेता नीलेश चौधरी की स्वास्तिक ग्रैंड कॉलोनी की विकास मंजूरी निरस्त होने के बाद जमीन से जुड़ा बड़ा विवाद का खुलासा हुआ है।
शुरुआत में मामला कॉलोनी की करीब 4 हेक्टेयर जमीन के सीलिंग प्रभावित होने तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन प्रशासन की जांच आगे बढ़ी तो विवाद का दायरा करीब 154 एकड़ जमीन तक पहुंच गया।
प्रशासन के मुताबिक, इस जमीन की मौजूदा कीमत करीब 1500 करोड़ रुपए आंकी जा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि सीलिंग में दर्ज जमीन दिसंबर 2010 में किस आदेश के आधार पर निजी भूमि के रूप में दर्ज हुई। प्रशासनिक रिकॉर्ड में उस आदेश की मूल प्रति अब तक नहीं मिल सकी है।
कैसे खुला पूरा मामला?
इंदौर जिला प्रशासन की कॉलोनी सेल ने जुलाई में बीजेपी नेता नीलेश चौधरी की स्वास्तिक ग्रैंड कॉलोनी की विकास मंजूरी निरस्त कर दी थी। जांच में सामने आया कि कॉलोनी के सर्वे नंबरों में करीब 4 हेक्टेयर जमीन सीलिंग से प्रभावित है।
यह मामला एक अन्य कॉलोनी लुमिनियस इन्फ्राप्रोजेक्ट्स के आवेदन के बाद सामने आया। कंपनी की ओर से विकास मंजूरी के लिए आवेदन किया गया था, लेकिन मई-जून में प्रक्रिया रोक दी गई।
जांच में संबंधित सर्वे नंबर भी सीलिंग प्रभावित पाए गए। जमीन के पक्ष में यह तर्क दिया गया कि दिसंबर 2010 में हातोद के एसडीएम के एक आदेश के जरिए जमीन सीलिंग से मुक्त होकर निजी हो गई थी।
यही आदेश स्वास्तिक ग्रैंड की जमीन के संबंध में भी बताया गया। दावा था कि एक ही आदेश के जरिए कई जमीनें सीलिंग से मुक्त होकर निजी दर्ज हुई थीं।
जिस आदेश के आधार पर जमीन निजी हुई, वही रिकॉर्ड में नहीं मिला
जब कॉलोनी सेल ने दिसंबर 2010 के कथित आदेश की जांच की तो प्रशासन को उसकी मूल प्रति या संबंधित रिकॉर्ड नहीं मिला। प्रशासन ने हातोद एसडीएम कार्यालय के वर्ष 2009 से 2011 तक के आदेशों और रजिस्टरों की जांच की। पुराने रिकॉर्ड भी खंगाले गए, लेकिन संबंधित आदेश नहीं मिला।
इसी आधार पर स्वास्तिक ग्रैंड की विकास मंजूरी निरस्त कर दी गई। वहीं लुमिनियस इन्फ्राप्रोजेक्ट्स के प्रोजेक्ट को भी मंजूरी नहीं दी गई।
हाईकोर्ट पहुंचा मामला
विकास मंजूरी निरस्त होने के बाद स्वास्तिक ग्रैंड की ओर से संभागायुक्त कार्यालय में अपील की गई। वहां कलेक्टर के आदेश पर अंतरिम रोक लग गई और मामले की सुनवाई जारी है। दूसरी ओर, लुमिनियस इन्फ्राप्रोजेक्ट्स ने हाईकोर्ट की इंदौर बेंच का रुख किया।
हाल ही में हुई सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन की कॉलोनी सेल की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि जमीन के रिकॉर्ड की जांच में गंभीर खामियां सामने आई हैं और विस्तृत जवाब देने से पहले रिकॉर्ड की जांच जरूरी है। हाईकोर्ट ने प्रशासन को जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है।
जांच आगे बढ़ी तो सामने आया 154 एकड़ का विवाद
जिला प्रशासन ने जब हातोद तहसील में उस कथित दिसंबर 2010 के आदेश की पड़ताल शुरू की तो मामला और बड़ा निकला।
जांच में सामने आया कि विवादित जमीन का कुल क्षेत्रफल करीब 154 एकड़ है। प्रशासन के अनुसार, इस जमीन की मौजूदा कीमत करीब 1500 करोड़ रुपए हो सकती है।
पुराने राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक, यह जमीन हिंदूसिंह नाम के व्यक्ति के नाम पर रही है। बाद में सीलिंग कानून के दायरे में आने के कारण कुल 230 एकड़ से अधिक जमीन में से करीब 154 एकड़ जमीन सीलिंग में दर्ज हुई।
हालांकि शुरुआती दौर में प्रशासन ने जमीन पर कब्जा नहीं लिया और राजस्व रिकॉर्ड में भी सीलिंग की स्थिति तत्काल दर्ज नहीं की गई। बाद में वर्ष 2006 से 2010 के बीच जमीन सीलिंग के नाम से दर्ज हुई।
राजस्व बोर्ड के आदेश के बाद उलझा मामला
मामला आगे राजस्व बोर्ड तक पहुंचा। वहां से आदेश हुआ कि संबंधित मामले की सुनवाई सक्षम अधिकारी यानी एसडीओ स्तर पर की जाए।
यहां तक के आदेश और रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। लेकिन इसके बाद दिसंबर 2010 में कथित तौर पर जमीन को सीलिंग से मुक्त कर निजी दर्ज करने वाले आदेश का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिल रहा है।
यही सबसे बड़ा पेंच बन गया है। यदि वह आदेश रिकॉर्ड में नहीं है, तो जमीन सीलिंग से निजी भूमि में किस आधार पर दर्ज हुई, यह सवाल अब प्रशासनिक जांच का केंद्र बन गया है।
वर्तमान भूस्वामियों पर भी संकट
154 एकड़ जमीन अलग-अलग हिस्सों में बंट चुकी है और इसके कई वर्तमान भूस्वामी हैं। ऐसे में मूल आदेश नहीं मिलने से इस जमीन के अलग-अलग हिस्सों की वैधता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
स्वास्तिक ग्रैंड कॉलोनी से लेकर लुमिनियस इन्फ्राप्रोजेक्ट्स तक, जिन प्रोजेक्ट्स की जमीन इन रिकॉर्ड से जुड़ती है, उनके लिए भी यही विवाद सबसे अहम है।
किसी के पास नहीं है मूल आदेश
इस पूरे मामले में सबसे अहम बात यह है कि जिस दिसंबर 2010 के आदेश के आधार पर जमीन को सीलिंग से मुक्त होकर निजी बताया जा रहा है, उसकी मूल प्रति प्रशासनिक रिकॉर्ड में नहीं मिल रही है।
न तो हातोद एसडीएम कार्यालय के पुराने रिकॉर्ड में यह आदेश मिला और न ही संबंधित पक्षों के पास इसकी मूल प्रति बताई जा रही है। उनके पास मुख्य रूप से केस नंबर और आदेश की तारीख का उल्लेख है।
अब प्रशासनिक जांच और हाईकोर्ट में चल रही कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि 154 एकड़ जमीन सीलिंग से निजी भूमि में किस प्रक्रिया के तहत दर्ज हुई और इसके पीछे दिसंबर 2010 के कथित आदेश की वास्तविक स्थिति क्या है।
यानी विवाद सिर्फ एक कॉलोनी की विकास मंजूरी का नहीं रह गया है। मामला अब 154 एकड़ जमीन और करीब 1500 करोड़ रुपए की संभावित कीमत से जुड़े राजस्व रिकॉर्ड की वैधता की जांच तक पहुंच गया है।
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